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देश को चाहिए राष्ट्रवादी अर्थशास्त्र

सच यह था कि 2004-2007 कालखंड में विश्व की सभी गतिशील अर्थव्यवस्थाएं उपर उठीं। यही ‘कपल्ड इफेक्ट’ था कि हमने भी अच्छा प्रदर्शन किया। पर उसका सारा श्रेय सरकार लेती रही। भारतीय गणतंत्र तो यूं भी ‘आशावाद’ पर ही जीवित है। अत: यू.पी.ए. – 2 को राजनैतिक समर्थन के पीछे छिपी वास्तविकताओं को न तो सरकार ने कभी जनता के समक्ष रखा, न ही नीति-निर्माताओं ने सोचा कि वह समय राजकोष बढ़ाने, एक मजबूत निर्यात आधार खड़ा करने और कर-व्यवस्था व मौद्रिक नीति के माध्यम से देश में भीतरी निवेश व उद्यमशीलता बढ़ाने का था।

शायद यह शीर्षक देखकर ही अर्थशास्त्रियों के एक समूह की रुचि इस लेख को आगे पढऩे में नहीं रहे या खाद्य सुरक्षा कानून की रक्षा में लगी अर्थवेत्ताओं और ‘एक्टिविस्टों’ की एक जमात शायद हमें भ्रम मानकों में भटका कर यह बताने का प्रयास करे कि कैसे भारत में सब कुछ उतना बुरा भी नहीं है, जितना हम समझ रहे हैं। पर सच्चाई यह है कि वैश्विकरण के बिना राष्ट्रीय लक्ष्यों की नीति सुरक्षा चक्र के असली व गंभीर परिणाम भुगतती भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास गाथा में कालखंड का यह संकट अन्य किसी भी संकट से बड़ा है। और शायद लंबा भी।

यू.पी.ए.-2 में जो अर्थ-आघात, मसलन रुपये की दारुण गिरावट, एन.पी.ए. का लगातार बढऩा, भारतीय कंपनियों के सतत बढ़ते बाह्य ऋण (2009 में 118 बिलियन से 2013 में 224 बिलियन अमेरिकी डॉलर), प्रभावी मांग में कमी, औद्योगिक उत्पादन की दर में गिरावट और 5 प्रतिशत से नीचे की विकास दर – पटल पर आए उनकी नाट्य कथा यू.पी.ए.-1 में लिखी जा चुकी थी। वित्तीय आपातकाल की ओर बढ़ते देश ने वित्तीय कुप्रबंधन के चलते अपनी विकास गाथा का गला स्वयं ही घोंट दिया। 7 प्रतिशत से 9.5 प्रतिशत की जी.डी.पी. में ज्वार के साथ उपर जाती भारतीय अर्थव्यवस्था के सिपहसालारों ने यू.पी.ए. की आरंभिक शकुन-सफलता बताकर विदेशी मुद्रा भंडार का प्रभावी दहेज दिखाया। गिरते राजकोषीय घाटे को भुनाकर एक अमितव्ययी नीति-वातावरण तैयार कर दिया, जिसमें उछाल की मस्ती थी और जरुरत से ज्यादा आत्मविश्वास भरा व्यय था। आत्मवंचना से सच नहीं रचे जाते।

सच यह था कि 2004-2007 कालखंड में विश्व की सभी गतिशील अर्थव्यवस्थाएं उपर उठी। यही ‘कपल्ड इफेक्ट’ था कि हमने भी अच्छा प्रदर्शन किया। पर उसका सारा श्रेय सरकार लेती रही। भारतीय गणतंत्र तो यूं भी ‘आशावाद’ पर ही जीवित है। अत: यू.पी.ए.-2 को राजनैतिक समर्थन के पीछे छिपी वास्तविकताओं को न तो सरकार ने कभी जनता के समक्ष रखा, न ही नीति-निर्माताओं ने सोचा कि वह समय राजकोष बढ़ाने, एक मजबूत निर्यात आधार खड़ा करने और कर-व्यवस्था व मौद्रिक नीति के माध्यम से देश में भीतरी निवेश व उद्यमशीलता बढ़ाने का था। उल्लास से असमय मृत्यु की कहानी विचित्र लग सकती है, पर भारत में पिछले आठ वर्षों में यही हुआ है।

