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भाजपा यानि शिवराज चौहान

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जन आशीर्वाद यात्रा की जनसभा आदिवासी जिले झाबुआ में बस अड्डे के निकट चल रही है। समय की कमी के कारण मुख्यमंत्री ने मंच पर जाने के बजाय अपने रथ से ही भीड़ को संबोधित किया। भाषण समाप्ती पर उनसे मिलने वालों की भीड़ लग जाती है। चौहान ने स्पष्ट निर्देश दिए कि किसी भी वादी को अपनी अर्जी देने से रोका न जाए। और हर आवेदन तुरंत जिले के संबंधित विभाग को फौरन भेजा जाए। स्थानीय अधिकारियों को आदेश दिए गए कि किसी आवेदन को नजरअंदाज न किया जाए। आवेदनों से भरी बोरी को रथ में पर चढ़ाई जाती है। जैसे ही चौहान का रथ आगे बढ़ता है, अपने पिता के साथ आई एक तीन साल की बच्ची रोने लगती है। वह शिवराज मामा से मिलना चाहती थी। उसके चेहरे पर मुख्यमंत्री की नजर पड़ती है और वह अपना रथ पीछे लेते हैं। गोद में लेकर वह उसका माथा चूमते हैं। यह शिवराज की प्रदेश की बेटियों, महिलाओं से खुद को खास तौर पर जोडऩे की मुहिम का नतीजा है। कभी शिवराज मामा,
तो कभी भाई, तो कभी बेटा बनकर उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार का मतलब आज ‘शिवराज सिंह चौहान’ बना दिया है। चाहे समाज कल्याण की योजना का प्रचार हो या प्रदेश की बेहतर होती कृषि विकास का बखान, सब कुछ चौहान के व्यक्तित्व से जुड़ गया है। तभी तो इंदौर-भोपाल के आधुनिक हवाई अड्डों से लेकर ठेठ आदिवासी गांव तक, भाजपा के ही नहीं, विरोधी दल के सदस्य भी मानते हैं कि आज मध्य प्रदेश में भाजपा का अर्थ है शिवराज सिंह चौहान।
है कोई वसुंधरा का विकल्प ?
राजस्थान में वसुंधरा राजे के खिलाफ तमाम शिकायतों के बावजूद केंद्र और प्रदेश के, दोनों नेतृत्व को मानना पड़ा है कि अगर पार्टी जीतेगी तो केवल राजे के दम पर। हालांकि खुद को राजस्थान की अक्षुण्ण नेता स्थापित करने से पहले राजे को काफी उठा-पटक का सामना करना पड़ा है। उन्हें बार-बार विरोधी खेमे की चुनौती झेलनी पड़ी है, जिससे प्रदेश में गुटबाजी भी चरम पर रही। मगर अब उनके विरोधी खेमे के नेता भी बुझे मन से मानने लगे हैं कि शायद चुनाव जीतने हैं तो वसुंधरा राजे का कोई विकल्प नहीं है।
रमन को लाल सलाम
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को प्रदेश भर की यात्रा के दौरान नक्सली हिंसा से प्रभावित एक दूरदराज के क्षेत्र में कुछ गांववाले सड़क के किनारे खड़े दिखाई दिए। रमन सिंह का रथ करीब आने पर वह गांववालों को हाथ हिलाते हैं। फिर उनका उत्साह देख रूक जाते हैं और कुछ मिनट उनसे बातचीत करते हैं। बातचीत के दौरान सब सामान्य लगता है, लेकिन जैसे ही रथ आगे बढ़ता है, गांववासी नारा लगाते हैं- ‘रमन सिंह, लाल सलाम, लाल सलाम, लाल सलाम’। रथ में बैठे भाजपाइयों को अहसास होता है कि गांववासी वाम विचार वाले हैं, लेकिन रमन सिंह के कामकाज को देखकर मिलने चले आए। मिलकर वे अपने तरीके से समर्थन जता रहे हैं। बेशक दिल्ली व रायपुर में बैठे एकटिविस्ट कह रहे हों कि इसमें कुछ गड़बड़ होगी, मगर रमन सिंह को इससे खास फर्क नहीं पड़ता।

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