ब्रेकिंग न्यूज़ 

फाईलों में गायब मनमोहन

सार्वजनिक जीवन में व्यक्तिगत ईमानदारी से ज्यादा महत्व नीतिगत ईमानदारी और पारदर्शी आचरण का होता है। इस कसौटी पर प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह खरे नहीं उतरते। उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर आज भी कोई उंगली नहीं उठा सकता, लेकिन उनके अनेक नीतिगत निर्णय विवादों में घिरे हैं। कोयला घोटाले से जुड़ी महत्वपूर्ण फाइलों के मंत्रालय के सुरक्षित घेरे से गायब हो जाने पर उनकी छवि को और ठेस पहुंची है। इस मुद्दे पर संसद ठप है लेकिन प्रधानमन्त्री मुंह खोलने को राजी नहीं हैं। गतिरोध के कारण महत्वपूर्ण बिल अटक गए हैं।

विपक्षी दल आरोप लगा रहे हैं कि कोयला आवंटन से जुड़ी फाइलें गायब नहीं हुईं, गायब की गई हैं। मौजूदा परिस्थिति में इस आरोप को नकारा भी नहीं जा सकता। सन् 2004 से 2009 के बीच कोयला मंत्रालय प्रधानमंत्री के पास था और इस दौरान कोयला ब्लॉक आवंटन में मची लूट की जांच अब सीबीआई कर रही है। फाइल गायब होने का खुलासा तो हाल ही में हुआ है, लेकिन सरकार को इसकी जानकारी कई माह पहले से है। सीबीआई के अनुसार गत मई माह में उसने कोयला मंत्रालय को पत्र लिखकर 226 फाइलें मागी थीं। लंबे समय तक जवाब न आने पर 14 अगस्त को फिर चि_ी लिखकर फाइल तलब की गई। मंत्रालय ने अब तक सीबीआई के किसी पत्र का जवाब नहीं दिया, जबकि फाइल सुरक्षित रखने के जिम्मेदार कोयला मंत्रालय के सेक्शन ने गत 9 मई को ही फाइल लापता होने की सूचना लिखित में उच्चाधिकारियों को दे दी थी। सीबीआई को इस प्रकरण में षड्यंत्र की बू आ रही है। कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने संसद में बयान दिया कि फाइल गायब होने का पता चलने के बाद उनके मंत्रालय ने एक जांच समिति गठित कर दी है, जिसकी कई बैठक भी हो चुकी हैं।

भारत सरकार के किसी मंत्रालय से महत्वपूर्ण फाइल गायब होना गंभीर मामला है। तुरंत रिपोर्ट दर्ज करा पुलिस को इसकी जांच सौंप दी जानी चाहिए। लेकिन न जाने क्यों कोयला मंत्रालय पुलिस और सीबीआई को जांच सौंपने से हिचकिचा रहा है। पुलिस जांच से ही पता चल सकता है कि फाइल कैसे गायब हुई और इस अपराध के पीछे किसका हाथ है। सीबीआई के अधिकारियों के अनुसार जब तक कोयला मंत्रालय रिपोर्ट दर्ज न कराए तब तक वे खुद जांच की पहल नहीं कर सकते। हां, 29 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई को स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करनी है। तब तक यदि फाइल नहीं मिली तो उसे अदालत को सब कुछ बताना पड़ेगा। इसके बाद अदालत क्या आदेश देगी, फिलहाल अनुमान लगाना कठिन है।

देश में अब तक के इस सबसे बड़े घोटाले में कई मंत्रियों, सांसदों और उद्योगपतियों के नाम सार्वजनिक हो चुके हैं। मामले की जांच कर केंद्र सरकार द्वारा गठित समिति ने 13 ब्लॉक का आवंटन रद्द कर दिया और 14 की बैंक गारंटी बढ़ा दी। मतलब यह कि गड़बड़ी की बात भारत सरकार भी स्वीकार कर चुकी है। अब दोषियों को अदालत के कटघरे तक ले जाने के लिए सीबीआई जांच कर रही है। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही इस जांच से सरकार परेशान है। जांच को निष्प्रभावी करने के लिए वह कोई कसर नहीं छोड़ रही। कुछ माह पूर्व तत्कालीन कानून मंत्री अश्वनी कुमार ने सीबीआई के हलफनामे में संशोधन कर उसे हल्का बनाने का प्रयास किया था। भेद खुल जाने और सर्वोच्च न्यायालय की तीखी टिप्पणी के बाद उन्हें मन्त्रिमण्डल से त्यागपत्र देना पड़ा। हलफनामे में बदलाव का आरोप प्रधानमन्त्री कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी (संयुक्त सचिव) पर भी लगा था। कोयला घोटाले से सीधा प्रधानमन्त्री का नाम जुड़ा है। उन्हें बचाने के लिए पूरी सरकार और कांग्रेस पार्टी एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। कहीं फाइल गायब होने की घटना इस कड़ी का एक हिस्सा तो नहीं है?