कारण स्पष्ट है। राष्ट्रीय-नीति वरीयता के विषय में सोचने का समय किसे है, देश में ‘शक्ति केन्द्रों’ की द्वैधता का एक खतरनाक प्रयोग कांग्रेस ने किया है, जिसका खामियाजा भारत की आम जनता ने भुगता है। और भुगता है भारत की ‘प्रतिष्ठा’ ने, एक देश के रुप में, एक अर्थव्यवस्था के रुप में। और देश के अर्थशास्त्री अब भी खेमों में बंटे राष्ट्रीय हितों की वैचारिक द्वंद्वों की धुंध में और भी धुंधला कर रहे हैं। मेरे पूर्व अध्यापक, भारत में प्रधानमंत्री के पूर्व सलाहकार प्रो. बासु यह तो अवश्य कहते हैं – ”दीर्घकाल में आर्थिक वृद्धि दर के लिए ‘गुड गवर्नेंस’, प्रशासनिक सुधार व मूल्य आधारित व्यवसायिक वातावरण चाहिए, पर वे साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था के ‘फंडामेंटल्स’ को मजबूत बनाते हैं। साथ ही खाद्य सुरक्षा बिल की भी वकालत कर लेते हैं।’’ जिस अर्थव्यवस्था में स्वयं वित्तमंत्री 2009-11 नीतिगत असफलताओं व निर्णयों को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार चुके हों, वहां खाद्य-सुरक्षा कानून पर नीतिगत हठधर्मिता को राष्ट्रीय हितों के पक्ष में कैसे माना जाय? यानि एक और नीतिगत चूक के परिणामों को भुगतने की पूर्व तैयारी? हमारे यहां राष्ट्रीय ‘फंडामेंटल्स’ ही मजबूत नहीं है।

हमने कैड की विपरीत संरचना पर किस मंच से बात की, क्या कभी हम चिंतित हुए कि भारत की कमजोर विदेशी मुद्रा भंडार के पीछे अनावश्यक आयात थे और उनका एक महत्वपूर्ण भाग हमने चीन को परिपोषित करने में खर्च किया। यह सर्वविदित तथ्य है कि 2006-07 से 2012-13 के बीच भारत में चीन का आयात 13 से बढ़कर 18 प्रतिशत हो गया। यह सारा आयात पूंजीगत ही नहीं बल्कि उपभोक्ता वस्तुओं में भी लगातार बढ़ा। यह जानना शायद और भी दिलचस्प होगा कि इंजीनियरिंग उत्पाद आयात 2010-11 में 1341.13 करोड़ अमेरिकी डॉलर था, जो एक वर्ष में यानि 2011-12 में 23.32 प्रतिशत बढ़ गया। पर सबसे ज्यादा गति से बढ़ा फुटवियर का आयात 2010-11 में 11.92 करोड़ए 2011-12 में 51.26 प्रतिशत बढ़ गया। 2012-13 में 21.11 करोड़ डॉलर व अब पहली तिमाही में 2 प्रतिशत और बढ़ गया है। भारत फुटवियर तक आयात करे और सामरिक दृष्टि से सीमा पर चीन से लताड़ा जाए, क्या इस आर्थिक-सामरिक नीति की द्वैधता समझने के लिए भी भारत का नेतृत्व सक्षम नहीं है?

यह नेतृत्वहीनता ही तो है कि जहां भारत की विकास दर 5.5 प्रतिशत के भीतर रहने का भय है, वहीं भारत के कई सारे पिछड़े राज्य ‘डबल डिजिट’ विकास दर से इसी अवधि में बढ़े हैं। बिहार, मध्य प्रदेश, गुजरात, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश सभी में सक्षम व सबल नेतृत्व व ‘क्षेत्रीय लक्ष्यों’ के प्रति प्रतिबद्धता के कारण ही यह संभव हुआ है। ऐसे किन्हीं ‘राष्ट्रीय लक्ष्यों’ के प्रति प्रतिबद्धता हमें केन्द्रीय सरकार की अर्थनीति में कहीं दिखती है? 2009-12 तक तो देश ने नीतिगत दृष्टि से एक अंधेरा शून्यकाल ही देखा है। चाहे देश की आंतकरिक सुरक्षा हो, विदेश नीति हो या फिर अर्थनीति, आम भारतीय यह अनुभव करता है कि सभी में राष्ट्रीय आकांक्षा या ‘राष्ट्रीय लक्ष्य’ का ही अभाव है। भारत केवल ‘लोबल विलेज’ नहीं है। जनाकांक्षाओं का, अस्मिता का, ग्लोबलाईजेशन से पूर्व व परे ‘सांस्कृतिक राष्ट्र’ भी है। भारत के राष्ट्रीय आर्थिक लक्ष्य स्वतंत्रता के 66 वर्ष बाद भी परिभाषित नहीं हो सके यह चिंता की बात है।

