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जम्मू संभाग को भी कश्मीर बनाने की राष्ट्रघाती साजिश

कुलीद और मट्टा दोनों ही हिन्दू राजपूतों के गांव हैं। शुरु में सभी ने यही समझा कि ये लोग नमाज अदा करने के लिये आ रहे हैं। इस लिये हिन्दुओं के सशंकित होने का प्रश्न ही नहीं था। लेकिन इस काफिले का उद्देश्य नमाज अदा करना था ही नहीं। जैसे ही वे कुलीद और मट्टा में पहुंचे उन्होंने भारत विरोधी नारे लगाने शुरु कर दिये और पाकिस्तान के झंडे फहराते हुए दीवारों पर आजादी के पोस्टर चिपकाने शुरु कर दिये। साथ ही हिन्दुओं के घरों पर पथराव और कहीं कहीं गोलियां चलानी भी शुरु कर दी। यह जिहाद प्रात: आठ-साढ़े आठ बजे शुरु हो गया। इन गांवों के लोग कुछ समझ पाते तब तक मकानों को आग लगाने का सिलसिला शुरु हो चुका था।

जम्मू कश्मीर के किश्तवाड़़ शहर में 9 अगस्त को ईद के पावन अवसर पर मुसलमानों ने हिन्दुओं पर आक्रमण कर तांडव नृत्य किया। तांडव कहने से हो सकता है कि उमर अब्दुल्ला जैसे पंथनिरपेक्ष लोगों की मजहबी भावनाएं आहत हो जायें, इसलिये तांडव नहीं जिहाद किया। इस्लाम में जन्नत प्राप्त करने के लिये जिहाद जरुरी है और उसके लिये ईद से अच्छा मौका और कौन सा हो सकता था? यह जम्मू कश्मीर में सरकार चला रही सोनिया कांग्रेस और नेशनल कान्फ्रेंस की ओर से हिन्दुओं को दी गई ईदी थी। अब घटना और षड्यंत्र की कथा।

