ब्रेकिंग न्यूज़ 

विचारों से व्यक्ति की ओर बढ़ती राजनीति

हाल ही में खाद्यान्न सुरक्षा विधेयक पर संसद में बहस चल रही थी। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस विधेयक का पुरजोर समर्थन करते हुए पूरी ताकत से अपनी बात रखी और इसके चंद घंटों बाद एकाएक रात सवा आठ बजे उनका स्वास्थ्य गड़बड़ा गया। वह सदन से उठकर बाहर चली आईं और तुरंत उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया। मीडिया में उनके स्वास्थ्य को लेकर अटकलें लगने लगीं। अस्पताल में उन्हें देखने वालों का तांता लग गया। हर कांग्रेसी के माथे के पर चिंता की लकीरें उठने लगीं, क्योंकि सभी जानते हैं कि आज पार्टी का वजूद सोनिया गांधी के चलते है। यह सोनिया गांधी ही हैं, जिनके नाम पर कांग्रेस चल रही है और तमाम आपसी विरोधों के बावजूद एक साथ खड़ी है।
जिसका नेतृत्व हो उसका नाम होना स्वाभाविक है : शिवराज सिंह चौहान
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वीकार करते हैं कि जब कोई अच्छा काम होता है तो जिसका नेतृत्व हो उसे इसका श्रेय मिलता ही है। लेकिन साथ ही वह जोड़ देते हैं कि ‘इसमें उपलब्धि सभी की है।’ अपनी पीठ थपथपाते वह यह भी दोहराना नहीं भूलते कि ‘सामाजिक क्षेत्र में उनकी सरकार ने जो कुछ भी किया है, उसके अलावा कृषि विकास दर को 16 फीसदी तक पहुंचाने से उनकी सरकार की खास पहचान बन गई है।’

नौकरशाही के रवैये और राजनीतिक मुश्किलों के बारे में पूछे जाने पर वह कहते हैं कि’अफसरों का रवैया बहुत हद तक राजनीतिक नेतृत्व पर निर्भर करता है। जो सी.एम. खुद दफ्तर में बैठकर अफसरों से काम करवाना चाहे वह कामयाब नहीं हो सकता। खुद के रवैये के बारे में उन्होंने दावा किया – ‘मैं खुद जनता के बीच जाता हूं और जनता की तकलीफों को सुनता हूं। मुझे देखकर नौकरशाही भी जनता के हित में काम करने को बाध्य हो जाती है।’

अपनी तीसरी जीत केबारे में उनका कहना था कि उनका पहला कार्यकाल मात्र तीन साल का था। इस दौरान ज्यादातर समय यह अटकलें लगती रहीं कि पता नहीं पार्टी उन्हें पूरा कार्यकाल देगी या नहीं। मगर 2008 से दूसरे कार्यकाल में उन्हें अपने कामकाज व जन-कल्याण के एजेंडे को लागू करने का मौका मिला है। उन्हें लगता है कि विकास कार्य हर गांव और व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए जनता, भाजपा की सरकार तीसरी बार भी लाना चाहती है।

आजादी के 63 सालों बाद यह इस देश का यह राजनीतिक दुर्भाग्य है कि यहां की सभी राजनीतिक पार्टियां भले ही अपने जन्म के समय किसी एक विशेष विचारधारा की उपज थीं, लेकिन आज वह व्यक्तिनिष्ठ व्यवस्था की भेंट चढ़ चुकी हैं। कांग्रेस, भाजपा, समाजवादी पार्टी, वामपंथी दल या विभिन्न क्षेत्रीय राजनीतिक दल-सभी पार्टियां व्यक्तिनिष्ठा की बेडिय़ों में जकड़ चुकी हैं। परिवारवाद के दलदल में फंस चुकी हैं।

