ब्रेकिंग न्यूज़ 

मानसिक यज्ञ

त्याग करने वाले भक्त प्रतिदिन अग्नि जलाकर, इस उम्मीद में अग्नि अनुष्ठान का आनंद उठाते हैं कि यज्ञ वेदी की अग्नि, एक दिन उनकी आत्मा को प्रज्वलित करेगी। उनका यह आत्म समर्पण, एक दिन उनके विचारों को जरुर आह्लादित करेगी।
”अग्निमिन्धानो मनसा धियं सचेत मत्र्य:।
अग्निमिन्धे विवस्वभि:।। ‘‘

अग्नि अनुष्ठान जीवन को प्रेरित करता है और आत्म-ज्ञान की प्राप्ति में मदद करता है। यह आराधक के मन में मांगलिक और दिव्य अनुभूति को जगाता है। ऋचा कहती हैं – ”हे परमपिता… मैं स्वयं में दिव्य विचारों को संचित करने के लिए अग्नि को प्रज्वलित कर रहा हूं। आध्यात्मिकता की प्रदीप्त किरण मेरे हृदय में प्रवेश कर रही हैं। इसकी चमक मेरे कुविचारों का अंत कर रही है। मैं आपकी इस दिव्य संरचना का अंश बनूं। मैं स्वयं में बदलाव कर अग्नि की पवित्र बेदी की तरह बन जाऊं। मुझ में दिव्यता का सरस प्रवाह हो, ताकि मेरा शरीर और मेरा मन निर्मल हो सके। जैसे अग्नि अनुष्ठान सभी कोणों को पवित्र और शुद्ध करता है, उसी समर्पण की किरणें मेरे शरीर के हर अंग से गुजर कर पापमुक्त करे। मेरा शरीर अग्नि अनुष्ठान के पवित्र लकड़ी की तरह परिवर्तित हो जाए, जो राख के मानिंद सिमटकर सभी दिशाओं में सुगंध बिखेर दे। मेरे हर कार्य में समर्पण की भावना की गूंज हो – स्वाहा … मैं खुद को समर्पित करता हूं।

пескоструйный аппарат купитьортопедия в германии

Leave a Reply

Your email address will not be published.