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अयोध्या की ८४ कोसी परिक्रमा और मुसलमानों की आहत भावनाएं..

तीर्थ यात्राएं और परिक्रमा भारत की पुरानी परंपरा है। जम्मू-कश्मीर में अमरनाथ की यात्रा के लिए देश के कोने-कोने से लोग आते हैं। आन्ध्रप्रदेश में तिरुपति बाला जी, अमृतसर में स्वर्ण मंदिर, असम में कामाख्या देवी, ओडीशा में जगन्नाथ पुरी, गया जी में बौद्ध मंदिर इत्यादि की यात्राएं साल भर चलती ही रहती हैं। इसी प्रकार परिक्रमाओं की परम्परा है। ब्रज में गोवर्धन परिक्रमा, वाराणसी की 6 कोसी परिक्रमा, कैलाश मानसरोवर में कैलाश परिक्रमा, जिसे तिब्बत के लोग कैलाश कोरा कहते है, सर्व विदित हैं। प्राचीन काल में तो बर्मा से, थाईलैंड होते हुए कम्बोडिया के अंगकोरवाट विष्णु मंदिर तक, स्थल मार्ग से यात्रा की परंपरा थी। गुरु नानक देव तो अपने कुछ शिष्यों को लेकर प्राय: यात्रा पर ही रहते थे। वे अपनी इन यात्राओं में रामेश्वरम से होते हुये श्रीलंका तक गये। उधर बगदाद तक भी जा पहुंचे थे। राहुल सांकृत्यायन ने तो मध्य एशिया के बाकू तक में एक पंजाबी साधु की यात्रा और दुर्गा मंदिर में धूना लगाने की कथा लिखी है। इन यात्राओं और परिक्रमाओं में से कुछ के लिये तो समय भी निर्धारित है। जैसे देश भर में भगवान शंकर के भक्तों की कांवड़ यात्रा के लिये सावन मास निश्चित है। लेकिन अनेक यात्राएं व परिक्रमाएं साल भर भक्त अपनी सुविधा के अनुसार करते हैं। जब से यातायात के साधन बढ़े हैं, यात्राओं व परिक्रमाओं का विस्तार हुआ है, तब से जो परिक्रमा या यात्रा पहले साल में केवल निश्चित दिनों में होती थी, वे प्राय: साल भर होने लगीं हैं। अरुणाचल प्रदेश में लोहित जिला में परशुराम कुंड की यात्रा पहले वैशाख मास में होती थी और उसमें भी स्थानीय लोग ही आते थे, लेकिन अब तो वर्ष भर वहां श्रद्धालु जाते रहते हैं। लद्दाख में सिन्धु दर्शन यात्रा का पिछले कुछ वर्षों में ही विस्तार हुआ है। ये यात्राएं व परिक्रमाएं एक प्रकार से पूरे देश को जोडऩे का काम करती हैं। परिक्रमाएं देश की एकात्मता का स्वर हैं। शंकराचार्य ने देश के चारों कोनों की पैदल यात्रा कर सारे देश को एक सूत्र में पिरोया था। जम्मू-कश्मीर में राजौरी के बन्दा बहादुर महाराष्ट्र में अपना आश्रम बना कर बैठे थे।

लेकिन इन सभी परिक्रमाओं में सब से बड़ी परिक्रमा है, अयोध्या की चौरासी कोस की परिक्रमा। आज की गणना के हिसाब से चौरासी कोस का अर्थ 250 किलोमीटर है। वैसे तो आजकल सीता राम केदलिया जी भारत परिक्रमा कर रहे हैं। देश के एक कोने से दूसरे कोने को अपने पैरों से नापते हुये। साधु संतों के लिये हर दिन यात्रा का दिन ही होता है। लेकिन अभी हाल ही में इन यात्राओं को लेकर एक नई समस्या खड़ी हो गई है। 25 अगस्त से 13 सितम्बर तक साधु संत अयोध्या की चौरासी कोसी यात्रा कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के एक मंत्री रामपुर के मोहम्मद आजम खान का कहना है कि अयोध्या की यात्रा से मुसलमानों की भावनाएं आहत हो रही हैं। पिछले दिनों विश्व हिन्दु परिषद के मार्गदर्शक अशोक सिंहल मुलायम सिंह यादव से मिले थे। बाद में आजम खान को इस का पता चला तो उन्होंने बताया कि इससे मुसलमानों में गलत संदेश जायेगा। वैसे तो वक्त-वक्त की बात है कि रामपुर के आजम खान, राम की अयोध्या की परिक्रमा में ही मुसलमानों में गलत संदेश देख रहे हैं। जिस रामपुर से राम परिक्रमा शुरु होनी चाहिये थी, उसी रामपुर से उसका विरोध हो रहा है। यदि मध्यकाल में हिन्दुस्तान अरबों, तुर्कों, अफगानों व मध्य एशिया के इस्लामी मंगोलों से न पराजित होता तो कम से कम रामपुर से यह आवाज नहीं आ सकती थी। लेकिन जैसा कि कहा गया है, वक्त-वक्त की बात है। पर आजम खान इतना तो जानते होंगे कि अब तो भारतीय इतिहास का मध्यकाल नहीं है। यह 21वीं शताब्दी है। इसके बावजूद वे मध्यकाल के मुगलों की भाषा का प्रयोग क्यों कर रहे हैं ?

पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री ने भी बताया था कि ‘अफजल गुरु साहिब’ को फांसी देने से मुसलमानों की भावनाएं आहत होंगी। कुछ लोग कसाब साहिब को फांसी देने से भी मुसलमानों की भावनाएं आहत होने का रोना रो रहे थे। जब शिया समाज के लोग, अन्याय से लड़ते हुये इमाम हुसैन के वीर गति को प्राप्त हो जाने की स्मृति में ताजिया निकालते हैं, तब भी मुसलमानों की भावनाएं अत्याधिक आहत हो जाती हैं। भारत मां को सिजदा करने से भी मुसलमानों की भावनाएं आहत हो जाती हैं। पिछले दिनों संसद में एक मुसलमान की भारत माता को सिजदे का गीत वन्दे मातरम सुन कर ही भावनाएं इतनी आहत हुईं कि वह संसद छोड़ कर ही भागा। या खुदा, कहीं गलती से भी भारत मां की स्तुति का एक शब्द भी कान में न पड़ जाये। पिछले दिनों बिहार के नवादा में तो एक ढ़ावे के मालिक द्वारा केवल यह कह देने कि श्रावन मास में यहां मांसाहारी भोजन नहीं बनता, मुसलमानों की भावनाएं भड़क उठीं और दंगा तक हो गया। दीवाली के दीपक देख कर, मंदिर का संगीत सुन कर, होली का रंग देख कर, विजय दशमी का राम देख कर, कर्बला का हुसैन देख कर मुसलमानों की भावनाएं आहत हो जातीं हैं। और अब ये अयोध्या की चौरासी कोस की परिक्रमा देख कर आहत हो रही हैं।

समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव को शायद स्वयं पता नहीं चलता कि मुसलमानों की भावनाएं किस-किस चीज से आहत होती हैं। लेकिन वे ठहरे घुटे हुये राजनीतिज्ञ। उन्होंने यह महकमा मोहम्मद आजम खान को दे रखा है। जैसे ही मुसलमानों की भावनाएं आहत होने लगती हैं, वह तुरन्त जाकर मुलायम सिंह को कान में बता देते हैं। लेकिन लगता है चौरासी कोसी यात्रा से भावनाएं आहत ही नहीं, उत्तेजित भी होने लगीं हैं, इसलिये इस बार वे कान में नहीं बल्कि चिल्ला कर बता रहे हैं। मुलायम सिंह जिन्दगी में और सब कुछ बर्दाश्त कर सकते हैं, लेकिन मुसलमानों की भावनाएं आहत होती नहीं देख सकते। इससे उनको कुछ कुछ होने लगता है। इसलिये उन्होंने पक्का बंदोबस्त कर दिया है। अयोध्या के आसपास भी कोई रामभक्त फटक नहीं पायेगा। सरयू नदी पर भी पहरा बिठा दिया है। कोई इसके पानी को छूकर तो देखे। इधर सरयू नदी के पानी में कोई रामभक्त उतरा नहीं उधर आजम खां ने खांसना शुरु किया नहीं। मुलायम सिंह आजम खान की खांसी की बीमारी से बहुत डरते हैं। उनका मानना है कि जब आजम खां को खांसी हो जाती है तो मुसलमान समाजवादी पार्टी को वोट नहीं देते। मुसलमान वोट नहीं देंगे तो मुलायम सिंह का खानदान सत्ता में नहीं आता। हिन्दोस्तान में यदि किसी को सत्ता प्राप्त करनी है तो वह मुसलमान के वोट से ही प्राप्त कर सकता है, ऐसा नेहरु के वक्त में ही निश्चित हो गया था। इसलिये आजम खां की खांसी का इलाज करना जरुरी है। ऐसा नहीं कि इसका इलाज केवल मुलायम सिंह ही करना चाहते हैं। सोनिया कांग्रेस से लेकर लालू यादव तक बरास्ता नीतिश कुमार तक सभी झोले में आजम खानों की खांसी के इलाज की गोलियां लेकर घूम रहे हैं। देखना है वे किसकी पुडियों को गटकते हैं? वैसे सोनिया कांग्रेस का वश चले तो वह इस देश में सभी तीर्थ यात्राओं एवं परिक्रमाओं को ही प्रतिबन्धित कर दें। ऐसा हो जाये तो फिर किसी मुसलमान को खासी हो ही न।

