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प्रार्थना के बाहर गोरिल्ला प्रेम

रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित पत्रकार गीताश्री साहित्य की दुनिया में भी विचरण करती रहती हैं। ‘सपनों की मंडी’ और ‘औरत की बोली’ जैसी चर्चित पत्रकारीय कृतियों के बाद उनका कविता संग्रह ‘कविता जितना हक’ छपा और अब छपा है कहानी संग्रह ‘प्रार्थना के बाहर’, जिसमें उनकी तेरह कहानियां संग्रहीत हैं, जो नया ज्ञानोदय, पाखी, हंस, इरावती और बहुवचन जैसी प्रतिष्ठिïत पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी हैं।स्त्री विमर्श जड़ता का शिकार होकर इधर अपनी दीप्ति खो रहा है, जिसे चाहिए युवा खून और युवा नेतृत्व, जो ज्ञान और संवेदना के दोनों छोरों को तो अपनी कलम से नापे ही, भाषा और शिल्प के मामले में भी मशक्कत से न भागे और साहित्य के बड़े से बड़े सूरमा से लोहा लेने को तत्पर हो उठे- कृष्णा सोबती, राजी सेठ, चित्रा मुद्ïगल, नासिरा शर्मा, अर्चना वर्मा और ममता कालिया की तरह। इस संदर्भ में गीताश्री का कहानी संग्रह ‘प्रार्थना के बाहर तथा अन्य कहानियां’ पढ़कर सुखद एहसास हुआ। गीता ने युवालेखन में व्याप्त हड़बड़ी से काफी कुछ निजात पा ली है, तभी तो उनकी भाषा में बिहार-बंगाल के ऐसे बहुतेरे शब्द आ रहे हैं, जिनके अर्थ शहरियों की समझ में मुश्किल से ही आएंगे, लेकिन जिस जमीन से ये कहानियां उठाई गई हैं, वहां ऐसी ही भाषा और ऐसे ही शब्द चलते और जीवन में अपनी छाप छोड़ते हैं। संग्रह की दूसरी कहानी ‘सोन मछरी’ भी कुछ ऐसी ही है, जो बिहार-बंगाल और बांग्लादेश तक की आबोहवा से पाठक को जोड़ देती है। संग्रह की नामधर्मा कहानी ‘प्रार्थना के बाहर’ राजधानी दिल्ली में रहने वाली दो लड़कियों के जिंदगी जीने के दो तरीकों के बहाने समकालीन स्त्री जीवन की ताजातर स्थितियों से पाठक को :ब: करा देती है। इन कहानियों में बिहार की माटी की महक मौजूद है। गीताश्री की ज्यादातर कहानियां देश-काल के मामले में खरी उतरती हैं।

गीताश्री की कहानी ‘गोरिल्ला प्यार’ का एक अंश देखिए : सोच की धुरी है प्रेम। प्रेम है तो जीवन है। अर्पिता ने पहले ही कह दिया था, ‘इंद्र, हम एक साथ नहीं रहेंगे। एक छत के नीचे नहीं रहेंगे। हम जीवन भर मिलेंगे। फिर-फिर मिलेंगे। हर बार प्रेमी और प्रेमिका की तरह मिलेंगे। जीवन एक संग जिएंगे, लेकिन विवाह नहीं। नो फेरे। नो बंधन। और तो और, लिव-इन भी नहीं।’ लिव-इन भी नहीं, ताकि प्रेम बचा रहे। प्रेम ही तो स्पंदन है। वह चला गया तो शेष क्या रहा? निस्पंद शरीर! जड़-संबंध, आडंबर, ढोंग, रुटीनी जिंदगी। एक ऐसी जिंदगी, जो ठीक वहां खत्म होती है, ऐन जहां से शु: होता है रोमांच। अर्पिता ने न जाने कितने शादीशुदा जोड़ों को इसका शिकार होते देखा है। उसने शादी के बाद प्रेमी युगलों को कुम्हलाते देखा है। उसने वयस्क होने से थोड़ा पहले ही तय कर लिया था कि वह जिंदगी में मर्द को उतनी ही जगह देगी, जितने में उसका अपना अस्तित्व बचा रहे। साथ ही बचा रहे प्रेम। मर्द को जैसे ही ज्यादा जगह दी, वह मित्र से तुरंत मालिक हो जाता है। अर्पिता को इसी से डर लगता है। वह कंबख्त सब कुछ को चीज बना देता है। प्रेम को भी। ऐसी सोच वाली ‘गोरिगा प्रेम’ की नायिका अर्पिता ने इंद्र के साथ वैसा ही जीवन जिया, जैसा वह चाहती थी, लेकिन अंतत: इंद्र भी वही निकला, एक पुरुष। मिली हुई स्त्री पर मालिकाना हक जताने वाला, जो अर्पिता को ऐसी जगह छोड़ गया, जहां वह न जीने लायक बची, न मरने लायक। उसके बाद उसने जो कदम उठाया, उससे प्रेम एकदम से धराशायी हो गया। प्रेम मर गया। उसकी जिंदगी से ही खत्म हो गया प्रेम।

 बलराम

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