कांग्रेस देश के सबसे बड़े राजनीतिक दल कांग्रेस की बात करें तो मार्च सन 1885 में थिओसोफिकल सोसाइटी के ए.ओ. ह्यूम, विलियम वेडबर्न, दादाभाई नौरोजी, व्योमेश चंद्र बनर्जी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, मनमोहन घोष और माधव रानाडे ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की थी। उस समय उनका मकसद था, शिक्षित भारतीयों के लिए सरकार में भागीदारी को बढ़ावा दिलवाना। समय के साथ कांग्रेस पूरे भारतीयों के जनमानस पर छा गई और आजादी की लड़ाई का शक्तिशाली मंच बनी। इस पार्टी का इतिहास देखे तो बाल गंगाधर तिलक, बिपिनचंद्र पाल, लाला लाजपत राय, मोतीलाल नेहरू, महात्मा गांधी, जवाहल लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस, राजगोपालाचारी, आचार्य कृपलानी, राजेंद्र प्रसाद, खान अब्दुल गफ्फार खां, मोहमद अली जिन्ना जैसे कई नेता हुए, जिन्होंने कांग्रेस के इस मंच से अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ी। देश के आजाद होने के बाद जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने। उनके बाद लाल बहादुर शास्त्री ने देश की कमान संभाली। शास्त्री की असामयिक निधन के बाद 1966 में इंदिरा गांधी का उदय हुआ। विश्लेषक जिन्हे गूंगी गुडिय़ा कहते थे, उसी इंदिरा गांधी के उदय के साथ ही कांग्रेस में विचारधारा के अंत की शुरुआत हुई। देश में दो सत्ता केंद्र बने, कांग्रेस पार्टी और प्रधानमंत्री। वैसे देखा जाए तो पार्टी सर्वोच्च स्थान पर होती है, क्योंकि उसी के नेता के चलते प्रधानमंत्री सत्ता मंव होता है। लेकिन इस पारंपरिक सोच को दरकिनार करते हुए साल 1969 में राष्ट्रपति चुनाव में जब इंदिरा गांधी ने अपनी ही पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी के खिलाफ अपनी ओर से वराहगिरि वेंकट गिरि को न सिर्फ मैदान में उतारा, बल्कि जीतवाकर भी लाईं, उसी दिन से कांग्रेस का अपना स्वतंत्र अस्तित्व खत्म हो गया और वह अब नेहरू गांधी परिवार की संपत्ति बनकर रह गई। लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा चलाए जा रहे सरकार विरुद्ध आंदोलन को इंदिरा गांधी ने 26 जून 1975 को आपातकाल लागू कर रौंदने का प्रयास किया। यह बात और थी कि 1977 के आम चुनाव में उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा। यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि ‘इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इन इंडिया’ का नारा लगाने वाले कांग्रेसी चाटुकारों ने विचारधारा की बजाय व्यक्तिवाद को हवा देने का काम किया।