किश्तवाड़़ जम्मू संभाग के दस जिलों में से एक छोटा जिला है। सदियों से इस क्षेत्र में चले आ रहे मतान्तरण के कारण अब इस जि़ले में हिन्दुओं की संख्या 45 प्रतिशत के आसपास ही रह गई है। जिले के मुख्यालय किश्तवाड़़ की जनसंख्या लगभग 20 हजार है। इस शहर में कुछ संख्या हिन्दुओं की है जो आम तौर पर दुकानें चलाते हैं या छोटा मोटा काम करते हैं। किश्तवाड़़ के चौगान में सार्वजनिक कार्यक्रम होते रहते हैं। हर साल ईद की नमाज भी यहीं होती है। किश्तवाड़ के आसपास के कुछ गांवों केमुसलमान भी नमाज के लिये ईद के दिन यहां आ जाते हैं। अपने अपने गांव में भी मौलवी नमाज अदा करवाते हैं। लेकिन पिछले कुछ साल से मस्जिदों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ज्यादातर मौलवी आ गये हैं, जिससे माहौल खराब हो रहा है।
इस बार नमाज अदा करने के लिये किश्तवाड़ के समीपस्थ मुस्लिम गांवों संग्राम भाटा, पूही, हुल्लर, बांदरना से 500-600 सौ लोग किश्तवाड़ आ रहे थे। यह जमावड़ा पूही से चला। आगे उसमें हुल्लर के लोग शामिल हो गये। वहां से यह काफिला बांदरना पहुंचा और वहां से और संख्या जुटी। अंत में संग्राम भाटा के लोगों को समेटता हुआ यह काफिला किश्तवाड़ की ओर बढ़ा। इन गांवों के लोगों के किश्तवाड़ आने का रास्ता किश्तवाड़ से सटे गांवों कुलीद और मट्टा से होकर जाता है। कुलीद और मट्टा दोनों ही हिन्दू राजपूतों के गांव हैं। शुरु में सभी ने यही समझा कि ये लोग नमाज अदा करने के लिये आ रहे हैं। इस लिये हिन्दुओं के सशंकित होने का प्रश्न ही नहीं था। लेकिन इस काफिले का उद्देश्य नमाज अदा करना था ही नहीं। जैसे ही वे कुलीद और मट्टा में पहुंचे उन्होंने भारत विरोधी नारे लगाने शुरु कर दिये और पाकिस्तान के झंडे फहराते हुए दीवारों पर आजादी के पोस्टर चिपकाने शुरु कर दिये। साथ ही हिन्दुओं के घरों पर पथराव और कहीं कहीं गोलियां चलाना भी शुरु कर दिया। यह जिहाद प्रात: आठ-साढ़े आठ बजे शुरु हो गया। इन गांव के लोग कुछ समझ पाते तब तक मकानों को आग लगाने का सिलसिला शुरु हो चुका था। गांव के लोग इन उपद्रवियों का मुकाबला करने के लिये निकलते,तब तक काफी नुकसान हो चुका था। यह भीड़ हिन्दू गांवों पर हमले के इरादे से ही आई थी और इस काम के लिये उसने पूरी तैयारी की थी, इसका प्रमाण इसी से मिलता है कि गांव से सटे पेट्रोल पम्प पर उपद्रवियों ने तीन हिन्दू लड़कों पर गोली चला दी। वे जम्मू के अस्पताल में जिन्दगी और मौत से जूझ रहे हैं। किश्तवाड़ में इस भीड़ ने हालत इतनी खराब कर दी कि लोग घायलों को किश्तवाड़ के ही जिला अस्पताल में ले जाने का साहस नहीं कर पाये, क्योंकि वह शहर के बीच मुस्लिम आबादी में स्थित है और वहां तक घायल को ले जाना ही संभव नहीं हुआ।
कुलीद और मट्टा गांव में हो रही घटनाओं की खबर चौगान में नमाज अदा करते लगभग 10 हजार नमाजियों को मिलते भला कितना समय लगता? देखते ही देखते सारा शहर अल्लाह हो अकबर के नारों से गूंजने लगा। अल्लाह महान है, इस पर तो भला किसी को क्या एतराज हो सकता था, लेकिन यह उन्मादी भीड़ किश्तवाड़ के हिन्दुओं को अल्लाह की महानता के जिस प्रकार से दर्शन करवा रही थी, वह बहुत ही खतरनाक था। पूरा जिहाद सुबह 8 बजे से लेकर शाम आठ बजे तक चला और हिन्दुओं को अल्लाह के महान होने का सबूत मिलता रहा। अल्लाह के ये पैरोकार कुलीद चौक से लेकर बस अड्डे तक फैल गये। इन्होंने जल्दी ही मेन मार्केट, शहीदी चौक, अमन मार्केट, बनिया मार्केट और पुराना बाजार तक सभी को अपनी लपेट में ले लिया। हिन्दुओं की लगभग डेढ़ सौ दुकानें जला दी गईं। अरबों की सम्पत्ति का नुकसान हुआ। वर्षों की मेहनत पल भर में खाक हो गई। कुछ अति उत्साही और संतुलन बनाने के पक्षधरों ने इसे दो समुदायों में दंगा कह कर अपनी पंथनिरपेक्षता को पुष्प अर्पित किये। दंगा तब होता है जब दो सम्प्रदाय आमने सामने आकर लड़ रहे हों। लेकिन जब एक समुदाय पीट रहा हो और दूसरा पिट रहा हो तो वह जिहाद होता है, दंगा नहीं। वैसे भी, तसलीमा नसरीन ने बहुत शुरु में कहा था, जिस स्थान पर मुसलमान अति बहुमत में होते हैं, वहां दंगे नहीं नरसंहार होते हैं। किश्तवाड़ में जो हुआ, वह नरसंहार तो नहीं लेकिन घर संहार था। किश्तवाड़ में अभी भी हिन्दुओं की सभी दुकानों से धुंआ निकल रहा है। लेकिन उन्मादियों को भी आखिर पंथनिरपेक्षता का ध्यान रखना पड़ता है। वक्त का तकाजा ही ऐसा है। इसलिये किश्तवाड़ से पी.डी.पी के राज्य विधान परिषद के सदस्य असगर अहमद अली के भतीजे का होटल भी जला हुआ पाया गया। जिहादी शायद आश्वस्त होना चाहते थे कि किसी तरह से यह लगना चाहिये कि यह दंगा था जिसमें दोनों पक्षों का नुकसान हुआ। वैसे किश्तवाड़ में यह भी चर्चा शुरु हो गई है कि अब सरकारी कम्पनसैशन से यह होटल और भी बढिय़ा बन जायेगा। बुद्धिमान आदमी फसाद में भी ‘व्यवसाय कैसे बढ़ायेंÓ का ध्यान रखता है। वैसे मुसलमानों की एक और दुकान भी लूटी गई है। यह दुकान राज्य गृहमंत्री सज्जाद किचलू के नजदीकी की है। इस दुकान में बन्दूकें बिकती थीं। हिन्दुओं की सम्पत्ति को आग लगा रही मुसलमानों की भीड़ ने इस दुकान को भी लूट लिया। ताज्जुब है इसे जलाया नहीं। लूटने का अर्थ है कि बिना पैसे दिये बन्दूकें ले लीं। अब बेचारा दुकानदार भी क्या करता। उपद्रवियों को बन्दूकें ले जाने से कैसे रोकता? ये बन्दूकें पूरे कांड में कितनी काम की सिद्ध हुई होंगी, इसका अन्दाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

