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या कुन्देन्दु तुषार हार धवला…

या कुन्देन्दु तुषार हार धवला…

मां सरस्वती समस्त संसार में विद्या, बुद्धि, कला, संगीत, विज्ञान तथा सभी प्रकार के सृजनात्मक ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। कहा जाता है कि मां शारदे की कृपा प्रसाद से इस धरती पर मानव में बुद्धि और ज्ञान का विकास होता है, संगीत और कला का प्रादुर्भाव होता है। पुरातन से जल देवी के रूप में पूजी जाने वाली तथा देवों की भाषा संस्कृत की जननी कही जाने वाली मां सरस्वती इस संसार के रचयिता ब्रह्मा की अर्धांगिनी के रूप में भी पूजी जाती हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि मां शारदे ने ही हिमालय से अमृत की खोज करके इसे देवताओं को समर्पित किया था। स्वच्छ-धवल वस्त्र में सुसज्जित तथा हंस पर आसीन और हस्त में वीणा धारण के साथ वर मुद्रा धारण की हुई मां सरस्वती बुद्धि, प्रज्ञा और मानव की समस्त प्रकार की मनोवृत्तियों की संरक्षिका मानी जाती हैं। वे परम चेतना हैं। वे परम ज्ञान हैं। वे परम कला और संगीत हैं। वे ही परम मेधा भी हैं।

ऋतुराज वसंत के आगमन के साथ जिस प्रकार धरती पर सरसों के खिलेे पीले फूलों एवं आम्र मंजरियों की मदमाती बयार के साथ मानव मन में नवीन ऊर्जा का संचार होता है, उसी अलौकिक और अद्भुत आभा में विद्या, विवेक, कला, संगीत, साहित्य, विज्ञान तथा दुनिया के सम्पूर्ण ज्ञान की अधिष्ठात्री मां सरस्वती की पूजा श्रद्धाभाव से की जाती है।

सरस्वती पूजन की कहानी
ऋग्वेद में विद्या की देवी मां शारदे को जल की देवी के रूप में अवतरित हुई मानी जाती हैं। मां सरस्वती के नाम की सरस अर्थात जल और वती यानि जल के प्रवाह के रूप में भी मीमांसा की जाती है। इस प्रकार के विश्लेषण का मुख्य आधार पवित्र एवं पापनाशिनी सरस्वती नदी के अस्तित्व से भी संबंध रखता है, जो ऐतिहासिक काल में आर्यों के जीवन के पालन-पोषण का मुख्य आधार थीं। सरस्वती नदी के तट पर सम्पूर्ण पवित्र कार्यों को सम्पादित किये जाने के कारण भी मां सरस्वती को वरदायिनी तथा मंगलकारिणी माना जाता हैं। सरस्वती नदी के किनारे जीवन-यापन के लिए आबादी के बसने के कारण भी मां सरस्वती को उर्वरता की देवी के रूप में पूजे जाने की परम्परा रही है।

मां सरस्वती की ज्ञान-विज्ञान, कला, साहित्य एवं संगीत की वरदायिनी देवी के रूप में अर्चना की जाती है और उन्हें विविध नामों से जानते हैं, यथा वाक्देवी, शारदा, ब्रह्मा, शतरूपा, महाश्वेता, वागेश्वरी इत्यादि। मां सरस्वती वेदों की जननी भी कही जाती हैं, क्योंकि सभी वेद-पुराण मां शारदे की कृपा प्रसाद से ही रचे गए हैं। हिन्दू देवियों में मां सरस्वती ब्रह्मा की अर्धांगिनी भी मानी जाती हैं, जिनके ज्ञान तथा बुद्धि की सम्पूर्ण शक्ति के ओज से इस ब्रह्माण्ड की रचना की गयी हैं। एक कथा के अनुसार उन्हें कार्तिकेय भगवान की अर्धांगिनी के रूप में अवतरित माना जाता है। वे त्रिशक्ति सरस्वती, लक्ष्मी तथा पार्वती के रूप में इस संसार का उद्धार करनेवाली तीन देवियों के एक अहम स्वरुप में पूजी जाती हैं। मत्स्य पुराण के अनुसार यह भी कहा जाता है कि मां सरस्वती का अवतार ब्रह्मा के मुख से हुआ है। कहते हैं कि मां सरस्वती के अत्यंत ही तेज सौन्दर्य से अभिभूत होकर ब्रह्माजी उन पर मोहित हो गये और उनकी खोज में उन्हें कई दिशाओं का  भ्रमण किया। इसी क्रम में ब्रह्मा के सिर पर एक और मस्तक का उदय हुआ जो कि मां शारदे का अवतार माना जाता है। ऐसा भी माना जाता है कि देवताओं तथा दानवों के मध्य अमृत को पाने के लिए समुद्र मंथन की योजना बनी और इसी मंथन के उपरांत अमृत कलश के साथ ही मां लक्ष्मी तथा सरस्वती के भी अवतार हुए।

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