चेहरा विचारधारा का साधन ही बना रहे तो ठीक : संघ
संघ के प्रचार विभाग के प्रमुख मनमोहन वैद्य के मुताबिक संघ के कामकाज की दृष्टि से राजनीति के इस ट्रेंड से कोई दिक्कत नहीं है। राजनीति में आईकॉन्स के पीछे चलने की परंपरा रही है। उनका कहना है कि आज के जमाने में मीडिया भी ऐसे आईकॉन्स निर्मित कर देता है। वैद्य का साफ मानना है कि इसमें न तो कुछ गलत है और न ही कोई विरोधाभास। साथ ही वह आगाह करते हैं कि व्यक्ति पर यह निर्भरता उसी हद तक ठीक है जब तक वह लक्ष्य-प्राप्ति का साधन बनकर रहे। अगर व्यक्ति ही साध्य बन जाए तो समाज में गड़बड़ हो जाएगी। वैद्य के मुताबिक व्यक्ति-पूजा या हीरो-वर्शिप साध्य ही रहने चाहिए, इस मर्यादा को याद रखना अनिवार्य है।
कभी व्यक्तिवाद के विरुद्ध विचारधारा की लड़ाई लडऩे वाले व इंदिरा गांधी का विरोध करने वाले मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, जार्ज फर्नांडिस, यशवंतराव चव्हाण, जगजीवन राम जैसे नेता इंदिरा गांधी को सत्ता से हटाने में कामयाब तो हो गए, लेकिन वक्त के साथ ये तमाम नेता खुद निजी स्वार्थों और व्यक्तिवाद की चौखट में फंस गए। केंद्र की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार महज दो सालों में ताश के पत्तों के महल की तरह ढ़ह गई। 1980 में इंदिरा गांधी के नाम पर चुनाव हुए और वह वापस सत्ता र्में आई। उनकी मृत्यु तक कांग्रेस इंदिरा गांधी के नाम से ही जानी जाती थी। 31 अक्टूबर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस में भले ही वरिष्ठ नेताओं की फौज थी, लेकिन पार्टी का अस्तित्व ही गांधी, नेहरू परिवार हो गया था। इसी के चलते इंदिरा गांधी के युवा बेटे राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाया गया। साल 1988 में रक्षा मंत्रालय में बोफोर्स तोप-खरीद घोटाले को लेकर कांग्रेसी नेता वी. पी. सिंह ने विद्रोह किया। गांधी नेहरू परिवार की गुलामगिरी से मुक्ति चाहने वालों ने विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में अक्टूबर 1988 में कहीं का ईंट, कहीं का रोड़ा जोड़ जनता दल की स्थापना की और 1989 के आम चुनाव में राजीव गांधी को पराजय का मुंह देखना पड़ा। कांग्रेस की पराजय जरूर हुई, लेकिन जनता ने किसी एक दल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया। ऐसे समय में फिर एकबार विचारधारा की हत्या हुई। मात्र सरकार बनाने के लिए विपरीत विचारधारा के दलों के सहयोग से वी.पी. सिंह प्रधानमंत्री बने, लेकिन निजी महत्वाकांक्षाओं के चलते यह सरकार भी महज कुछ महीनों में ही ढ़ह गई। कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने, वह भी कुछ महीने ही सत्ता सुख ले पाए। 1991 के आम चुनावों के प्रचार के दौरान ही राजीव गांधी की हत्या हुई। इस चुनाव में कांग्रेस की भले ही सत्ता वापसी हुई, लेकिन अपनी सास इंदिरा गांधी और पति राजीव गांधी हत्या से सहमीं सोनिया गांधी ने अपने दो बच्चों प्रियंका और राहुल को लेकर सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए रखी। तब वरिष्ठ कांग्रेसी नरसिंहा राव प्रधानमंत्री बने और कांग्रेस गांधी नेहरू परिवार से मुक्त हुई। राव ने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। देश ने नए आर्थिक युग में प्रवेश किया, परंतु कांग्रेस के अंातरिक सत्ता संघर्ष के चलते पार्टी को 1996 के आम चुनावों में एक बार फिर पराजय का मुंह देखना पड़ा। केंद्र मे कांग्रेस समर्थित तीसरे मोर्चे की सरकार बनी। आपसी संघर्ष और निजी स्वर्थों के चलते यह सरकार भी अल्पजीवी साबित हुई। इसके बाद भाजपा के नेतृत्व में सरकारें बनीं और जन समर्थन के गिरते ग्राफ ने कांग्रेसियों को मजबूर किया कि वह फिर एक बार गांधी-नेहरू परिवार की शरण में जाए। सोनिया गांधी ने पार्टी का नेतृत्व संभाला और पिछले 10 सालों से कांग्रेस देश की सत्ता पर काबिज है। आज हालत यह है कि काबिलियत नहीं, परिवार का होना ही पार्टी के नेतृत्व को संभालने की कसौटी बन चुका है। इसी के चलते आज पूरी पार्टी राहुल गांधी के नाम का जाप कर रही है। राहुल गांधी खुद यह कहते नहीं थकते कि वह पार्टी को परिवाद से मुक्ति दिलाना चाहते हैं, लेकिन कहने और करने में काफी अंतर है। जो वह कहते आ रहे हैं, उसे या तो वह करना नहीं चाहते या चाटुकारों की सत्ता सुख भोगने वाली एक बड़ी जमात उन्हें ऐसा करने नहीं दे रही। वह संगठन को मजबूत बनाने की बात करते हैं, लेकिन कर नही पा रहे हैं। वह आपसी मतभेदों को भुलाकर पार्टी को मजबूत बनाने की बात करते हैं, लेकिन उनकी यह सारी कवायद फूटे हुए मटके में पानी भरने का प्रयास साबित हो रहा है। देश में एक राज्य नहीं, जहां पार्टी में गुटबाजी न हो और इसकी सबसे बड़ी वजह है कि सवा सौ से ज्यादा पुरानी इस पार्टी के ज्यादातर नेता मूल विचारधारा को जानते तक नहीं, उन्हें तो बस व्यक्ति पूजा ही आती है।