लेकिन असली प्रश्न यह है कि इस पूरे कांड में पुलिस और प्रशासन क्या कर रहा था? प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि इलाके का एक डी.एस.पी तो सारा दिन उपद्रवियों के साथ ही घूमता रहा। अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि वह उपद्रवियों की सहायता और मार्गदर्शन का कार्य कर रहा था या उन्हें रोकने की कोशिश। अलबत्ता इतना जरुर कहा जा सकता है कि यदि वह दंगाइयों को रोकने के सरकारी काम में लगा होता तो किश्तवाड़ में हिन्दुओं की 150 से ज्यादा दुकानें और घर आग की भेंट न चढ़ जाते। रही सही कसर राज्य के गृह राज्यमंत्री सज्जाद अहमद किचलू ने पूरी कर दी। किचलू किश्तवाड़ से ही विधायक हैं। वे भी इस मौके पर नमाज अदा करने के लिये श्रीनगर से चलकर तीन दिन पहले ही किश्तवाड़ पहुंच चुके थे। किश्तवाड़ के हिन्दू आश्वस्त थे कि शहर में मंत्री स्वयं हाजिर है, अब गड़बड़ नहीं होगी। उधर उपद्रवी आश्वस्त थे कि जब मंत्री स्वयं हाजिर है तो अब उनको रोकने वाला कौन है? जब किश्तवाड़ में आग लग रही थी तो किचलू का फर्ज था कि शहर में लोगों को आगजनी से रोकने का काम करते। लेकिन उन्होंने सुबह नौ बजे ही शहर के डाक बंगले में डेरा जमा लिया और सारे पुलिस बल को भी वहां बुला लिया। उपद्रवियों को किचलू की इस अदा से ही स्पष्ट हो गया था कि अब उनको, अपनी योजना को पूरी करने से रोकने वाला कोई नहीं है। किश्तवाड़ जलता रहा और किचलू ने पुलिस को सारा दिन अपने चरणों में बिठाये रखा। शुरु में पुलिस ने हवा में गोलियां भी चलाईं। लेकिन उस का इस जिहादी सेना पर कोई असर नहीं हो सकता था। उपद्रवियों को ज्ञात था कि पुलिस किसी भी हालत में इस प्रकार गोली नहीं चलायेगी, जिससे कोई घायल या मर जाये। लगता है रामबन की घटना के बाद राज्य सरकार ने पुलिस बल को हिदायत कर दी है कि किसी भी हालत में उपद्रवियों पर गोली नहीं चलाई जायेगी। सरकार की इस नीति की जानकारी अल्पसंख्यकों पर स्थान स्थान पर आक्रमण की योजना बना रहे षडयंत्रकारियों को भी आधिकारिक तौर पर दी गई लगती है। अन्यथा शहर में गृह राज्यमंत्री के रहते इतने निडर होकर दंगाई सारा दिन हिन्दुओं की सम्पत्तियों को आग न लगाते रहते।

