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कुंडली बता देती है जातक के सहोदरों की स्थिति: राजबीर सिंह

आचार्यश्री राजबीर सिंह ने एक छोटा-सा कोर्स समझ कर ज्योतिष विद्या का अध्ययन शुरू किया था। उन्होंने सोचा था कि यह कोर्स करने के बाद वह लोगों का भविष्य बताने लग जाएंगे। मगर जैसे जैसे वह इस विद्या के सागर में गोते लगाने लगे, उन्हें पता लगा कि ज्योतिष के इस सागर की थाह पाने के लिए तो कई जन्म भी थोड़े हैं। यह उस सागर की तरह है, जिसमें जितनी डुबकियां लगाएं उतनी ही कम हैं। इस ज्ञान सागर में डूबते-उतरते आचार्यश्री राजबीर सिंह को आचार्यश्री मनोज पाठक और आचार्यश्री एस. गणेश जैसे अनेक गुरूओं का आशीर्वाद मिला। सौभाग्य से सन् 2005 में वह विश्व ज्योतिष गुरूश्री .के.एन.राव की छत्रछाया में पहुंच गए। श्री राव ने उन्हें एक विशेष शोध के लिए चुना, जिसमें उन्हें जातक की कुंडली में उसके अपने सहोदरों से संबंध स्थापित करना था। आचार्यश्री राजबीर सिंह ने इस शोध के लिए लगभग 3,000से भी अधिक कुंडलियों का अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला:

”जातक की कुंडली में लग्न यदि अपने अंतिम और प्रारम्भिक अंशों पर यानि लग्न गण्डांत पर हो तो उसका शोधन किया जा सकता है।’’

इसके लिए आचार्य श्री राजबीर सिंह ने जातकों से ऐसे कुछ छोटे-छोटे सवाल किए, जिन्हें जातक छिपाना भी नहीं चाहते थे। इन सवालों के जवाब को उन्होंने अपने शोध अध्ययन का आधार बनाया। ये बहुत ही साधारण से सवाल थे। जैसे –

क्या आप अपने पिता की सबसे बड़ी संतान हैं? क्या आप अपने पिता की सबसे छोटी संतान हैं? क्या आप अपने पिता की मंझली संतान हैं? क्या आप अपने पिता की एकमात्र संतान हैं?

इन सब सवालों की जांच हेतु ऋषि पराशर ने भी कुछ संकेत दिए हैं, जो कुछ इस प्रकार है:
1. यदि तृतीय भाव में शुभ ग्रह है या तृतीय भाव शुभ ग्रह से दृष्ट है, तो जातक सहोदरों से सुखी होता है।
2. मंगल या तृतीयेश अष्टम भाव में हो तो सहोदरों के लिए विनाशकारक होता है।
3. तृतीय भाव में बुध हो या तृतीयेश चन्द्रमा से युत हो अथवा मंगल शनि की युति हो तो जातक के पहले बहन और फिर भाई होता है। जातक के मां-बाप की यदि उसके बाद फिर सन्तान होती है तो उसके जन्म के बाद जातक की मृत्यु हो जाती है।
4. यदि मंगल और तृतीयेश की पाप ग्रहों से युति हो, तो सहोदरों के लिए विनाशकारी होते हैं।
5. यदि मंगल द्वादशेश से युत हो या गुरु एवं चन्द्र के साथ तृतीय भाव में हो, तो सहोदरों की संख्या सात होती है।
6. यदि तृतीय भाव पर स्त्री ग्रहों का प्रभाव हो तो बहनें, अर्थात सहोदरों में स्त्रियों की संख्या ज्यादा होती है। यदि पुरुष ग्रहों का प्रभाव हो, तो भाई, यानी पुरुषों की संख्या अधिक होती है। यदि दोनों का मिला-जुला प्रभाव हो, तो भाई और बहनों की संख्या लगभग बराबर होती है।
7. यदि तृतीयेश राहु से युत हो तो जातक के पश्चात् कोई भाई-बहन नहीं होता, लेकिन जातक से तीन बड़े भाई-बहन हो सकते हैं।
8. यदि तृतीयेश केन्द्र में हो और मंगल उच्च के गुरू के साथ केन्द्र में हो, तो बारह सहोदर हो सकते हैं। उनमें से दो बड़े एवं तीसरे, सातवें, नौवें और बारहवें सहोदर अल्पायु होते हैं। अर्थात् सिर्फ छ: सहोदर ही दीर्घ आयु के होंगे।
9. मंगल या तृतीयेश, केन्द्र या त्रिकोण में हों या मित्र ग्रह और अपने वर्गों में हों, तो सहोदरों को सुख की प्राप्ति होती है।
10. यदि तृतीय भाव स्थित चन्द्र पर पुरुष ग्रहों का प्रभाव हो, तो एक भाई और यदि शुक्र का प्रभाव हो तो एक बहन की भविष्यवाणी की जा सकती है।

इन सब की ध्यानपूर्वक जांच करनी चाहिए। यदि इनमें से अधिकतर भावों पर या इनके स्वामियों पर थोड़ी-सी भी पीड़ा है, तो मानना चाहिए कि जातक अपने भाई-बहनों में छोटा है। नियम द्रेष्कोण कुंडली में भी यह नियम लगाकर देखना चाहिए।

सबसे बड़ी संतान के लिए मुख्य नियम:
1. लग्न से एकादश भाव
2. लग्न से एकादशेश
3. गुरु से एकादश भाव
4. गुरु से एकादशेश

इन भावों और भावेशों की ध्यानपूर्वक जांच कर देखें कि ये कितनी पीड़ा में हैं। यदि इनमें से अधिकतर पीडि़त हैं तो, जातक अपने माता-पिता की सबसे बड़ी संतान है। इन नियमों को द्रेष्कोण कुंडली में भी जांचना चाहिए।

एक ही संतान के मुख्य नियम:
1. लग्न में तृतीय भाव
2. लग्न से तृतीयेश
3. लग्न से एकादश भाव
4. लग्न से एकादशेश
5. मंगल से तृतीय भाव
6. मंगल से तृतीयेश
7. गुरु से एकादश भाव
8. गुरु से एकादशेश
उपरोक्त नियम की जांच करने पर यदि अधिसंख्य तत्व पीडि़त हों तो कहा जा सकता है कि जातक अपने माता-पिता की इकलौती संतान है।

 

आशुतोष शर्मा

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