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अति आत्मविश्वास में फिर से भाजपा

लोकसभा चुनावों की तैयारियों के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कमर कस ली है। चुनाव 2014 में होने हैं, लेकिन उसे लगता है कि चुनाव समय से पहले हो सकते हैं। प्रचार के लिहाज से भाजपा सदैव आगे रहने की कोशिश करती है। उसे लगता है कि ऐसा करके वह अपने प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ देगी। विधानसभा चुनावों में उसकी रणनीति काफी हद तक कामयाब रही है, लेकिन लोकसभा चुनावों में उसे हर बार मुंह की खानी पड़ी है। वर्ष 2004 में भाजपा की अगुआई में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार थी। वह अच्छा खासा छह महीने और राज कर सकती थी लेकिन उसने पहले चुनाव कराने का निर्णय ले लिया। चुनाव में जाने का निर्णय लेने से काफी पहले भाजपा ने खुद अपनी सरकार की तारीफों के पुल बांधने शुरू कर दिए। उसे लगा कि अभी हवा सरकार के पक्ष में है, आगे चलकर कहीं कुछ गड़बड़ हो गई, तो लेने के देने पड़ जाएंंगे। दरअसल दोबारा सत्ता में आने को लेकर तब भी भाजपा संशय की स्थिति में थी। जब जनादेश पूरे पांच साल का था तो उसका पालन होना चाहिए था। हां, गठबंधन की राजनीति के इस युग में अगर किसी कारण से सरकार अल्पमत में भी आ जाती, तो भी भाजपा को अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल की स्वाभाविक समीक्षा की जिम्मेदारी जनता पर छोड़ देनी चाहिए थी। आगे नतीजा जो भी रहता वह स्वाभाविक मान लिया जाता। लेकिन अपने मुंह मियां मिटठू बनने यानि फील गुड के एहसास ने विरोधियों को उसके अति आत्मविश्वास की हवा निकालने का मौका दे दिया।

एक बार फिर भाजपा अति आत्मविश्वास के साथ आगे बढऩे की कोशिश कर रही है। अगला लोकसभा चुनाव वह कैसे लड़ेगी, इसके लिए उसने अपने सारे पत्ते अभी से खोल दिए हैं। सच तो यह है कि उसकी तरकश में अब बस एक तीर बचा है कि प्रधानमंत्री पद के लिए उसका औपचारिक उम्मीदवार कौन होगा। वैसे ले देकर इस मुद्दे पर ज्यादा भ्रम की स्थिति नहीं है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में जिस तरह से प्रदेश इकाईयों ने अभी से प्रस्ताव पारित करने शुरू कर दिए हैं, उससे साफ है कि भाजपा भले ही चुनाव से पहले उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करे, लेकिन पोस्टर ब्वॉय वहीं रहेंगे। भाजपा ने नफे-नुकसान का आकलन करने के लिए प्रतिद्वंद्वियों को पर्याप्त समय दे दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने साफ कर दिया है कि चुनाव निर्धारित समय पर ही होंगे। अब इस घोषणा के बाद साफ है कि कांग्रेस को पार्टी के स्तर पर खुद को अभी से लोकसभा के लिये झोंकने की जरूरत नही है। मसलन चुनाव अप्रैल-मई में निर्धारित समय पर होंगे तो अभी उसके होने में 7-8 महीने का वक्त है। राजनीति में पासा पलटने के लिए इतना वक्त काफी होता है इसलिए अभी से शतरंज की बिसात बिछाने की क्या जरूरत है।