लगभग 12 बजे किश्तवाड़ में सेना बुला ली गई। यह करना शायद प्रशासन की विवशता थी, क्योंकि उसे यह दिखाना भी था कि उपद्रवियों से निपटने के लिये प्रयास किये जा रहे हैं। लेकिन सेना के आने पर भी उपद्रवियों के काम में बाधा न पडे, इसकी योजना भी प्रशासन के पास थी। सेना की तैनाती और काम का निर्धारण तो स्थानीय प्रशासन को ही करना था। प्रशासन ने यह काम भी कश्मीरी ढंग से सुलझा दिया। सेना को चौगान में बिठा दिया गया। सेना ने इतना काम किया कि कुलीद और मट्टा गांव के हिन्दुओं को किश्तवाड़ में जाने नहीं दिया। वे किश्तवाड़ में जाकर अपनी दुकानें और सम्बंधियों को बचाना चाहते थे। सेना के अधिकारियों का कहना था कि हमारे हाथ स्थानीय प्रशासन ने बांध रखे हैं। शाम सात बजे तक जब जिहादियों ने अपना काम बखूबी निपटा दिया तो प्रशासन ने सेना के हाथ खोल दिये और किश्तवाड़ में कफ्र्यू लगा दिया। सेना ने पहला फ्लैग मार्च शाम 7:30 बजे निकाला, लेकिन अब यह मार्च रस्म अदायगी से ज्यादा कुछ नहीं था।

कफ्र्यू के बाद सरकार ने अपना काम कश्मीरी शैली में शुरु किया। इस इलाके के गांवों में, गांव रक्षा समितियां बनी हुई हैं, जिनके सदस्यों को सरकार ने आतंकवादियों के आक्रमण के समय गांव की रक्षा करने के लिये हथियार दिये हुये हैं। इन समितियों ने आतंकवाद का बहादुरी से मुकाबला किया था। अब सरकार ने उनसे हथियार वापिस लेने का निर्णय किया। मामला साफ था। हिन्दुओं को मुसलमान उपद्रवियों के सामने निहत्था कर दिया जाये। इस पूरे कांड में संग्राम भाटा गांव के एक हिन्दू दलित युवक अरविन्द भगत की हत्या कर दी गई। इसी गांव का एक मुसलमान भी इस लड़ाई की चपेट में आकर मारा गया। सैकड़ों लोग घायल हुये। कुछ तो अभी भी जीवन-मरण में झूल रहे हैं।

जब किश्तवाड़ में यह जिहाद चल रहा था तो श्रीनगर में उमर अब्दुल्ला यह गिनती कर रहे थे कि किस पक्ष को कितना नुकसान हुआ है। भाजपा की सांसद सुषमा स्वराज ने उमर को कहा कि किश्तवाड़ में इस प्रकार आगजनी हो रही है और लोग मारे जा रहे हैं, कुछ करिये। उमर ने तुरन्त जवाब दिया – दोनों पक्षों का नुकसान हो रहा है। जाहिर है, उमर दोनों पक्षों के नुकसान के संतुलन की गणना में ही लगे हुये थे। सुषमा स्वराज ने लिखा, मैं पक्षों की बात नहीं कर रही। जो पीडि़त हैं वे हिन्दुस्तानी हैं। उमर ने व्यंग्य किया, आप सेना अधिकारियों से बात कर लीजिये।

पिछले कुछ अरसे से जम्मू-कश्मीर में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों पर मुसलमानों के संगठित आक्रमणों का षड्यंत्र शुरु हुआ है। रामबन जिला में हिन्दू बहुसंख्यक गांवों में भय पैदा करने के लिये सीमा सुरक्षा बल को कुरान शरीफ के अपमान के बहाने निशाना बनाया गया। बडगाम में अल्पसंख्यक शिया समाज को मुसलमानों ने निशाना बनाया। अब किश्तवाड़ में सीधा सीधा हिन्दुओं को निशाना बनाया गया है। जब राज्य के भीतर अल्पसंख्यक समाज निशाना बन रहा है तो सीमान्त पर आतंकवादियों की सहायता से देश की सेना को निशाना बनाया जा रहा है। राज्य के भीतर हो रहे अल्पसंख्यक समुदाय पर आक्रमणों में उमर अब्दुल्ला सम्प्रदायों के नुकसान में संतुलन बिठाने के प्रयास को ही प्रशासकीय क्षमता मान रहे हैं और देश के रक्षामंत्री सीमा पर हो रहे आक्रमणों में पाकिस्तान का बचाव कर रहे हैं।

