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समाप्त करो अनुच्छेद 370

हर साल की तरह इस बार भी हमारी पुण्य भूमि भारतवर्ष का 67वां स्वतंत्रता दिवस पारंपरिक और गौरवपूर्ण रीति से मनाया गया। आदरणीय राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री महोदय ने अपनी अनुभूति एवं पारदर्शिताओं को वक्तव्य के माध्यम से देश के सामने रखा। इस देश के नौजवान, किसान और महिलाएं, लालकिले के प्राचीर से दिए गए प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के भाषण ने सामान्य जन को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि क्या यह देश सचमुच बेहद कमजोर हो गया है या प्रधानमंत्री स्वयं कमजोर हैं, जो देश को कमजोर बताकर खुद अपनी कमजोरी छिपा रहे हैं। भले ही डॉ. सिंह नौजवान नहीं हैं, लेकिन उनके निराशापूर्ण भाषण से लगता था कि वह असहाय हैं। इसी देश में स्वामी विवेकानंद जैसे महान देशभक्त, पूरे विश्व को दिशा देने की ताकत रखते थे, और जिनका ओजस्वी भाषण पूरे विश्व को चकित कर देता था। ऐतिहासिक लालकिले की प्राचीर से उसी देश के प्रधानमंत्री जी का निराशापूर्ण भाषण देश के लिए और नई पीढ़ी के लिए, एक ‘असमर्थ नेतृत्व’ का उदाहरण पेश करता है। देश में आज कोई प्याज के आंसू बहा रहा है, तो कोई महंगाई की मार से आत्महत्या कर रहा है। देश के सुरक्षाबलों के जवान एक के बाद एक शहीद हो रहे हैं, लेकिन उनके परिवारजनों के मन में कहीं भी हताशा के चिन्ह दिखाई नहीं दे रहे हंै।

शहीदों की विधवा और नाबालिग बच्चे हंस-हंस कर जिंदगी की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। क्यों…. ? क्योंकि यही इस देश के संस्कार हंै … मिट्टी की सुगंध है। जन्मभूमि को स्वर्ग के समान बताते हुए हमेशा कहा गया है : ‘जननी जन्म भूमिश्च, स्वर्गादपि गरियसि’। परंतु इस देश के प्रधानमंत्री जैसे शीर्षस्थ नेता भी असहाय हैं, इसका कारण खोजना भी जरूरी हो गया है। भारतवर्ष में नेता और नेतृत्व की कमी नहीं रही। आज यह महसूस होने लगा है कि देश का आम नागरिक भी अपना नेतृत्व चुनने और विचारधारा को पहचानने में गलती कर रहा है।

मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम के ‘रामराज्य’ को आज भी सारा विश्व याद करता है। इस देश की परंपरा रही है – ‘अपने स्वार्थ को बलिदान कर राजधर्म का पालन करें’ । रामराज्य और गांधी जी का अहिंसा धर्म, आज एक स्वप्न बन गया है। राज तंत्र और सरकार चलाने वाले नेताओं के प्रति आज पूरे देश में अविश्वास का वातावरण बन गया है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भय और आतंक का साया है। कश्मीर ही नहीं, आज जम्मू में भी पाकिस्तान का झंडा लहराया जा रहा है। किसकी इतनी हिम्मत है, कौन प्रोत्साहन दे रहा है इन अलगाववादी तत्वों को ? फिर मन में, स्वत: एक जवाब गूंजता है- अगर पंडित नेहरू उस समय अनुच्छेद 370 को लागू करने की जिद पर अड़े न होते तो आज किसी की हिम्मत नहीं होती, यह कहने के लिए कि ‘हम कश्मीर को लेकर रहेंगे’। कांग्रेस द्वारा कश्मीर को दिया गया विशेष राज्य का दर्जा, अपना झंडा और सदर-ए-रियासत की उपाधि का डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने घोर विरोध किया था। डॉ. मुखर्जी ने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा था : ‘एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान नहीं चलेंगे’। शेख अब्दुल्ला को खुश करने के लिए नेहरू ने उनके त्रिराष्ट्र के सिद्धांत का समर्थन किया, जिसके विरोध में डॉ. मुखर्जी ने कश्मीर की भूमि पर अपना बलिदान दे दिया। डॉ. मुखर्जी का बलिदान व्यर्थ नहीं जाना चाहिए, यह देशवासियों की जिम्मेदारी होनी चाहिए। ‘राष्ट्र सर्वोपरी’ का आदर्श, इस देश में हमेशा से चला आ रहा है। राष्ट्र के हित के लिए अगर किसी नेता अथवा राजनैतिक विचारधारा को समझौता करना पड़े, तो इसमें किसी को पीछे नहीं हटना चाहिए। कश्मीर हमेशा से सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक रूप से भारतवर्ष के साथ था, है और रहेगा। केन्द्रीय सहायता लेने में जम्मू-कश्मीर पहला राज्य है, लेकिन शेष भारत के साथ एकजुट होने में अंतिम राज्य नहीं हो सकता। केवल अनुच्छेद 370 को बरकरार रखने और जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा बनाए रखने से, कश्मीर समस्या का कभी समाधान नहीं हो सकता। कश्मीर मुद्दे पर कभी भी त्रिपक्षीय वार्ता नहीं होनी चाहिए और वार्ता में कश्मीर के प्रतिनिधि को शामिल करने की कोई भी शर्त, किसी भी हालत में स्वीकार नहीं की जानी चाहिए। अनुच्छेद 370, जम्मू-कश्मीर के लोगों में वर्गवाद और अलगाववाद को संवैधानिक सहारा देता है।

देश आज आम चुनाव की ओर बढ़ रहा है और अपनी-अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए नेशनल कांफ्रेंस, पिपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और कांग्रेस, अनुच्छेद 370 को बरकरार रखना चाहती हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह और चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष नरेन्द्र मोदी को स्पष्ट शब्दों में घोषणा कर देनी चाहिए कि यदि वह सत्ता में आए तो संविधान का अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया जाएगा। उसके बाद ही पाक द्वारा जबरन कश्मीर के हिस्से को लेकर संसद में लिए गए संकल्प को पूरा किया जा सकता है।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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