बीजेपी
देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता दल भले ही परिवारवाद के दलदल से मुक्त है, लेकिन वहां भी विचारधारा को दरकिनार किया जा रहा है और व्यक्तिवाद हावी हो रहा है। इस बात का जिक्र कुछ वक्त पहले पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी खुद अपनेे उस पत्र में किया था, जिसमें उन्होंने पार्टी के तमाम फोरम से अपने इस्तीफे की पेशकश की थी। लेकिन बिडंबना यह है कि उनका यह पत्र भी पार्टी की विचारधारा बचाने के लिए न हो कर, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की उपजी कवायद भर था। शायद यही वजह रही कि महज चार दिनों के भीतर ही उन्होंने अपना इस्तीफा वापस लेकर पार्टी को ठीक होने का प्रमाण पत्र भी दे दिया।

संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सन् 1951 में संघ से अलग हटकर संघ की ही विचारधारा पर आधारित ंएक नए राजनीतिक दल जनसंघ का गठन किया। संघ ने इसे अपने जुुझारू प्रचारकों की फौज मुहैय्या कर कांग्रेस के विरुद्ध खड़ा किया। अपातकाल के बाद जयप्रकाश नारायण के आवाहन पर जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हुआ। लेकिन जिस तरह से सरकार का पतन हुआ, उससे आहत हो पूर्व जनसंघियों ने कुछ नए मित्रों को जोड़ कर दिसंबर 1980 में भारतीय जनता पार्टी के नाम से नए राजनीतिक दल का गठन किया। यह पार्टी ‘विद द डिफरेंस’ कही गई। यानी एक अलग हट कर बना नया दल। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण अडवाणी के नेतृत्व में पार्टी ने लोकसभा में शून्य से लेकर 182 सीटों तक का फासला तय किया। वैसे देखा जाए तो जनसंघ के दौरान ही पार्टी में सत्ता संघर्ष के बीज रोपित हो चुके थे। 1966 में जनसंघ के अध्यक्ष रहे बलराज मधोक को जिस तरह से अटल बिहारी वाजपेयी ने जनसंघ से निकलवाया था, उसी समय से निजी स्वार्थ, विचारों की मौलिकता पर हावी होने शुरू हो गए थे। जनसंघ के कद्दावर नेता नानाजी देशमुख, जिन्होंने आपातकाल में पूरे विपक्ष को एक करने में बड़ा काम किया था, उनका एकाएक राजनीति से संन्यास लेकर समाजसेवा में अपने आप को झोंक देना भी उसी सत्ता संघर्ष का नतीजा था।