उपद्रवों के पीछे के षड्यंत्रकारी
किश्तवाड़ की घटनाओं के पीछे के षड्यंत्र और उसकी रणनीति को जाने बिना इन घटनाओं की तह तक नहीं पहुंचा जा सकता। फारूख अब्दुल्ला के वक्त जम्मू में एक आन्दोलन चला था कि जम्मू संभाग को एक अलग राज्य बना दिया जाये ताकि वह कश्मीर के राजनैतिक षड्यंत्रों से परे रह कर अपना विकास कर सके। फारूख अब्दुल्ला ने उसी समय से अपने पिता महरूम शेख अब्दुल्ला की तरह इस शुद्ध प्रशासनिक प्रश्न को साम्प्रदायिक रंग देना शुरु कर दिया था। उन्होंने कहना शुरु कर दिया कि यदि जम्मू को अलग राज्य बनाया गया तो डोडा, किश्तवाड़, रामबन और अखनूर जैसे जिलों को कश्मीर राज्य में शामिल किया जाये। तब जम्मू कश्मीर राज्य के भूगोल को जानने वाले विद्वान फारूख की इस मांग पर हैरान थे, क्योंकि ये चारों जिले भौगोलिक दृष्टि से जम्मू संभाग के अंग हैं। उसके बाद फारूख ने जो कहा, उससे दिल्ली में बैठे उनके समर्थक भी हैरान रह गये थे। फारूख ने कहा कि ये चारों राज्य इसलिये कश्मीर में आने चाहिये, क्योंकि इनमें मुस्लिम बहुसंख्यक हैं। अभी तक जम्मू संभाग और कश्मीर संभाग को लेकर चर्चा विशुद्ध रुप से भौगोलिक और प्रशासनिक आधारों पर हो रही थी, लेकिन फारूख ने इस सारे प्रश्न को मजहबी रंग देना शुरु कर दिया। नेशनल कान्फ्रेंस के लिये यह कोई नई बात नहीं थी, बल्कि उसकी राजनीति का आधार इसके संस्थापक प्रधान शेख अब्दुल्ला के समय से ही कट्टर साम्प्रदायिकता रहा है।
जम्मू कश्मीर में अगले साल चुनाव होने वाले हैं। उसी को ध्यान में रखते हुए, नेशनल कान्फ्रेंस फिर अपने पुराने शगल पर उतर रही है, हिन्दु मुसलमान को आपस में लड़ाना। नेशनल कान्फ्रेंस को शायद कहीं न कहीं यह विश्वास है कि मुसलमान आक्रामक होगा तो शायद हिन्दू कश्मीर की तरह, यहां से भी भाग जायेंगे। नहीं भागेगा तो कम से कम, जब उस पर आक्रमण होगा तो उसकी हिम्मत तो समाप्त हो ही जायेगी। इस झगड़े से मुसलमान वोटों का ध्रुवीकरण हो जायेगा और इन जिलों में मुस्लिम वोटों के दूसरे दावेदार हाशिये पर चले जायेंगे। नेशनल कान्फ्रेंस के प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करने के लिये मुसलमानों के ये आक्रमण अत्यन्त सहायक हो सकते हैं। इन चारों जिलों में रहने वाले मुसलमानों में बहुसंख्यक कश्मीरी मुसलमान ही हैं जो समय समय पर अनेक कारणों से कश्मीर को छोड़ कर जम्मू संभाग में बसने के लिये आ गये थे। उस वक्त जम्मू के डोगरों ने मानवीय आधार पर इनको जम्मू में बसाया ही नहीं बल्कि हर प्रकार से इनकी सहायता भी की। लेकिन यही कश्मीरी मुसलमान आज उन्हीं डोगरों के घरों व दुकानों को, केवल साम्प्रदायिक कारणों से,जलाते रहे और राज्य के राज्य गृह मंत्री चुपचाप तमाशा ही नहीं देखते रहे, बल्कि बहुत ही होशियारी से पुलिस को निष्क्रिय बनाने में जुटे रहे।
जम्मू कश्मीर के आतंकवादियों को नेशनल कान्फ्रेंस की यह फिरकापरस्त राजनीति सबसे ज़्यादा रास आ रही है। यह ध्यान रखना चाहिये कि आमतौर पर जब किन्हीं स्थानीय कारणों से दो समुदायों में झगड़ा होता या फिर जम्मू-कश्मीर की विशेष परिस्थिति में मुसलमानों की भीड़ हिन्दुओं पर आक्रमण करती है तो गाली गलौज भी स्थानीय विषयों तक ही सीमित होता है। लेकिन किश्तवाड़ में मुसलमानों की जो भीड़ हिन्दुओं की सम्पत्ति जला रही थी और गोलियां चला रही थी, वह पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे ही नहीं,उसके झंडे भी फहरा रही थी। पाकिस्तान का समर्थन करने की अधीरता में भारत विरोधी नारे भी लगा रही थी। इसे मामले में पाकिस्तान समर्थक देशी और विदेशी आतंकवादियों की भूमिका प्रारम्भ होती है।

