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भोजन का अधिकार : है ये ‘गेम चेंजर का दांव !

कांग्रेस ने जो पिछले चुनाव यानि 2009 के लोकसभा चुनाव में वादा किया था वह अगले चुनावों से कुछ महीनों पहले पूरा कर दिया। भारत की 82 करोड़ आबादी को भोजन के अधिकार का सुरक्षा कवच मुहैया कराने वाली केंद्र सरकार ने अगले चुनावों में वोट की सुरक्षा का दांव चला है।

इस कानून के तहत देश की एक तिहाई आबादी को भोजन का अधिकार मुहैया कराने के लिए 6.2 करोड़ टन अनाज की जरूरत पड़ेगी। इस कानून को सीधे-सीधे कांग्रेस अध्यक्ष और यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी के एजेंडे से जोड़ कर देखा जा रहा है। मजेदार बात यह है कि इसके पक्ष में संसद में प्रमुख विपक्षी दल भाजपा भी उतर आई। लोकसभा में इस पर बहस के दौरान नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने भी कहा कि इस कानून में कई खामियां हैं, जिन्हें भाजपा शासन में आने पर सुधार करेगी। वैसे भी भूख के खिलाफ इस जंग में कोई भी सीधा विरोध कर अपने वोट बैंक को जोखिम में नहीं डालना चाहता।

हालांकि जिस तरह से इस समय देश के आर्थिक हालात डांवाडोल हंै और रुपया धड़ाम-धड़ाम गिर रहा है, उसमें यह आशंका भी है कि इस कानून के क्रियान्वयन से वित्तीय घाटा बढ़ेगा और हालात बेकाबू हो जाएंगे। दिलचस्प है कि इस बिल के क्रियान्वन पर 40 हजार करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च होने का अनुमान है। पहले से इस देश में वर्ष 2012-13 के बजट में भोजन सब्सिडी के लिए 85 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान था, जो इस बिल के बाद 1,25,000 करोड़ रुपये हो जाएगा, जो सकल घरेलू उत्पाद का 1 फीसदी है। अगर हम इसकी तुलना हर साल दिए जाने वाली कारपोरेट सब्सिडी – 5,29,432 करोड़ रुपये (वर्ष 2011-12) से इसकी तुलना करें तो यह कुछ नहीं है। एक तरह से कहा जा सकता है कि जिस मंदी की गिरफ्त में भारतीय अर्थव्यवस्था आ रही है, उसकी वजहें भोजन के अधिकार में खोजना जल्दबाजी होगी।

बहरहाल, लोकसभा में इस बिल पर चर्चा के दौरान 24 सांसदों ने शिरकत की। कांग्रेस की तरफ से सोनिया गांधी ने मोर्चा संभालते हुए इसे भूख-कुपोषण के खिलाफ ऐतिहासिक कदम बताया। सोनिया ने बहुत कुछ पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मशहूर नारे – गरीबी हटाओ के अंदाज में ही इसे भूख हटाओ का नारा दिया है। संसद में भाजपा नेता ने अपनी बात की शुरुआत तुकबंदी से की ‘जब आप आए थे, आप बिल लाने वाले थे, अब आप बिल लाने वाले हैं, तो आप जाने वाले हैं। यानी भाजपा सहित बाकी विपक्षी पार्टियों को भी इस बात का सहज अंदाजा है कि इस बिल का फायदा बड़ी आबादी को मिलेगा और इसका दूरगामी असर पड़ेगा। यही वजह रही कि लोकसभा में चर्चा के दौरान इसका कड़ा विरोध नहीं हुआ।

यह बिल देश की दो-तिहाई जनता को हर महीने 5 किलो अनाज (चावल, गेहूं और मोटा अनाज) तीन से एक रुपये प्रति किलो के हिसाब से मुहैया कराने का वादा करता है। हालांकि इसके साथ-साथ 2.43 करोड़ अति गरीब परिवारों को अंत्योदय अन्न योजना के तहत सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए 35 किलो अनाज हर परिवार को हर महीने मिलना जारी रहेगा। गौरतलब है कि केंद्र की प्रगतिशील गंठबंधन सरकार खाद्य सुरक्षा बिल को लाने से पहले इस पर अध्यादेश ला चुकी थी।