सन् 1971 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था। यह वह दौर था जब देश में समाजवाद की लहर उफान पर थी। राजा-महाराजाओं का प्रिवी पर्स समाप्त कर दिया गया था तथा बैकों का राष्ट्रीयकरण हुआ था। इसी दौर में सरकार ने कोयला खनन का राष्ट्रीयकरण भी किया। चुनिन्दा निजी कंपनियों को छोड़कर समस्त कोयला खान सरकार ने अपने हाथ ले ली। 1992 में देश ने खुली अर्थव्यवस्था की डगर अपनाई। कोयले को निजी क्षेत्र के लिए खोलने का निर्णय हुआ। इस्पात, बिजली, सीमेंट उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने इन उद्योगों को मामूली कीमत पर कोयला खादान देने की नीति घोषित की। इस नीति के तहत 1993-2004 के बीच 45 कोयला खान आवंटित की गई. सन् 2006 में एक विशेषज्ञ समिति ने कोयला ब्लाक आवंटन नीलामी से करने की सिफारिश की लेकिन संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन सरकार ने 4 साल तक समिति की सिफारिशों को दबाकर रखा। सन् 2004-2009 के बीच कोयला मंत्रालय प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह के पास था और इसी दौरान जमकर लूट मची। सरकार ने 155 ब्लॉक आवंटित किए, जो आज सीबीआई की जांच के घेरे में हैं। सीएजी ने इस लूट का दस्तावेज जारी किया और देश में हंगामा मच गया। जब तक सरकार ने माईन एंड मिनरल (डवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट-1957 में संशोधन किया तब तक 4.4 अरब टन कोयला भंडार की खान आवंटित की जा चुकी थी। यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि फिलहाल पूरी दुनिया में कोयले का वार्षिक उत्पादन लगभग 7.8 अरब टन है। निजी कंपनियों को जो खान सरकार ने कौडिय़ों की कीमत पर दी उनसे अगले 100 बरस तक कोयला निकाला जा सकता है। मतलब यह कि जिसे खान मिल गई उसकी सात पुश्तों का कल्याण हो गया।

फाइल गायब होने की घटना पर लौटते हैं। सरकार के बचाव में तर्क दिया जा रहा है कि कोयला मंत्रालय में फाइल न मिलने से जांच पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा। सीबीआई चाहे तो सीएजी से फाइल ले सकती है क्योंकि उसने फाइलों के आधार पर ही घोटाले का भंडाफोड़ किया था। यह तर्क लचर है। जरूरी नहीं की सीएजी के पास पूरे दस्तावेज हों। कोयला ब्लॉक आवंटन के दौरान किसी मंत्री, सचिव या अन्य अधिकारी ने जो टिप्पणी की, वे सब सीएजी के पास मौजूद फाइलों में होना जरूरी नहीं है। कितनी कंपनियों ने आवेदन किया, किस कंपनी की अर्जी क्यों खारिज हुई और किसकी क्यों मंजूर, इसका पता कोयला मंत्रालय की फाइलों से ही चल सकता है। किस कंपनी ने झूठ बोलकर या किसी बड़े नेता की सिफारिश पर कोल ब्लॉक पाया है, तो यह रहस्य भी मंत्रालय के कागजात खंगालने से खुल सकता है। अदालत में अपराध सिद्ध करने के लिए पुख्ता सबूत जरूरी होते हैं। इस घोटाले में कई बड़े लोग और प्रभावशाली उद्योग शामिल हैं। अपने बचाव में वे नामी वकीलों की फौज खड़ी कर सकते हैं। सारे प्रमाण होने के बावजूद उन्हें दोषी ठहराना कठिन है। फाइल गायब होने की घटना से तो लगता है कि केस कच्चा करने की पूरी तैयारी हो चुकी है। युद्ध का पुराना नियम है कि हारने वाली सेना मैदान खाली करने से पहले सब कुछ बर्बाद कर देती है, फसल जला देती है, कुओं में जहर घोल देती है, घरों में आग लगा देती है। संप्रग सरकार क्या कुछ ऐसा ही कर रही है?

 

धर्मेंद्रपाल सिंह

физическая защита информациикисть для бровей

Leave a Reply

Your email address will not be published.