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कहां खो गई है विचारधारा….

भारतीय जनता पार्टी के भीष्म पितामह माने जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी से एक बार इंटरव्यू के दौरान जब पूछा गया कि यदि उन्हें अपना करिअर चुनने का एक बार फिर मौका मिले, तो उनका कर्मक्षेत्र क्या होगा, तो उनका सपाट सा जवाब था-”एक बार नहीं, बल्कि जब भी मुझे अपना कर्मक्षेत्र चुनने का मौका मिलेगा, मैं राजनीति को ही अपना कार्यक्षेत्र बनाऊंगा।’‘ यह पूछे जाने पर कि ऐसा करने का क्या कारण होगा, उन्होंने बगैर किसी उलझन के जवाब दिया- ”राजनीति ऐसा क्षेत्र है, जिसमें यदि राजनेता ‘चाहे तो’ वह जनता की असीमित सेवा कर सकता है। ऐसा मौका किसी अन्य कर्मक्षेत्र में नहीं है।’‘ सामान्य जन की सेवा के लिए आडवाणी का पूरा जोर ‘राजनेता के चाहने पर’ था। यानी राजनेता यदि जनसेवा करना चाहे तो वह बहुत कुछ कर सकता है। लेकिन उस जनसेवा के लिए तो उसे अपनी खुद की सेवा को तिलांजलि देना जरूरी होगा। यानी वह ऐसी विचारधारा से जुड़े जो जनसेवा का आधार बन सके। उसके लिए परिवारवाद को दूर से ही नमस्कार कर स्वार्थ से परे होना होगा। लेकिन आज की राजनीति में क्या ऐसा संभव है। एक भी पार्टी ऐसी दिखाई नहीं देती जिसका आधार ‘परिवारवाद’ से हटकर ‘विचारधारा’ हो। लगभग हर नेता या तो खुद को अथवा अपने परिवार को आगे बढ़ाने में लगा है। इसके लिए वह ‘व्यक्तिपूजा’ में जुटा है। नेता अपनी ही पार्टी को ‘विचारधारा’ के मार्ग से हटा कर येन, केन, प्रकारेण सत्ता पाने की होड़ में जुटे हैं।
‘आडवाणी का यह इंटरव्यू वाजपेयी सरकार के केन्द्र में सत्ता में आने से कुछ महीने पहले का ही है। असल में उस वक्त यह आभास होने लगा था कि इस बार देश की जनता अटल बिहारी वाजपेयी को ही सत्ता पर काबिज होने का मौका देना चाहती है। जनता में इस आभास का बीज बोने का श्रेय भी आडवाणी को ही दिया जाता है, जब उन्होंने मुम्बई में हुई पार्टी के महाधिवेशन में अचानक वाजपेयी का नाम पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर घोषित कर दिया था। पार्टी सत्ता में आई, लेकिन आई अपने सहयोगी दलों के साथ गठबंधन बनाकर। इस क्रम में पार्टी ने अपने मूल मुद्दे ठंडे बस्ते में डाल दिए और ‘शासन के लिए एक नया एजेंडा’ बना कर आगे कदम बढ़ाया। पार्टी के मूल मुद्दे उसकी विचारधारा पर आधारित थे। सत्ता के लिए विचारधारा को ठंडे बस्ते में डाले जाने वाले ये मूल मुद्दे वो थे,
जिनके आधार पर आडवाणी भाजपा को लोकसभा की दो सीटों से देश की दूसरे नंबर पर सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर खड़ा कर पाए थे। अनेक मुद्दों के साथ कष्मीर को विशेष दर्जा देने वाली ‘संविधान की धारा 370 को हटाने’ और ‘समान नागरिक संहिता लागू करने’ के साथ ही ‘राम मंन्दिर के निर्माण’ का मुद्दा शामिल था। असल में ‘राम मन्दिर निर्माण’ के मुद्दे को ही वह आधार माना जाता है, जिसके लिए देश की जनता ने भाजपा को इतनी ताकत दी कि उसका गठबंधन देश की सत्ता संभाल सके। भाजपा को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाने के लिए संघ परिवार और उसके सदस्यों ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। लेकिन भाजपा के लिए विचारधारा की बजाय सत्ता महत्वपूर्ण हो गई। भाजपा के इस रवैये से एक बड़ा नुकसान यह हुआ कि पार्टी की जड़ें खोखली हो गईं। पार्टी उन सहयोगी दलों के साथ सत्ता में पहुंची, जिनकी विचारधारा उससे मेल ही नहीं खाती थी। भाजपा उन पार्टियों के साथ बैठने लगी, जिन पर वह अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण का आरोप लगाया करती थी। जो साध्य था, वह लक्ष्य बन गया। सत्ता विचारधारा से बड़ी हो गई। ‘चाल, चरित्र और चेहरे’ को जनसेवा का आधार बनाकर ‘स्वराज’ को ‘सुराज’ में बदलने और देश को ‘भय, भूख, आतंक’ से मुक्त कराने का दावा करने वाली भाजपा का हाल जगजाहिर है। ‘विचारधारा’ को दरकिनार कर पार्टी के कर्णधारों ने जो भानमति का कुनबा जोड़ा था, वह 2004 में बिखर गया। अब 2013 में तो वह पूरी तरह से छिन्न-भिन्न हुआ लगता है। इस सबसे पार्टी में यह संदेश गया कि कार्यकर्ताओं को ‘विचारधारा’ केवल दिखावे की वस्तु लगने लगी। भाजपा के नाम पर आज केवल आडवाणी, मोदी, शिवराज सिंह चौहान, रमण सिंह के नाम ही सुनाई देते हैं। पूरी पार्टी ‘नमो…नमो’ का जाप कर रही है। पार्टी में कोई अब ‘राम मन्दिर निर्माण’ या ‘समान नागरिक संहिता’ लागू करने की मांग उठाता हुआ सुनाई नहीं देता। सब गुजरात मॉडल यानी नमो…नमो की बात करते हैं। पार्टी या पार्टी की विचारधारा कहीं दिखाई नहीं देती। विकास जरूरी है, लेकिन सैद्धान्तिक मूल्यों के बगैर विकास भी अपना अर्थ खो देता है।
कांग्रेस के साथ भाजपा की तुलना करने पर एक ही सिक्के के दो पहलू दिखने लगते हैं। राजनीतिक दलों की भीड़ में अलग से दिखने का दावा करने वाली भाजपा भी ‘परिवारवाद और व्यक्तिनिष्ठा’ के रास्ते पर ही चलने लगी है। बड़े नेता खुद को आगे बढ़ाने और अपने बेटों को राजनीति में फिट करने में लगे हैं। इस रास्ते पर चलकर भाजपा अन्य दलों पर उंगली उठाने का अधिकार खोने लगी है। कांग्रेस तो दशकों से इसी राह पर चल रही थी। कांग्रेस तो लगभग नेहरू-गांधी परिवार की चेरी बन चुकी है। कांग्रेस को अपना उद्धार नेहरू-गांधी परिवार की छत्रछाया में ही नजर आता है। ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’ का नारा लगाने वाले कांग्रेसियों के लिए अब ‘सोनिया और राहुल गांधी’ मसीहा हैं। यहां तक कि नेहरू-गांधी परिवार का विरोध कर कांग्रेस छोडऩे वाले शरद पवार भी नया दल-राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (राकांपा) बनाकर कांग्रेस के साथ सत्ता की बैंचों पर बैठे हैं। मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा), मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी (सपा), रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा), चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलोद), फारुख अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस (एनसी) की तो बात करना बेकार है। इन पार्टियों का जन्म तो ‘परिवारवाद’ के बीज से ही हुआ है। जनता दल (युनाइटेड) की सरकार हालांकि बिहार में चल रही है, लेकिन नेतृत्व के नाम पर केवल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और अध्यक्ष शरद यादव के नाम सुनाई देते हैं। कभी-कभी महासचिव के.सी. त्यागी सुनाई दे जाते हैं।