भाजपा साल 1998 में अपने सहयोगी दलों के साथ एनडीए का गठन कर सत्ता में आई। लेकिन एक ही साल में एआइएडीएमके के समर्थन वापसी के कारण सरकार को 1999 में फिर से आम चुनाव कराने पड़े और फिर देश की जनता ने एनडीए गठबंधन को सत्ता सौंपी। पांच साल सत्ता में रहने के लिए अपने सहयोगियों के चलते भाजपा को अपनी विचारधारा को कई बार दरकिनार करना पड़ा। यह मजबूरी कब पार्टी की आदत बन गई, यह पता ही नहीं चला। यहां तक कि अटल बिहारी जैसे संवेदनशील नेता को मात्र गुजरात में सत्ता खोने के डर से गोधरा में हुए नरसंहार को नजरअंदाज करना पड़ा, जिसकी पीड़ा वह समय-समय पर जगजाहिर करते रहे। अच्छी सरकार और जनहितों के कार्यक्रम चलाने के बावजूद गुजरात की एक भूल एनडीए को भारी पड़ी और उन्हें सत्ता से बाहर जाना पड़ा। एनडीए बिखर गया। अटल बिहारी खराब सेहत के चलते घर बैठ गए। भाजपा विचारों की बजाय आडवाणी के अनुसार चलने लगी। बिना जनाधार वाले नेता पार्टी पर होते चले गए और जनाधार वाले दरकिनार। पार्टी में आडवाणी पूजक शक्तिशााली बनते गए, जबकि दूसरी ओर विचारधारा में यकीं रखने वाले विचार करने लगे कि उनसे गलती कहां हुई। नागपुर में संघ चिंतित था। संघ को सत्ता की बजाए अपनी विचारधारा की चिंता थी। संघ का नेतृत्व डॉ. मोहन भागवत ने संभाला और भाजपा से आडवाणी युग के अंत की शुरुआत हुई। आडवाणी को लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष से इस्तीफा देना पड़ा। पार्टी के अध्यक्ष पद पर संघ ने नितीन गडकरी को भेजा। नितिन पार्टी पर संघ की विचारधारा को लेकर अपनी पकड़ मजबूत कर ही रहे थे कि दिल्ली की चेंबर पॉलिटिक्स के माहिर खिलाडिय़ों ने नितिन को ऐसा घेरा कि उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। आडवाणी संघ पर भारी पड़े। इसी बीच दूसरी ओर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने कद बढ़ाना शुरू कर दिया। उनकी महत्वकांक्षा को जान कर अडवाणी को शह देने के लिए संघ ने मोदी कार्ड खेला। दुर्भाग्य से इस राजनीति के खेल में संघ भी विचारधारा को दरकिनार कर मोदी की लोकप्रियता को भुनाने में लगा हुआ है। कभी अपने विचारों के लिए जानी जाने वाली भाजपा आज पूरी तरह से एक व्यक्ति यानी मोदी के नाम का जाप कर रही है। मोदी जो कहें, वह पार्टी के विचार और मोदी जो करें, वह पार्टी का आचरण बन चुका है। मोदी विरोधी देशद्रोही करार दिए जाते हैं। भाजपा अब दो खेमों में बंट चुकी है। मोदी समर्थक और मोदी विरोधी। भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी दो गुटों में बंट चुके हैं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह और गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पारिकर मोदी के साथ हैं तो मध्य प्रदेश के शिवराज सिंह, मोदी के विरुद्ध। मोदी के चलते भाजपा के कई सहयोगी उससे दूरी बनाए हुए हैं। यह तो 2014 के चुनाव नतीजे ही बताएंगे कि संघ का यह प्रयोग सफल होता है या नहीं। अगर यह प्रयोग सफल हुआ तो विचारधारा की कल्पना करना भी मुश्किल होगा और नहीं होता तो भाजपा को फिर से अपने विचारों की ओर बढऩा होगा।

