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चीन से क्या हासिल करेंगे मनमोहन

दोदेशों के बीच रिश्तों में ऐसा दुर्लभ होता है कि एक ही साल में एक दूसरे के प्रधानमंत्री एक दूसरे के यहां दौरे करें। वह भी भारत और चीन के प्रधानमंत्री जब एक ही साल में एक दूसरे के यहां आए जाएं, तो राजनयिक हलकों में इस पर हैरानी जाहिर की जाती है कि आखिर सीमा पर चल रहे विवादों के बावजूद दोनों देश के आला नेता एक दूसरे के यहां आ जा कर क्या हासिल करना चाहते हैं। गत 19-21 मई को चीन के प्रधानमंत्री ली कीचयांग ने भारत का दौरा किया और अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अक्टूबर के अंत में चीन जाने की तैयारी कर रहे हैं। प्रधानमंत्री सिंह के आगामी चीन दौरे को सफल बनाने के लिए नई दिल्ली और पेइचिंग के विदेश मंत्रालय व्यस्त हैं। दोनों ऐसे समझौते की तैयारी कर रहे हैं, जिनसे प्रधानमंत्री सिंह के चीन दौरे को यादगार बनाया जा सके। लेकिन यह समझौता सीमा मसले के अंतिम हल करने को लेकर नहीं होगा। यह समझौता चार हजार किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति व सौहार्द बनाए रखने के लिए सीमा रक्षा सहयोग समझौता (बीडीसीए) का होगा जिसके तहत दोनों देशों की कोशिश होगी कि सीमा पर होने वाली घुसपैठ की घटनाओं से पैदा विवादों से बचा जा सके।भारत और चीन ने इसके पहले 1993, 1996 और 2005 में सीमा पर शांति व सौहार्द बनाए रखने के लिए विश्वास निर्माण के समझौते किए हैं और इनका ठीक से अमल होता रहा है। इसलिए हैरानी इस बात को लेकर है कि आखिर पिछले करीब चार-पांच सालों से चीन का रवैया सीमा को लेकर अचानक क्यों बदला कि चीन की ओर से घुसपैठ की वारदातें काफी बढ़ गई हैं। पिछले दस महीनों में चीनी सेना ने भारतीय इलाके में करीब 150 बार घुसपैठ की। 15 अप्रैल को देपसांग घाटी में घुसपैठ कर चीनी सैनिकों ने वहीं अपना तम्बू गाड़ लिया और तीन सप्ताह बाद उन्हें हटना पड़ा। लेकिन इस विवाद से चीनी सेना ने सबक नहीं लिया और अगस्त के दूसरे सप्ताह में अरुणाचल प्रदेश के तवांग इलाके में घुसपैठ की। इस घुसपैठ को रोकने के लिए भारत के साहसी सैनिकों ने जिस तरह से चीनी सैनिकों के साथ हाथापाई की उसका वीडियो टेलीवजन पर लोगों ने देखा है।

हैरानी की बात यह भी है कि जब अरुणाचल प्रदेश से लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी सैनिक 15 किलोमीटर भीतर घुस आए थे तब चीनी सेना के वरिष्ठ अधिकारियों का एक दल कोलकाता स्थित पूर्वी थलसैनिक कमांड के मुख्यालय में भारत और चीन की सेनाओं के बीच सैन्य सहयोग और साझा अभ्यास के कार्यक्रम तय कर रहे थे। एक तरफ सहयोग और दूसरी तरफ भारत की पीठ में छुरा घोपने की वारदातों के जारी रहने से समझ नहीं आता कि आखिर चीन चाहता क्या है। दोनों देशों के सैनिक 4 से 14 नवम्बर तक एक साझा युद्धाभ्यास करेंगे। इस अभ्यास के लिए भारतीय सैन्य दल चीन के छंगतु शहर जाएगा, जहां दोनों देशों के सैनिक आतंकवाद से लडऩे के गुर एक दूसरे को सिखाएंगे। रोचक बात यह है कि भारत की तरह चीन को अपने यहां आतंकवाद का डर पाकिस्तान की वजह से ही पैदा होता है। चीन के शिन्च्यांग प्रदेश के उइगुर विद्रोही पाकिस्तान के आतंकवादी शिविरों में प्रशिक्षण लेते हैं और वे चीन लौट कर बड़े आतंकवादी कारनामे करते हैं। चीन ऐसे आतंकवादियों से लडऩे के लिए भारत से सहयोग चाहता है, लेकिन जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की धरती से पैदा आतंकवाद को लेकर भारत के डर से सहानुभूति नहीं जताना चाहता। दूसरी ओर वह इसी कथित विवादित कश्मीर के पाकिस्तानी कब्जे वाले इलाके से होकर शिनच्यांग और कराची को जोडऩे वाले राजमार्ग और रेलवे मार्ग बनाने की तैयारी कर रहा है।