खाद्य सुरक्षा कानून बनने से देश की दो तिहाई आबादी को सस्ता अनाज मिलेगा। खाद्य सुरक्षा बिल के तहत देश की साढ़े 63 प्रतिशत जनता को खाद्य सुरक्षा प्रदान की जाएगी। इससे लाभ प्राप्त करने वालों को प्राथमिकता वाले परिवार और सामान्य परिवारों में बांटा गया है। प्राथमिकता वाले परिवारों में गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वाले और सामान्य कोटि में गरीबी रेखा से ऊपर के परिवारों को रखे जाने की बात कही गई है। ग्रामीण क्षेत्र में इस विधेयक के दायरे में 75 प्रतिशत आबादी आएगी, जबकि शहरी क्षेत्र में इस विधेयक के दायरे में 50 प्रतिशत आबादी आएगी। बिल में प्रत्येक प्राथमिकता वाले परिवारों को तीन रूपये प्रति किलोग्राम की दर से चावल, दो रूपये प्रति किलोग्राम की दर से गेहूं और एक रुपये की दर से मोटा अनाज उपलब्ध कराने की बात कही गई है। जबकि सामान्य श्रेणी के लोगों को कम से कम तीन किलो अनाज न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधे दाम पर दिया जाएगा। इसके मुताबिक प्रत्येक गरीब परिवार को हर माह 25 किलो अनाज मिलेगा। गांवों की 75 फीसदी और शहरों में करीब 50 फीसदी आबादी तक यह योजना पहुंचेगी। अनाज की मांग 5.5 करोड़ मिट्रिक टन से बढ़ कर 6.1 करोड़ मिट्रिक टन हो जाएगी।

ग्रामीण क्षेत्रों में जिस 75 प्रतिशत आबादी को इस विधेयक का लाभ दिया जाएगा, उसमें से कम से कम 46 प्रतिशत प्राथमिकता श्रेणी के लोगों को मिलेगा। इसी तरह शहरी इलाक़ों में कुल आबादी के जिस 50 फीसदी हिस्से को खाद्य सुरक्षा प्रदान की जाएगी, उनमें से कम से कम 28 प्रतिशत प्राथमिकता श्रेणी के लोगों को मिलेगा। इस योजना को फिलहाल 3 साल के लिए लागू करने की बात कही जा रही है। खाद्य सुरक्षा योजना के अंतर्गत मिड डे मील, आईसीडीएस भी शामिल हो जाएंगे। अनुमान के मुताबिक इस योजना के लागू होने से सरकार को प्रतिवर्ष 1 लाख 24 करोड़ रुपए की सब्सिडी देनी होगी। एक किलो चावल पर 23.50 और गेहूं पर प्रतिकिलो 18 रुपए की सब्सिडी देनी होगी। 3 साल में करीब 6 लाख करोड़ की सब्सिडी दिए जाने का अनुमान है।

यह विधेयक सबसे पहले 2011 में संसद में पेश किया गया था। लेकिन उस समय भी सरकार के भीतर इसे लेकर असहमति थी और कृषि मंत्री शरद पवार जैसे कई मंत्री भी इसके विरोध में थे। समाजवादी पार्टी सहित अन्नाद्रमुक ने भी इसका विरोध किया था। सपा और अन्नाद्रमुक ने लोकसभा में भी इसके विरोध में बोला। इस तरह से 2011 से लेकर 2013 तक यह कानून लटका रहा। चूंकि सरकार में भी इसे सोनिया गांधी के एजेंडे के रूप में देखा जाता रहा है, इसलिए 2014 से पहले इसे पारित कराना कांग्रेस की राजनीतिक बाध्यता भी बन गई थी।