इन दिनों विभिन्न टीवी चैनल पर ‘ग्रोथ बनाम इन्क्लूसिव ग्रोथ’ या ‘ग्रोथ बनाम डिस्ट्रीब्यूशन’ की जो तर्करचना दिखाई देती है वह बेवजह है। क्योंकि भारत में विकास और न्यायपूर्ण वितरण के प्रति प्रतिबद्धता, नीतियों में अनूदित नहीं होती दिखती। क्योंकि इन दोनों लक्ष्यों या किसी एक के प्रति भी गंभीर चिंतन होता जो संरचनागत सुधार होने थे, वे ठोस रुप से हो पाते। ये वे संचरनागत सुधार होते, जिनसे भारत का औद्योगिक विनिर्माण, सेवा क्षेत्र व कृषि का आधारभूत ढ़ांचा को नवपरिभाषित किया जा सकता था। हम अपनी उत्पादकता को बढ़ाने के लिए कोई ठोस कदम कभी नहीं उठा सके। हमारे प्रतिबंध क्या हैं? क्या यह भी हम ठीक से समझ पाए हैं? रघुराम राजन जी ने प्रधानमंत्री का आर्थिक सलाहकार बनते ही देश के ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ की बात की थी। जिस राष्ट्र के पास इतनी सक्रिय ‘युवा-श्रमशक्ति’ हो, उसमें उस जनशक्ति को आर्थिक परिसंपत्ति में बदलने की राष्ट्रीय नीति क्यों वरीयता नहीं होनी चाहिए? अनाज भंडारण व ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश क्या केवल खुदरा क्षेत्र की एफ..डी.आई. द्वारा ही हो सकता है? शिक्षा, न्याय व प्रशासनिक सुधार जैसे संरचनागत सुधार से ‘गवर्नेंस’ का जो बेहद जरुरी उत्पादकता उद्दीपक था, उसका महत्व ही हमारे अर्थशास्त्र में नहीं जुड़ पाया। क्यों? क्योंकि हमारा अर्थशास्त्र राष्ट्रवादी लक्ष्यों के आधार पर संशोधित या पुनर्रचित करने का प्रयत्न ही हमने नहीं किया।

मान्य है कि वैश्वीकरण के युग में सीमाबंदी करके केवल राष्ट्रीय वरीयताओं पर विकास के मॉडल नहीं रचे जा सकते, क्योंकि ‘मुक्तता’ से लाभ व हानि के तयशुदा गणित हैं और अगर आपने खुली अर्थव्यवस्था की प्रतिबद्धता स्वीकार की है तो आपका अपना ‘कैलकुलस’ उस गणित के आधार पर ही बनाना होगा। पर इसके साथ यह भी तो तथ्य है कि आप अपनी देशीय स्थितियों के आधार पर अपनी अर्थनीति को गढ़ कर उसे जन-कल्याणकारी राष्ट्र की, अपनी आकांक्षा के साथ जोड़ कर नीति-व्यूह खड़े करेंगे, जिससे आपका दीर्घकालिक संवैधानिक लक्ष्य पूरा हो सके। भारत ने यह कब किया? राष्ट्रीय हितों के लिए अर्थशास्त्र – यह कब हुआ? हां, राजनैतिक हितों के लिए अर्थशास्त्र का उपयोग नवीनतम सिद्धांत है, जिसका उपयोग नरेगा, खाद्य सुरक्षा बिल इत्यादि में स्पष्टता से दीखता है। हमने आखिरी बार राष्ट्र अनुरुप अर्थशास्त्र की बात करते हुए किस राजनैतिक नेतृत्व को सुना? आनंद शर्मा से सुना कि एफ..डी.आई. से कृषक सुरक्षित रहेगा। कपिल सिब्बल से ‘जीरो लॉस’ सिद्धांत सुना। रिजर्व बैंक के गवर्नर से रुपये के विषय में सरकार को तर्क करते सुना और चिदंबरम की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की गिरावट पर समीक्षा भी सुनी। इन बयानों से विश्वासनीयता का ‘डेफिसिट’ बढ़ता ही गया। इसलिए बात केवल राजस्व घाटे सा चालू खाते के डेफिसिट की नहीं है, बात राजनैतिक नेतृत्व में ही ‘डेफिसिट’ की है। नहीं तो क्या कारण है कि ‘शिर्जा एब’ का जापान, ‘एनरिक पेना’ का मैक्सिको और ‘जिनपिंग’ का चीन इस दौर में भी राष्ट्रीय अर्थशास्त्र के ‘विजन’ को लेकर प्रेरक-उद्दीपक घरेलू आर्थिक वातावरण खड़ा कर रहे हैं। जिनपिंग का ‘चीनी सपना’ पूरी गति से आर्थिक कुलांचे भर रहा है। मैक्सिको अपने समस्त विरोधाभासों के बावजूद विकासित राष्ट्र बनने की संधि पर खड़ा है और भारत के सारे अर्थविद् 2013 में किंकत्र्तव्यविमूढ़ खड़े भारतीय मुद्रा, भारतीय प्रतिष्ठा को धूल-धूसरित होते देख भर रहे हैं। क्या यही विश्व की उभरती आर्थिक शक्ति भारत का दीर्घकालिक स्वप्न था? क्या यही भारत की विकास गाथा का ‘क्लाइमैक्स’ होने वाला था?

कहानी अलग हो सकती थी, अगर हमारी राजनैतिक इच्छाशक्ति, राजनैतिक नेतृत्व राष्ट्र-सम्मत अर्थशास्त्र के प्रति प्रतिबद्ध होता। सबसे बड़ा भ्रष्टाचार यही हुआ है। शेष तो पूरक भ्रष्टाचार है – जो कोयले से काला है और 2जी से अधिक चातुर्य भरा।

हमने देशीय संवैधानिक मूल्यों के आधार पर जिस जन-कल्याणकारी अर्थनीति की रचना का स्वप्न देखा था, उसके रुपांतरण के लिए कोई संस्थागत या ढ़ांचागत व्यवस्था नहीं की। यहां नीयत की बात थी। नीति बाद में आती है।

प्रो. ज्योति किरण

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