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सरहद पार की लपट में झुलसता जम्मू-कश्मीर

खुफिया ब्यूरो इसे लेकर काफी चौकन्ना है। स्थिति यह है कि न तो काफी कुछ जम्मू-कश्मीर में ठीक चल रहा है और न ही नियंत्रण रेखा और सीमापार। बताते हैं जम्मू के किश्तवाड़़ मेंं इस घटना को सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया, इसे सांप्रदायिक रंग दिया गया और अब इसमें आग में घी का काम करने के लिए कश्मीरी अलगाववादी गुटों के लोग भी शामिल हो रहे हैं। राज्य के दूसरे हिस्सों से एक समुदाय के लोगों के जाने की सूचना से खुफिया एजेंसियां भी हैरान हैं।

किश्तवाड़ में शुक्रवार (8अगस्त, 2013)को सांप्रदायिक संघर्ष भड़कने और दो लोगों की मौत हो जाने के बाद जम्मू में हिंसा और उग्र प्रदर्शन तेज हो गया। इस घटना को 2008 में अमरनाथ यात्रा को लेकर भड़के सांप्रदायिक वातारण और श्रीनगर में 2010 में काफी लंबे समय तक चले पथराव की घटना से जोड़कर देखने की जरूरत है। इसके विश्लेषण से पहले दिसंबर 2012-जनवरी 2013 से नियंत्रण रेखा पर लगातार उपज रही संघर्ष विराम की स्थिति, छह जनवरी को लांस नायक हेमराज और सुधाकर सिंह की पाकिस्तान सेना द्वारा बर्बर हत्या, छह अगस्त 2013 की सुबह पुंछ के सरलागांव स्थित चौकी पर संघर्ष विराम का उल्लंघन तथा पाकिस्तान की 801 मुजाहिद रेजीमेंट द्वारा पांच सैनिकों की हत्या और लश्कर-ए-तैय्यबा के प्रमुख हाफिज मोहम्मद सईद का दिल्ली को दहलाने का बयान भी ध्यान में रखना होगा।

खुफिया ब्यूरो इसे लेकर काफी चौकन्ना है। स्थिति यह है कि न तो जम्मू-कश्मीर में काफी कुछ ठीक चल रहा है और न ही नियंत्रण रेखा और सीमापार। बताते हैं जम्मू के किश्तवाड़़ मेंं इस घटना को सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया, इसे सांप्रदायिक रंग दिया गया और अब आग में घी का काम करने के लिए कश्मीरी अलगाववादी गुटों के लोग भी शामिल हो रहे हैं। राज्य के दूसरे हिस्सों से एक समुदाय के लोगों के जाने की सूचना से खुफिया एजेंसियां भी हैरान हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला हालात की गंभीरता का अभी अनुमान ही लगा रहे हैं। वह राजनीतिक तरीके से इसे सुलझाने में लगे हैं।