तीन साल पहले जब चीन द्वारा भारत से एक उच्चस्तरीय सैन्य दल भेजने का निमंत्रण भेजा गया तो उसके लिए भारतीय थलसेना ने उधमपुर स्थित उत्तरी कमांड के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल जसवाल की अगुवाई में अपना सैन्य दल भेजने का फैसला किया। लेकिन भारत तब हैरान रह गया जब चीन ने जनरल जसवाल के पासपोर्ट पर सामान्य वीजा के बदले नत्थी वीजा लगाने का फैसला किया, जिसका भारत ने विरोध किया और जवाब में दो साल तक चीन के साथ हर तरह के सैन्य और रक्षा सम्बन्धों को स्थगित करने का फैसला सुनाया। चीन का कहना था कि चूंकि चीन यह मानता है कि जम्मू-कश्मीर एक विवादित क्षेत्र है, इसलिए वह वहां के वाशिंदों को सामान्य वीजा नहीं जारी कर सकता। भारत के विरोध के दो साल बाद हालांकि चीन ने जम्मू-कश्मीर के लोगों को नत्थी वीजा जारी करना बंद कर दिया है, लेकिन अपनी इस नीति को पलटने का कोई सार्वजनिक आधिकारिक बयान नहीं जारी किया है। साफ है कि वह जम्मू-कश्मीर के मसले पर पाकिस्तान के पक्ष में खुलकर सामने आ गया है, जबकि चीन की कुछ साल पहले तक नीति तटस्थ देश की रहती थी।

चीन द्वारा भारतीय इलाके पर इस तरह सवाल खड़ा करना, भारत से दोस्ती की बातों के अनुरूप नहीं है। दूसरी ओर भारत और चीन के बीच तिब्बत है और भारत-चीन सीमा विवाद मुख्य तौर पर तिब्बत से लगी भारतीय सीमा को लेकर है। भारत तिब्बत के बीच सीमा का निर्धारण 1914 में ही मैकमेहोन लाइन से हो चुका था, लेकिन चीन ने 1950 में तिब्बत पर कब्जा करने के बाद, इस लाइन को मानने से इनकार कर दिया। 1950 के पहले तिब्बत स्वतंत्र देश था। इसके बाद तिब्बत को अपने कब्जे में लेने के बावजूद चीन की प्रादेशिक विस्तार की महत्वाकांक्षा बढ़ती ही रही और उसने तिब्बत और भारत के बीच सीमा रेखा को अमान्य करते हुए भारत के अरुणाचल प्रदेश पर अपना अधिकार जताने का रुख और कड़ा कर लिया है।

सीमा पर घुसपैठ से भारत और चीन के बीच रिश्तों में हाल में जिस तरह की कटुतापूर्ण वारदातें हुई हैं, उसके मद्देेनजर और भी हैरानी होती है। बात से बात बनती है, इसलिए यदि इस तरह के सर्वोच्च स्तर के इन दौरों से यदि बात बने तो यह न केवल भारत के लिए, बल्कि चीन के लिए भी दुनिया में अपनी विश्वसनीयता बनाने में काफी सहायक होगी। दोनों देशों के बीच प्रधानमंत्री स्तर की इतनी जल्दी-जल्दी होने वाली बातचीत से भारत और चीन के बीच सीमा के मसले यदि सुलझ जाते हैं तो जरूर इस तरह की बातचीत को सार्थक माना जाना चाहिए। कम से कम भारत के लिए अच्छी बात यह होगी कि 4 हजार किलोमीटर लम्बी वास्तविक नियंत्रण रेखा को अंतर्राष्ट्रीय सीमा में बदलने पर सहमति होगी और तब मौजूदा स्तर पर इसकी चौकसी की जरूरत नहीं होगी। इससे भारत के रक्षा खर्च में भारी कमी आएगी। इसीलिए चीनी सेना द्वारा लगातार घुसपैठ कर भारत को उकसाने के बावजूद भारत के सर्वोच्च नेतृत्व चाहे वह भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली सरकार हो या कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार, ने चीन के साथ बातचीत का सिलसिला जारी रखने की कोशिश की है।