आक्रमण से हिन्दू आतंकित होंगे, यह इस प्रकार के कांडों की आतंकवादियों की नजर में मात्र अतिरिक्त लाभ है। आतंकवादियों की असली समस्या है, ग्राम सुरक्षा समितियां। आतंकवाद और आतंकवादियों का मुकाबला करने के लिये सरकार ने जब अपनी लाचारी प्रकट कर दी थी या फिर किसी गहरी नीति के कारण चुप रहना श्रेयस्कर समझा था, तब गांवों के लोगों ने अपनी रक्षा स्वयं करने का संकल्प लिया था। तब गांवों में इन समितियों की स्थापना हुई थी और इनके सदस्यों को हथियार भी मुहैया करवा दिये गये थे। इन सुरक्षा समितियों ने अनेक स्थानों पर आक्रमणकारी आतंकियों का बहादुरी से मुकाबला किया था और राज्य में आतंकवाद को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अभी भी आतंकवादी इन ग्राम सुरक्षा समितियों को अपने रास्ते का रोड़ा समझते हैं। किश्तवाड़ के उपद्रव के बाद, हुर्रियत कान्फ्रेंस के गिलानी, जम्मू कश्मीर मुक्ति मोर्चा के मोहम्मद यासीन मलिक और श्रीनगर की जामा मस्जिद के मीरवायज का तुरन्त अभियान शुरु हो गया कि ग्राम सुरक्षा समितियां समाप्त कर उनके हथियार जब्त कर लेने चाहिए। यही मांग आतंकवादियों की है। यदि किश्तवाड़ के आसपास के गांवों में ग्राम सुरक्षा समितियां न होतीं तो न जाने इस पूरे कांड में कितने हिन्दू मारे जाते। अब सरकार ग्राम सुरक्षा समितियों की सूचियाँ तैयार कर रही है, ताकि उनसे हथियार वापिस लिये जा सकें। मकसद शायद यही होगा कि जब अगला आक्रमण होगा तो कोई बच न पाये। इस बार घर संहार अगली बार नर संहार।

लगता है, इस बार पाकिस्तान के दिशा निर्देश में चल रहे आतंकवादी संगठनों ने अपनी रणनीति बदल ली है। रामबन, बडगाम और अब किश्तवाड़ में हुई घटनाएं इसका स्पष्ट संकेत देती हैं। इन तीनों स्थानों पर हुई घटनाओं में भीतर ही भीतर एक तारतम्यता देखी जा सकती है। आतंकवादियों के रास्ते में सब से बड़ी बाधा कौन सी है? स्पष्ट ही सुरक्षा बल और ग्राम सुरक्षा समितियां। इनको रास्ते से कैसे हटाया जाये या फिर किसी तरह इनकी मार्क शक्ति को कम किया जाये? इससे पहले आतंकवादी इन दोनों से खुद भिड़ते थे, लेकिन नई रणनीति में वे स्वयं पीछे हैं और आम जनता को आगे किया हुआ है। जनता को आगे कर उन्हें सुरक्षा बलों से भिड़ाने के लिये कोई बहाना तो चाहिये। लेकिन राज्य में जिस प्रकार का उत्तेजित वातावरण है, उसमें बहाने तलाश करने में कोई ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। रामबन के संगलदान में किसी मोहम्मद लतीफ से सुरक्षा बलों द्वारा कुरान शरीफ के अपमान की कहानी बनाई तो बडगाम में दो ड्राईवरों के झगड़े के बहाने शिया समाज मुसलमानों के निशाने पर आ गया और किश्तवाड़ में तो उसकी जरुरत भी नहीं पड़ी। किश्तवाड़ में मुसलमानों का एक समूह पिछले कुछ दिनों से हिन्दुओं पर हमले का आधार तैयार कर रहा था। कुछ दिन पहले मंदिर में मूर्ति स्थापना हेतु पुछाल गांव से निकली कलश यात्रा को लेकर संग्रामभाटा गांव में कुछ लड़कों ने आपत्ति की थी। इस झगड़े में एक मुसलमान लड़के आतिल को मामूली चोटें आईं थीं। लेकिन साम्प्रदायिक सौहार्द के लिये हिन्दुओं ने कलश यात्रा का मार्ग बदल लिया।