यह चौंकाने वाली बात है कि शुक्रवार को जम्मू के किश्तवाड़़ में हुई घटना जंगल में आग की तरह पूरे जम्मू में फैल गई। गांधी नगर, पक्का डांगा, बख्शी नगर, पीर मीठा, त्रिकुटा नगर, जॉनीपुर, सतवारी, चान्नी हिम्मत, नोवाबाद इसकी चपेट में थे, लेकिन देखते-देखते कश्मीर घाटी तक इसकी लपटें पहुंचने लगीं। जम्मू के दस में से आठ जिले कर्फ्यू की चपेट में आ गए। किश्तवाड़़, राजौरी, सांबा, कठुआ, दयासी, उधमपुर, डोडा, राम्रान तक इसकी गर्माहट महसूस की जा रही है। इसे जम्मू के लोगों के भीतर भड़क रही भेदभाव की आग, असुरक्षा की भवना, कश्मीर घाटी के लोगों के राज्य में दबदबे से भी जोड़कर देखना होगा। निश्चित रूप से इसके पीछे एक सुनियोजित योजना काम कर रही है और इसकी आहट भांपने में जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार सफल नहीं कही जा सकती।
सुरक्षा एजेंसियां इसके हर पहलू पर बारीकी से निगरानी कर रही हैं। केन्द्रीय गृहमंत्रालय इसे एक सामान्य घटना के तौर पर भले लेता दिखाई दे रहा हो, लेकिन स्थिति की गंभीरता को समझ रहा है। इस संदर्भ में राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी गई है। जल्द ही केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों के जम्मू का दौरा करने की संभावना है। ऐसा माना जा रहा है कि विभिन्न घटनाओं की पड़ताल तथा स्थितियों के विश्लेषण के बाद भी मंत्रालय जम्मू-कश्मीर के हालात से निबटने की नीति में कुछ बदलाव करे। खुफिया ब्यूरो, रिसर्च एंड एनालिसिस विंग, सैन्य खुफिया इकाई और अर्ध सैनिक बलों की खुफिया इकाई तथा राज्य सरकार के खुफिया तंत्र की रिपोर्ट लगातार सावधान और संवेदनशील बने रहने की तरफ ही इशारा कर रही हैं।

सीमा पार से बढ़ा संघर्ष विराम
इन सब पहुलओं पर आगे बढऩे से पहले मल्टी एजेंसी सेंटर(एमएसी) की रिपोर्ट पर गौर करना होगा। एमएसी, देश की सभी खुफिया इकाई का एक सेंटर है। जहां सभी एजेंसियों की सूचना एकत्र होती है और उसका विश्लेषण किया जाता है। इसकी रिपोर्ट काफी चौंकाने वाली है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि इस साल अगस्त महीने तक सीमापार से घुसपैठ के 97 प्रयास हुए हैं। यह घुसपैठ जम्मू-कश्मीर से लगती सीमा से हुई है। इनमें 40 प्रतिशत प्रयासों में आतंकियों को सफलता मिलने का अनुमान है। इसका सीधा अर्थ है कि काफी बड़ी तादाद में आतंकी सीमा पार से घुसपैठ करके देश के अलग-अलग हिस्सों में दाखिल हो चुके हैं। 12 अगस्त, 2013 तक सीमापार से संघर्ष विराम उल्लंघन के करीब 63 मामले हो चुके हैं। ये पिछले साल की तुलना में करीब 82 प्रतिशत अधिक हैं। एक सप्ताह के भीतर संघर्ष विराम की करीब छह घटनाएं हो चुकी हैं। इस साल अब तक 19 हार्ड कोर आतंकियों को मार गिराने में सुरक्षा बलों को कामयाबी मिली है। इनमें से 13 आतंकियों को नियंत्रण रेखा के पास मुठभेड़ के दौरान मारने में सफलता मिली।

कश्मीर में आतंकवाद
दरअसल, सीमा पार से जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को धार देने की कोशिश हो रही है। अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज की वापसी की प्रक्रिया आरंभ होने की खबर से न केवल पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई बल्कि वहां से संचालित होने वाले आतंकी संगठन उत्साहित हैं। जलालाबाद में भारतीय मिशन पर हमले को सुरक्षा एजेंसियां इसी नजरिए से देख रही हैं। उन्हें एक तरफ जहां अफगानिस्तान में खुला क्षेत्र मिलने जा रहा है, वहीं पाकिस्तान से लश्करे- तैय्यबा जैसे आतंकी संगठन ‘छद्म जिहाद’ के नाम पर चल रहे अपने अभियान को कश्मीर की तरफ मोडऩे में लगे हैं। बताते हैं इसी रणनीति के तहत पाकिस्तान के आतंकी संगठन युवाओं को प्रशिक्षण देकर नेपाल से लगती सीमा, बांग्लादेश के रास्ते तथा नियंत्रण रेखा से भारतीय सीमा में घुसपैठ कराने में लगे थे। ऐसा माना जा रहा है कि पिछले दो-तीन साल में काफी बड़ी तादाद में देश के विभिन्न हिस्सों में न केवल आतंकियों की खेप पहुंच चुकी है, बल्कि बड़े पैमाने पर चुपचाप तैयारी जारी है। देश की सुरक्षा एजेंसियां ऐसे तमाम आतंकियों के ‘स्लीपर सेल’ और ‘मॉड्यूल’ का पता लगाने तथा उन्हें ध्वस्त करने में जुटी हैं।