लेकिन अगला प्रश्न ज्यादा महत्वपूर्ण है। इस देश के सामान्य सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक क्रियाकलापों को देख कर मुसलमानों की भावनाएं आहत क्यों होती हैं? यह एक प्रकार की एलर्जी है। किसी तीर्थ यात्रा को देख कर या किसी ऐतिहासिक स्थान की परिक्रमा होते देख इस देश के मुसलमान एलर्जी का शिकार क्यों हो जाते हैं ? यह बीमारी कहां से आई? यह इस देश के मुसलमानों की आनुवांशिक बीमारी तो हो नहीं सकती, क्योंकि इस देश के मुसलमानों के पुरखे कुछ सौ साल पहले तक हिन्दू ही थे और इन्हीं तीर्थ यात्राओं और परिक्रमाओं में भजन गाते हुये भाग लेते थे। अत: अचानक ही उन की संतानों को इन्हीं तीर्थयात्राओं से एलर्जी हो सकती है, इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। ये मुसलमान शत प्रतिशत भारतीय हैं और ईरान की भाषा में कहना हो तो ‘इन हिन्दी ए’। एक संभावना और हो सकती है। इस देश पर आक्रमण करने के लिये अलग अलग समय पर अरब, तुर्क, मुगल और अफगान मुसलमान विदेशों से आये थे। स्वभाविक ही वे विदेशी थे, इसलिये तीर्थ यात्राओं और मंदिरों को देख कर उन्हें एलर्जी होती थी। एलर्जी तो एलर्जी है, लेकिन किसी शासक को हो जाये तो वह और भी खतरनाक हो जाती है। अब यही विदेशी मुसलमान इस देश के शासक हो गये थे। उनकी यह एलर्जी हिन्दोस्तान को बहुत भारी पड़ी। तीर्थ यात्राओं पर जजिया टैक्स लगे और मंदिर तो तोड़ ही दिये गये। अयोध्या का राम मंदिर बाबर की उसी एलर्जी का शिकार हुआ था। लेकिन एलर्जी की यह बीमारी भारत में आ गये विदेशी मुसलमानों को थी, भारतीय मुसलमानों को नहीं। लेकिन बीमारी तो आखिरी बीमारी है। कुछ हिन्दोस्तानी मुसलमानों को भी लगी। जिन्ना इसके शिकार हो गये थे। उनकी बीमारी इतनी बढ़ी की उन्होंने चिल्लाना शुरु कर दिया कि यहां का मतान्तरित मुसलमान भी यहां के लोगों के साथ नहीं रह सकता। डाक्टर का काम अंग्रेज कर रहे थे। उन्होंने जिन्ना की एलर्जी का इलाज करने के बजाय उसे और बढ़ा दिया। नतीजा जो हो सकता था, वही हुआ। देश खंडित हो गया।

अब फिर आजम खानों ने कहना शुरु कर दिया है कि तीर्थ यात्रा से एलर्जी हो रही है और मुलायम सिंहों ने उसका इलाज भी अंग्रेज डाक्टर की तर्ज पर करना शुरु कर दिया है। ख़ुशी की बात इतनी है कि इन आजम खानों के साथ मुसलमान-ए-हिन्द नहीं हैं। ये उन का नाम लेकर अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं और उन्हीं की आड़ में शिकार मार रहे हैं। यदि मुलायम सिंह को मुसलमानों की वोटों की इतनी ही चिन्ता है तो उन्हें मुसलमानों से बिना दलालों की सहायता से सीधी बात करनी चाहिये। तब उनको पता चल जायेगा कि आम मुसलमान इस एलर्जी की बीमारी से ग्रस्त नहीं है और न ही अयोध्या की चौरासी कोसी यात्रा से उसकी भावनाएं आहत होतीं हैं। क्योंकि उन की भावनाएं भी वही हैं जो इस देश के तमाम अवाम की हैं। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच जो मुसलमानों की प्रतिनिधि तंजीम है, ने अयोध्या की चौरासी कोसी यात्रा का स्वागत किया है।

एलर्जी की बीमारी लगने से पहले अल्लामा इकबाल ने जो कहा था, उस पर भी नजर डाल ली जाये।

मशहूर जिनके दम से है दुनिया में नाम-ए-हिन्द है राम के वुजूद पे हिन्दोस्तां को नाज अहले नजर समझते हैं उसको इमाम-ए-हिन्द

इसलिये जरुरी है कि इस बीमारी का जल्द इलाज किया जाये, नहीं तो राजनीति के खाद पानी में फल-फूल कर यह अहल-ए-हिन्द के मुसलमानों को भी लग सकती है। ”राम के वुजूद पर हिन्दोस्तां को नाज’’ हो सकता है, लेकिन मुलायम सिंह को तो लगता है अभी भी अपने आजम खानों पर ही नाज है। यही कारण था कि 25 अगस्त को उत्तर प्रदेश पुलिस ने विश्व हिन्दू परिषद के अशोक सिंहल को तो लखनऊ हवाई अड्डा से बाहर ही नहीं निकलने दिया, वे अयोध्या जाने वाले थे। पुलिस को शक था कि ये लोग अयोध्या जाकर राम को नमन कर सकते हैं। साधु संतों की तो और भी बुरी गत बन रही थी।

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