परन्तु उसी दिन जब कुलीद गांव का रणमीत सिंह परिहार अपने गांव आ रहा था तो संग्राम भाटा में मुसलमान युवकों ने उसे रोक लिया और पीटते पीटते मरा समझ कर छोड़ दिया। उसके मोटर साईकिल को आग लगा दी। रात्रि को अनेक गांवों में हिन्दुओं के घरों पर पथराव किया जाता था। हफ्ता दस दिन पहले मुसलमानों के गांवों में एक सुसंगठित ग्रुप द्वारा यह अफवाहें फैलाई जा रही थीं कि मुसलमानों के गांवों को जलाने की धमकियां मिल रही हैं। यह घटना उदाहरण के लिये हैं। इस इलाके में पिछले लगभग एक माह से हिन्दुओं को मनोवैज्ञानिक तरीके से घेरने की कोशिश हो रही थी और जाहिर है इसके पीछे कोई संगठित ग्रुप ही काम कर रहा था। लेकिन ताज्जुब है कि राज्य का गुप्तचर विभाग, सतर्कता विभाग या तो सोया रहा या फिर उसने जानबूझ कर चुप रहना उचित समझा। किश्तवाड़ की घटनाओं के इन संकेतों को समझ कर सरकार ने हिन्दुओं पर होने वाले आक्रमणों को रोकने की योजना क्यों नहीं बनाई यह आश्चर्य जनक है। लगता है जम्मू- कश्मीर के आतंकवादी संगठनों ने राज्य से हिन्दुओं को निकालने के लिये माओवादी रणनीति अख्तियार की है, भूमिगत समूह और राजनैतिक समूह। यह राजनैतिक समूह सामान्य राजनैतिक शब्दावली का प्रयोग करते हुये आतंकवादियों के उद्देश्य की पूर्ति में सक्रिय रहता है। इस बार जम्मू संभाग, खासकर डोडा, अखनूर, रामबन और किश्तवाड़ जैसे जिलों में, जहां के मुसलमानों में डोगरा मुसलमान अल्पमत में हैं और कश्मीरी मुसलमान बहुमत में हैं, हिन्दुओं को निकालने की योजना बन रही है।

क्या यह किसी गहरी साजिश का हिस्सा नहीं लगता कि जब आतंकवादी अपने राजनैतिक ग्रुप से मिल कर जम्मू संभाग में हिन्दुओं पर कहर बरसा रहे हैं तो पाकिस्तान लगातार सीमा पर गोलीबारी कर रहा है? यह ठीक है कि मौके पर ही पकड़े जाने की चर्चा तेज होने की वजह से राज्य के गृह मंत्री सज्जाद अहमद किचलू ने त्यागपत्र दे दिया है, लेकिन जब तक सारे षड्यंत्रकारी पकड़े नहीं जाते तब तक सरकार की नीयत पर संदेह बना ही रहेगा। इस दिशा में आगे बढऩे के लिये जरुरी है कि इस बात की जांच की जाये कि किचलू ने इस कांड से पहले के सात दिनों में किस-किस से बात की।

 डॉ. कुलदीच चंद अग्निहोत्री

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