आतंकवाद और घुसपैठ
पिछले दस वर्षों में सीमापार से घुसपैठ और आतंकवाद में बड़े पैमाने पर गिरावट आई है। इसका एक बड़ा कारण जहां सुरक्षा एजेंसियों की रणनीति रही, वहीं अफगानिस्तान में अमेरिकी फौज का जमावड़ा, पाकिस्तान में अमेरिकी ड्रोन हमले और आतंकियों का उस मोर्चे पर भी जूझना भी रहा है। पड़ोसी देश पर आतंकवाद को लेकर भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव भी एक वजह है। ज्यादा दूर न जाएं और 2008 के आंकड़े पर गौर करें तो उस साल कोई 339 आतंकी मारे गए थे। इसी के आस-पास सुरक्षा बलों को भी मुठभेड़ में जान गंवानी पड़ी थी। इसी संख्या के इर्द-गिर्द सामान्य लोग भी आतंकवाद का शिकार हुए। 2009, 2010, 2011, और 2012 में क्रमश: 239, 232, 100,और 72 आतंकी मारे गए। यह गिरावट सुरक्षा बलों की संख्या और सामान्य नागरिकों के मारे जाने में भी आई।

भुट्टो, जरदारी बनाम शरीफ
सुरक्षा एजेंसी के एक कमांडेट का विश्लेषण है कि मौजूदा समय में करगिल संघर्ष जैसी पृष्ठभूमि बन रही है। करगिल के दौरान जिस तरह से उकसावे की कार्रवाई हो रही थी, सीमापार वही रणनीति अपना रहा है। जम्मू-कश्मीर को लेकर भी सीमापार उसी रास्ते पर जा रहा है। सुरक्षा एजेंसी के प्रमुख अधिकारी का आकलन है कि जब-जब नवाज शरीफ सत्ता में आए, यही हुआ। इसकी बड़ी वजह पाकिस्तान की सेना से उनके समीकरण हैं। नवाज शरीफ परिवार पाकिस्तान का काफी धनी परिवार है। देश की आधारभूत संरचना से लेकर रिअल स्टेट समेत तमाम में वह कारोबारी है। आम से लेकर अमीर लोगों में उसका एक अपना नेटवर्क है। इसलिए उसके सत्ता में आते ही पाकिस्तान की कई एजेंसियां अपनी राह पर चल निकलती हैं। नवाज शरीफ एक तरफ भारत से दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं और दूसरी तरफ करगिल संघर्ष हो जाता है। यही इस समय भी हो रहा है। वह भारत के साथ मधुर संबंधों का संकेत दे रहे हैं और नियंत्रण रेखा पर तनाव बढ़ रहा है। कश्मीर में अशांति की खबरें बढ़ रही हैं। जबकि इसके उलट भुट्टो-जरदारी परिवार के शासन काल में पिछले पांच साल के दौरान ऐसी गंभीर स्थिति नहीं आई। भारत का कूटनीतिक दबाव हावी रहा। इसकी एक बड़ी वजह भुट्टो परिवार के साथ सेना का अलग समीकरण भी बताया जा रहा है।क्या है खतरा आने वाले समय में न केवल जम्मू-कश्मीर में बल्कि देश के भीतर आतंकी घटनाएं बढ़ सकती हैं। 2013-2014 भारत में चुनाव का साल है। इसे देखते हुए आतंकी संगठन भी अपनी जड़ें मजबूत करने की फिराक में है। अगस्त के दूसरे सप्ताह के बाद से ही देश में पूजा-पाठ का समय शुरू हो जाता है। नवंबर तक देश के मंदिरों, बाजारों में रौनक रहती है। ऐसे में आतंकी किसी बड़ी घटना को अंजाम दे सकते हैं। कश्मीर से ताल्लुक रखने वाले अलगाववादी संगठन संसद भवन पर हमले के आरोपी अफजल गुरू की फांसी को लगातार शहादत का रंग दे रहे हैं। पिछले साल मुंबई हमले के आरोपी अजमल आमिर कसाब को फांसी दी गई थी।