समाजवादी विचारधारा

भाजंपा के बाद समाजवादी विचारधाराओं वाली पार्टियंा देश की राजनीति में अहम रोल अदा करती हैं। कांग्रेस में रहते हुए कुछ समाजवादी विचारधाराओं वाले नेताओं ने जैसे कि सुरेंद्रनाथ बनर्जी, एस.एम. जोशी, जयप्रकाश नारायण ने 1938 में कांग्रेस सोशिलिस्ट पार्टी का गठन किया। 1948 में वह कांग्रेस से अलग हो गए। बाद में यह पार्टी टूट कर सोशिलिस्ट और प्रजा सोशिलिस्ट पार्टी बनी, फिर दोनों पार्टियां एक हो कर संयुक्त सोशिलिस्ट पार्टी बनी। फिर इस पार्टी का विलय जनता पार्टी में हुआ। जनता पार्टी टूटने के बाद मुलायम सिंह ने उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का गठन किया। बिहार में लालू ने राष्ट्रीय जनता दल बनाया। उसी से अलग हो कर नीतिश कुमार और शरद यादव ने जनता दल यूनाइटेड बनाया, ओडिशा में बीजू पटनायक ने बीजू जनता दल बनाया, कनार्टक में देवगौड़ा ने जनता दल सेक्युलर बनाया, उत्तर प्रदेश में चरण सिंह के परिवार ने राष्ट्रीय लोकदल बनाया और हरियाणा में चौटाला परिवार ने इंडियन नैशनल लोकदल बनाया। समाजवादी विचारधारा के सबसे प्रखर नेता राम मनोहर लोहिया का नाम 24 घंटे जपने वाले इन तमाम समाजवादियों पर नजर डाली जाए तो इन दलों द्वारा राम मनोहर लोहिया के विचारों की हत्या किए सालों गुजर गए। उत्तर प्रदेश की दोनों पार्टियां मुलायम की सपा और अजित सिंह की लोकदल पारिवारिक दुकानें बन कर रह गई हैं। सपा में मुलायम ने जमकर यादव और मुसलमानों लुभाकर सत्ता सुख भोगा और अपनेे ही परिवार के तमाम भाई भतीजो के नेतृत्व को प्रदेश की जनता पर लादा। यही हालात अजीत सिंह के हैं। उनकी पार्टी उन्हीं के परिवार से शुरू होती है और उन्हीं के परिवार में समाप्त। दोनों की कोई राजनीतिक विचारधार नहीं है। सत्ता और लाभ के लिए यह दोनों पार्टियां कांग्रेस और भाजपा के बीच पेंडुलम की तरह झूलती रहती हैं। बिहार में नीतिश ने भी सत्ता में बने रहने के लिए भाजपा से हाथ मिला लिया, फिर मोदी के डर से छोड़ दिया। पार्टी पूरी तरह से एक व्यक्ति नीतिश के बलबूते पर चल रही है। लोहिया के अनुयायी लालू ने तो बिहार में समाजवादी विचारधारा को सिर्फ दरकिनार ही नहीं किया, बल्कि सत्ता के मद में उन्होंने उसे पैरों तले रौंदा भी है। पूरे समय वह अपने, अपने परिवार, अपनी पत्नी और सालों के लिए सत्ता का खुलकर इस्तेमाल करते रहे। हरियाणा का चौटाला परिवार जेल से पार्टी चला रहा है। ऐसे में विचारधारा का क्या हो रहा होगा, ऊपरवाला ही जाने। वहां चौटाला परिवार ही विचारधारा है। कर्नाटक में देवगौडा ने पार्टी को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाया हुआ है, जिसके केंद्र में देवगौड़ा परिवार की विचारधारा ही सब कुछ है। ओडिशा में बीजू जनता दल के सर्वेसर्वा नवीन पटनायक अपने ही मुताबिक सरकार और पार्टी चला रहे हैं। उनके खिलाफ बोलने वालों को पार्टी से बाहर किया जाता है। सत्ता मे बने रहना यह उनका एक मात्र लक्ष्य है और वह सत्ता मे बने हुए हैं। कुल मिलाकर आज के समाजवादिया का काम बड़े उद्योगपतियों से दोस्ती और सत्ता सुख का आनंद रह गया है। लगता है, समाजवादी विचारधाराओं को फिर से परिभाषित करने का समय आ गया है।