इसके अलावा, वर्ष 2001 से देश की सर्वोच्च न्यायालय में भोजन के अधिकार की गारंटी के लिए दाखिल जनहित याचिका ने भी देश भर में इस अधिकार के पक्ष में माहौल बनाने और इसे एक राजनीतिक मांग के रूप में जिंदा रखने की जमीन तैयार की। इस बिल के संसद में पेश होने के बाद मसौदे में ठेकेदारों के पिछले रास्ते से किए गए प्रवेश को रोकने के लिए भोजन के अधिकार आंदोलन की नेता कविता श्रीवास्तव सहित कई लोग सोनिया गांधी से मिले और संशोधनों की मांग की। जिसे बाद में मान लिया गया। भोजन के अधिकार आंदोलन के साथ नोबल पुरस्कार विजेता अमत्र्य सेन और ज्यां द्रेज जैसे देश के आला अर्थशास्त्री जुड़े। वे सरकार के मौजूदा भोजन के अधिकार विधेयक से पूरी तरह से सहमत न होने के बावजूद इस विधेयक को संसद के मौजूदा सत्र में पारित कराने के पक्ष में हैं। उनका कहना था कि यह एक जरूरी अधिकार है, जिसमें और देरी देश के गरीबों के साथ धोखाधड़ी होगी। देश की हकीकत अगर एक तरफ चमचमाती विकास दर है तो दूसरी तरफ गरीबी-कुपोषण और भूख से मौतें हैं।

वैश्विक भूखमरी सूचकांक में भारत का स्थान 65वां हैं। इसके अलावा भारत के 5 साल से कम उम्र के बच्चे भीषण रूप से कुपोषण का शिकार हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 23 फीसदी लोग भूखे सो रहे हैं। एक तरफ लोगों के पास खाने को अनाज नहीं हैं, दूसरी तरफ सरकारी गोदामों में अनाज सड़ जाता है। हमारे अनाज भंडारों में 7 करोड़ टन अनाज हैं, जबकि हमें बफर स्टॉक में रखने के लिए ढाई से 3 करोड़ टन की ही जरूरत होती है। ऐसे में यह सवाल उठता रहा है कि यह अनाज किस तरह से भूखी आबादी तक पहुंचाया जाए, इसका कोई रास्ता खोजना जरूरी है। इस बारे में सकारात्मक पहल लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट भी सरकार को कई बार कह चुका है। भारत में लगभग 50 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। दो तिहाई औरतें खून की कमी से पीडि़त हैं। एक तिहाई लोगों का वजन सामान्य से कम है। और अनुसूचित जातियों और जनजातियों की तो और भी बुरी हालत है।

इन परिस्थितियों में खाद्य सुरक्षा कानून बेहद जरूरी दिखाई देता है। हालांकि इसमें मिलने वाले अनाज की मात्रा अपर्याप्त दिखाई देती है। प्रति व्यक्ति महीने में 5 किलो अनाज का मतलब यह हुआ कि प्रति व्यक्ति रोजाना करीब 160 ग्राम अनाज खाएगा। इतने कम में किसी का पेट भरना संभव नहीं। फिर इसमें चावल और आटे के अलावा दाल, तेल आदि का प्रावधान जोडऩे की भी मांग है, ताकि जमीनी स्तर पर कुपोषण से लड़ा जा सके।

आम चुनावों में करीब 8 महीने रह गए हैं। ऐसे में सोनिया गांधी और उनकी टीम ने पूरा जोर लगाकर जिस तरह से इस बिल को पारित कराया है उससे यह साफ है कि कांग्रेस इस खेल में पासा पलटने वाले दांव (गेम चेंजर) के रूप में देख रही है। कांग्रेस का यह आंकलन है कि जिस तरह से 2009 के आम चुनावों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) और किसानों की कर्ज माफी, सूचना का कानून आदि ने देश भर में उसके पक्ष में माहौल बनाया था, उसी तरह का चमत्कार भोजना का अधिकार भी कर सकता

भोजन के अधिकार से देश में भोजन पर दी जाने वाली सब्सिडी बढ़कर 1,25,000 करोड़ रुपए हो जाएगी, जो सकल घरेलू उत्पाद का 1 फीसदी है।
इससे 75 फीसदी ग्रामीण और 50 फीसदी शहरी आबादी को फायदा मिलेगा।
इसके तहत प्रति व्यक्ति को 5 किलो चावल, गेहू और मोटा अनाज प्रति माह क्रमश: 3, 2 और 1 रुपये में मिलेगा।
भोजन के अधिकार पर 40 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च आएगा।
महिलाओं के सशक्तिकरण की राह खोलेगा। राशन कार्ड के लिए 18 साल से अधिक उम्र की महिलाओं को घर का मुखिया माना जाएगा। गर्भवती और दूध पिलाने वाली महिलाओं को 6 माह तक हर महीने 1,000 रुपए मिलेंगे।
 गुलमोहर

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