‘विचारधारा’ को तिलांजलि देने वाले भी इस बात को स्वीकार करने से नहीं हिचकिचाएंगे कि ‘विचारधारा’ के अभाव में कोई भी संगठन देशहित में काम नहीं कर सकता। पार्टी और पार्टी की ‘विचारधारा’ को खुद से

आगे रखने का सिद्धान्त बनाने वाली भाजपा लोकतान्त्रिक रास्तों पर चलने का दावा करती थी। लेकिन वह भी भीतरखाने इन्हीं पार्टियों की भीड़ में खो चली है। ‘विकास’ के नाम पर ‘विचारधारा’ की ही ऐसे बलि चढ़ा दी गई है, जैसे ‘विचारधारा’ देश के ‘विकास’ की दुष्मन हो और केवल ‘परिवारवाद’ ही देश का ‘विकास’ कर सकता हो। महात्मा गांधी ने कहा था-‘लक्ष्य ही नहीं, बल्कि लक्ष्य को प्राप्त करने का रास्ता भी पवित्र होना चाहिए।’ यदि रास्ता पवित्र नहीं, तो लक्ष्य पवित्र कैसे हो सकता है। देश के दरिद्रनारायण की सेवा केवल सिद्धान्तों से पवित्र किए गए रास्तों पर चलकर ही हो सकती है। नहीं तो, बाकी सब ढोंग है। राजनीतिक दलों की वही विचारधारा देश और जनता का हित कर सकती है जो राष्ट्रहित से प्रेरित हो। जो किसी धर्म, पंथ, वर्ग के हितों से जुड़कर संकुचित न हो गई हो। जिसका लक्ष्य देश और देश की जनता के सर्वांगीण विकास का आधार हो। किसी धर्म या वर्ग विशेष के हितों से प्रेरित विचारधारा देश और इसकी जनता के सर्वांगीण विकास का न तो आधार बन सकती है और न ही देश को मजबूत बना सकती है। ‘वोट बैंक’ से गति पाने वाली ‘विचारधारा’ केवल वर्ग विशेष के लिए तुष्टिकरण की नीतियां ही बना सकती है, जो न देश के हित में है, और न ही वर्ग विशेष के हित में।

 

श्रीकान्त शर्मा

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