वामपंथी विचारधारा
वामपंथी दल भी इस देश की राजनीति में दखल रखते हैं। सीपीआई के गठन को लेकर असमंजसता बनी हुई है। सीपीआई 1925 में गठित होने की बात करती है तो सीपीएम 1920 में गठित होने की बात कहती है। बहरहाल, वामपंथियों ने भी देश की आजादी की लड़ाई खुलकर लड़ी। शहीद भगत सिंह इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। जब वामपंथियों पर इस देश मे बंदी थी, तब वामपंथी नेता कांग्रेस सोशिलिस्ट पार्टी के मंच से काम कर रहे थे। बाद में बंदिश हट गई। 1957 में ईएमएस नंबूद्रीपाद के नेतृत्व में पहली वामपंथी सरकार केरल में बनी। इसे लेकर चीन के वामपंथियों ने सीपीआई की आलोचना की और यहां से सीपीआई मे दो गुट हो गए – एक चीन समर्थक और एक रूस समर्थक। 1962 के भारत चीन युद्ध के बाद तो पार्टी टूट गई। चीन समर्थक बीटी रणदिवे, ज्योति बसु, पी.सी. जोशी, हरिकिशन सिंह सुरजीत ने नई पार्टी बनाई सीपीआईएम। समय के साथ सीपीआई पीछे रह गई। अब मात्र त्रिपुरा में उनकी सरकार है। दूसरी ओर सीपीआईएम ने लगातार कई सालों तक पं. बंगाल में सत्ता सुख भोगा और केरल में वह प्रमुख पार्टी है। लेकिन समय के चलते सीपीआईएम में भी विचारधारा पर ज्योति बासु का व्यक्तित्व हावी हो गया। बसु के बाद बंगाल के मुख्यमंत्री बने बुद्धदेव भट्टाचार्य भी बसु की व्यक्तिगत छवि के सामने बौने साबित हुए। आज पं. बंगाल में पार्टी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। वर्तमान में प्रकाश कारात राष्ट्रीय नेतृत्व संभाले हुए हैं, लेकिन उन पर भी व्यक्तिवाद हावी है। पार्टी में प्रकाश के कामकाज के तरीकों लेकर भारी आक्रोश है।

अन्य दल बनाम क्षेत्रीय दल
दलितों की लड़ाई लडऩे वाले कांशीराम ने अथक मेहनत कर बहुजन समाज पार्टी का गठन किया। जब पार्टी उत्तर प्रदेश में अपने पैर जमा चुकी तो वह प्रदेश की बागडोर मायावती को सौंप देने के बाद केंद्रीय राजनीति में सक्रिय हो गए। धीरे-धीरे पार्टी विचारों से भटक गई । सत्ता ने पार्टी के मकसद को ही ग्रहण लगा दिया। पार्टी में भ्रष्टाचार पनपने लगा और मायावती के व्यक्तित्व के आगे कांशीराम भी बौने नजर आने लगे। मौजूदा दौर में बसपा में बस एक ही नेता, एक ही विचार है और वह है -बहन कु. मायावती।

जब राष्ट्रीय राजनीतिक दलों ने विचारधारा की जगह पर व्यक्तिवाद को महत्व देना शुरू किया तो विभिन्न राज्यों में पनप रहे असंतोष को वहां के कद्दावर नेताओं या व्यक्तियों ने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए उस असंतोष का जमकर उपयोग किया। तमिलनाडु में 1949 में अन्ना दुरई ने द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम यानी ‘डीएमके’ की स्थापना की। आज यह पूरी पार्टी एक ही व्यक्ति एम करुणानिधि और उनके परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है। अपनी महत्वाकांक्षा को पूरी करने के लिए डीएमके से अलग हुए एम.जी. रामचंद्रन ने 1972 में एआइएडीमके बनाई। तब से अब तक तमिलनाडु में डीएमके और एआइएडीमके उलट-पलट कर राज कर रहे हैं। वर्तमान में जयललिता प्रदेश की मुख्यमंत्री हैं। दोनों दलों की कोई विचारधारा नहीं है। ये दोनों ही केंंद्र में जिस दल के पास सत्ता होती है, उसी के साथ होते हैं।