हालांकि चीनी सेना ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर लगातार उकसाने वाली वारदात कर भारतीय जनमानस को नाराज किया है और चीन से होने वाली शिखर स्तर की बैठकों पर शक पैदा किया है। लेकिन, चीन के आला राजनीतिक नेतृत्व की ओर से भारत के साथ रिश्तों को लेकर जिस तरह की मीठी बातें की जाती हैं, उससे यह उम्मीद बनती है कि चीनी नेतृत्व भारत के साथ रिश्तों को लेकर गम्भीर है। यदि यह मान लिया जाए कि चीनी नेतृत्व बातचीत के नतीजों को लेकर गम्भीर नहीं है और वह भारत को मीठी बातों से बहका कर धोखे में रखना चाहता है, तब भी भारत को वही रणनीति अपना कर चीन के साथ बातचीत का सिलसिला जारी रखने में गुरेज नहीं करना चाहिए। बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रखना चाहिए। आखिरकार बातचीत बंद करने से भी भारत को अपेक्षित नतीजा नहीं मिल सकता। इसका सीधा असर सीमा पर बढ़े हुए तनाव के तौर पर देखा जाएगा। इससे चीन का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, लेकिन भारत को अपना सैन्य खर्च काफी बढ़ाते हुए सीमा पर चौकसी बढ़ानी होगी।

बातचीत जारी रखते हुए भारत को अपनी सुरक्षा तैयारी भी तेज करनी होगी और चीन से लगी सीमा पर सैन्य तैयारियों को और पुख्ता करने की जरूरत होगी। दो महीना पहले भारतीय कैबिनेट ने चीन से लगी सीमा पर करीब 60 हजार सैनिकों की एक हमलावर कोर को तैनात करने की मंजूरी दी है। जरूरत इस बात की है कि इस कोर को जल्द से जल्द तैनात करने के कदम उठाए जाएं, ताकि चीन यह नहीं समझे कि अपने इलाकों की रक्षा में भारत के संकल्प को चुनौती देना खतरे से खाली नहीं होगा।

इसलिए प्रधानमंत्री सिंह जब अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में चीन दौरे पर जाएं तो एक ताकतवर सेना रखने वाले देश के नेता की हैसियत से जाएं और चीन को साफ संदेश दें कि भारत चीन के साथ दोस्ती को काफी महत्व देता है, लेकिन वह इसके साथ ही अपनी राष्ट्रीय अखंडता को बनाए रखने के लिए चीन की किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है। भारत के साथ दोस्ती चीन के लिए भी काफी अहमियत रखती है क्योंकि विश्व रंगमंच पर भारत ने अपनी जो हैसियत बना ली है, वैसे भारत के साथ चीन भी खड़ा होना चाहेगा। चीन यदि सीमा मसले पर भारत के साथ तनाव बढ़ाने की कोशिश करेगा, तब उसकी यह विश्व छवि मजबूत होगी कि वह अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ आक्रामक रुख अपना रहा है और वह इतना विस्तारवादी हो गया है कि उसके सभी पड़ोसी चीन से परेशान हैं। चीन का आक्रामक रवैया पूरी दुनिया के लिए परेशानी पैदा करने वाला है, लेकिन चीन अपनी नई सैनिक और आर्थिक ताकत के बल पर अपना विवेक खोता लग रहा है और अपनी ताकत के आगे उïसे बाकी दुनिया में सब कुछ उसके नीचे ही दिख रहा है। चीन के इस रवैये के मद्देनजर भारत को भी चीन के सामने मजबूत इरादे के साथ अपनी बात दृढ़ता से रखने की रणनीति अपनानी होगी। प्रधानमंत्री सिंह अपने चीन दौरे में यह संदेश दे सकें कि भारत चीन के सामने झुकने वाला नहीं और वह चीन की चुनौती का मुकाबला करने की तैयारी करते रहने के साथ चीन के साथ सहयोग के रास्ते पर आगे बढऩा चाहेगा, तभी भारत विश्व रंगमंच पर अपनी हैसियत बना सकेगा।

 

रण जीत

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