लोकसभा चुनाव से पहले पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। ये चुनाव सेमीफाइनल के तौर पर लिए जाएंंगे। कांग्रेस राज्यों के विधानसभा चुनावों को स्थानीय चुनावों तक सीमित करके आगे बढ़ रही है। कभी भी उसकी रणनीति हाईप्रोफाइल प्रचार की नहीं रही है। शहरों और सरकारी बसों पर पोस्टर टांगने से ज्यादा कुछ करने में उसका विश्वास नहीं रहा है। हां, मीडिया को उलझाए रखने में कांग्रेस का कोई सानी नहीं हैं। न ज्यादा गरम न ज्यादा नरम की रणनीति पर चलते हुए कांग्रेस कभी भी अति आत्मविश्वास की राजनीति का शिकार नहीं हुई है। उसकी राजनीति चुनाव से ठीक पहले मतदाताओं में आत्मविश्वास पैदा करने की रही है। वह ज्यादा बड़े दावे नहीं करती। कभी गरीबी हटाओ का नारा दे दिया, तो कभी सांप्रदायिकता का भय पैदा करके अपनी चिरप्रतिद्वंद्वी भाजपा के खिलाफ बाकी सभी क्षेत्रीय दलों को अलग-थलग कर दिया। कमोवेश कांग्रेस की रणनीति गांव पर केन्द्रित रही है। आखिरी वक्त में कुछ ऐसा कर दो या कह दो जिससे जनता को फिर आस बंध जाए, कांग्रेस के रणनीतिकार अपना सारा दिमाग इन्ही बातों पर लगाते रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव से पहले उसने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को देश भर में लागू करके फिर सत्ता हासिल कर ली। इस बार भी उसका तुरूप का पत्ता साफ है। उसने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून बनाने का ऐलान करके कम से कम गांव की जनता के बीच अपनी इतनी साख तो बना ली है कि वह उनके बारे में सबसे ज्यादा सोचती है। कांग्रेस के रणनीतिकारों को पूरा भरोसा है कि सत्ता में बने रहने के लिए यह कानून संजीवनी का काम कर करेगा।

यह सही है कि मनमोहन सिंह के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की दूसरी पारी भ्रष्टाचार, घोटालों और महंगाई के दलदल में फंस गई हैं। कांग्रेस को भी इस बात का पूरा एहसास है लेकिन दलदल में फंसने के बाद ज्यादा छटपटाने से डूबने का खतरा बढ़ जाता है। कांग्रेस ने भी इसी में अपनी बेहतरी समझी और वह इन मुद्दों को लेकर वाद-विवाद में नहीं पडऩे की रणनीति अख्तियार कर रही है। दरअसल भ्रष्टाचार और घोटाले बहुत गंभीर मुद्दे हैं और उनके कारण सत्ताधारी दल को नुकसान भी होता है। लेकिन राजनीति के तराजू पर भारी पडऩे के लिए यह काफी नहीं है। भारतीय राजनीति में शायद ही कोई ऐसा दल हो जो इनसे अनछुआ हो। यही कारण है कि जब भी कोई इन मुद्दों पर मतदाता का दिमाग बदलने की कोशिश करता है, तो वह चुपचाप हामी नहीं भरता। उसकी यही उम्मीद होती है कि किस दल के पास उसे सीधे देने के लिए क्या है। आरोप-प्रत्यारोप की फेहरिस्त लंबी हो गई। उसे याद कर पाना आसान नहीं है। अब तो चुनाव के वक्त खरी-खरी बातें ज्यादा होने लगी हैं। सिद्धांत की बातें बेइमानी लगने लगी हैं, जो एक लोकतंत्र के लिए सही नहीं है।

भाजपा ने कांग्रेस मुक्त भारत और मिशन 272 का नारा दे दिया है। उसके नेताओं को चुनावी संग्राम के लिये कूच करने का फरमान जारी हो चुका है। कार्यकर्ता इतने से संतुष्ट नहीं हैं, वह मांग कर रहे हैं कि सेनापति का नाम बताओ। प्रतिद्वंद्वी भी उसे इसी मुद्दे पर घेर रहे हैं। दरअसल में भाजपा के अति आत्मविश्वास ने उसके लिए बेवजह असंतोष की बेल लगा दी है, जो तेजी से बढऩे लगी है। कार्यकर्ता खुलेआम मांग करने लगे हैं कि नरेंद्र मोदी को अभी से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया जाए और वह चुनावी यज्ञ में आहुति देने के लिए अभी से श्री मोदी के रथ के साथ निकल पड़े हैं। भाजपा के पुराने दिग्गज नेता खासतौर से उसके महारथी, इस रथ को रवाना करने के लिये तैयार नहीं हैं। भाजपा में रथ की कमान सौंपने को लेकर रस्साकसी जारी है। कुछ को लगता है कि सरकार बनाने के लिए आवश्यक 272 सीटों का आंकड़ा अपने बूते हासिल नहीं किया जा सकता, तो बाकी यह मान रहे हैं, जो भी हो देखा जायेगा। भाजपा एक बार फिर लोकसभा चुनाव को लेकर हड़बड़ी में दिख रही है। अभी इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। यानि सेमीफाइनल होना है, लेकिन भाजपा फाइनल खेलने के लिए अभी से तैयार हो गई है। मोदी को लेकर फील गुड महसूस कर रही है। कहीं यह 2004 जैसा फील गुड न हो जाए।

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