आंध्र प्रदेश में अपने दामाद को राजनीति में सफल बनाने के लिए वहां के फिल्म एक्टर एन.टी. रामाराव ने तेलगू देशम पार्टी का गठन किया। अपनी लोकप्रियता को भुनाते हुए वह मुख्यमंत्री बने। उनके रहते उनके दामाद ने पार्टी पर कब्जा कर खुद मुख्यमंत्री पद का सुख लिया। हालंाकि वह पिछले कई सालों से सत्ता के बाहर हैं। उनकी कोई विचारधारा नहीं है। सत्ता उनका लक्ष्य है। महाराष्ट्र में मराठी अस्मिता को हवा देकर बाल ठाकरे ने शिव सेना का गठन किया। उन्होंने सत्ता-सुख भी लिया। हालंाकि पिछले इतने सालों में शिवसेना के चलते मराठियों का कितना भला हुआ, यह तो कहना मुश्किल है, लेकिन आज ठाकरे परिवार मुंबई में सबसे ताकतवर परिवार बन गया है। सत्ता संघर्ष ने शिव सेना में भी दो फाड़ किया। बालासाहब के भतीजे राज ठाकरे ने नई पार्टी बनाई – महाराष्ट्र नवनिमार्ण सेना। लेकिन दोनों दल मराठियों के नाम से अपनी रोटी सेंक रहे हैं, जबकि महाराष्ट्र के किसान आत्महत्या कर रहे हैं। महाराष्ट्र में दो दशक पहले एक और व्यक्ति आधारित पार्टी का उदय हुआ – राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी। कभी कांग्रेस में सोनिया गांधी का विरोध करके अपना अलग दल खड़ा करने वाले महाराष्ट्र के बड़े नेता शरद पवार ने सिद्धांतों के नाम पर कांग्रेस तो छोड़ी, लेकिन सत्ता मोह में वह पिछले दस सालों से उन्हीं सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का हिस्सा हैं। राकांपा में भी पवार ही सब कुछ हैं। विचारधारा के नाम पर एक और पार्टी पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की तेज-तर्रार नेत्री ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़ तृणमूल कांग्रेस बनाई। कई साल संघर्ष करने के बाद वहां के वामपंथियों को हराने के बाद वह सत्ता में आई हैं। लेकिन उसका लक्ष्य वामपंथियों को हराने का था, वह उन्होंने पूरा कर लिया। लेकिन राज्य के विकास को लेकर वहां अब भी असंमजस की स्थिति बनी हुई है। तृणमूल पूरी तरह से एक व्यक्ति आधारित पार्टी है, जहां विचारधारा से लेकर रणनीति तक सब कुछ ममता हैं। उत्तरी पूर्व में छोटे-छोटे राज्य हैं और उनकी अपने कबीले पर आधारित पार्टियां हैं। असम में असमगण परिषद एक अच्छा प्रयास था, लेकिन सत्ता में आने के बाद विचाारधारा से भटकाव आने के कारण पार्टी टूट गई और कांग्रेस वहां एकछत्र राज कर रही है। पूरे देश का लेखा जोखा देखने के बाद देश की राजनीति से राजनैतिक विचारधारा नामक तत्व लुप्त होता दिखाई दे रहा है और व्यक्तिवाद कई रूप में परिभाषित होता दिखाई दे रहा है।

(इस लेख में प्रकाशित सभी बॉक्स सामग्री सुश्री स्मिता मिश्रा ने लिखी है।)

отзывов сайткампания или компания

Leave a Reply

Your email address will not be published.