पाकिस्तान के आतंकी संगठन कसाब की फांसी को शहादत का दर्जा देने में जुटे हैं। पाकिस्तान पर लगातार नजर रखने वाले एक प्रमुख सूत्र के मुताबिक कसाब का जिक्र करके निकिआल और कोटली जैसे पाक अधिकृत कश्मीर और मुजफ्फराबाद आदि में चल रहे आतंकी प्रशिक्षण शिविरों में युवाओं में जोश भरा जा रहा है। यह सीमापार की खुफिया एजेंसी आईएसआई की भारत बनाम पाकिस्तान से जुड़े षड्यंत्र का अंग हो सकता है।

जनरल अशफाक परवेज कियानी
पाकिस्तान की सेना में भी एक अजीब-सी स्थिति है। सेनाध्यक्ष जनरल अशफाक परवेज कियानी अपने पद पर बने हैं। वह उसे आसानी से छोडऩा नहीं चाहते। जबकि सैन्य नियमावली के अनुसार उन्हें करीब तीन साल पहले 28 नवंबर 2010 को ही रिटायर हो जाना चाहिए था। उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके बतौर सेनाध्यक्ष दूसरा कार्यकाल भी हासिल कर लिया है। उनका यह कार्यकाल इसी साल समाप्त हो रहा है। इसी साल सितंबर में राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी का कार्यकाल पूरा हो रहा है। वैसे भी कियानी पाकिस्तान के पहले ऐसे जनरल हैं जिन्होंने सिविल सरकार से दूसरा कार्यकाल हासिल किया है। इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ जनरल वहीद काकर को सेवा विस्तार देने का प्रयास किया था, लेकिन बाद में खारिज हो गया था।

कियानी के बाद जनरलों की एक कमान है, जो सैन्य प्रमुख के पद पर आना चाहती है। जनरल कियानी ने पाकिस्तान की सेना में अपने बाद के क्रम में केवल अपने वफादारों को ही रहने दिया है। ऐसे में पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से एक खतरा है। शरीफ संविधान और सैन्य नियमावली का हवाला देकर कियानी को पद छोडऩे के लिए कह सकते हैं। कियानी के बाद के लेफ्टिनेंट जनरल भी एक आस लगाए बैठे हैं। इस आशंका से जनरल कियानी भी पीडि़त हैं। ऐसे में वह सैन्य सत्ता में बने रहने के लिए कट्टरपंथी जमात का सहारा ले सकते हैं। इसके लिए भारत में आतंकवाद, हमला या फिर कश्मीर में आतंकवाद भी उनका हथियार हो सकता है।

कूटनीतिक जानकार इसे काफी गंभीरता से ले रहे हैं। उनका मानना है कि पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ की तुलना में जनरल कियानी ज्यादा बड़े खिलाड़ी हैं। वह 2007 में सेनाध्यक्ष बने थे और पिछले छह सालों में उन्होंने ठोस जगह बना ली है। नवाज शरीफ के लिए और देश के नए राष्ट्रपति के लिए वह भी चुनौती साबित होंगे। इस खतरे का अंदेशा भारत को भी है। भारत के अलगाववादी गुटों तक जनरल कियानी के तार बताए जाते हैं। अमेरिका और चीन के साथ सैन्य डिप्लोमेसी को भी इन्होंने अपने हिसाब से दिशा दी है।

 

 

रंजना

 

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