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विचारधारा देश की हो

देश में आज तनावपूर्ण माहौल है। सब लोग देश कीवर्तमान स्थिति को लेकर चिंतित हैं। विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने वाला भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां से उसके कर्णधारों को आगे की राह नहीं सूझ रही है। यह केवल आर्थिक दुरावस्था की बात नहीं है, बल्कि देश आंतरिक और बाह्य सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा आदि हर क्षेत्र में उलटी दिशा की तरफ बढ़ता लग रहा है। रूपए की भारी गिरावट के बाद स्वयं प्रधानमंत्री ने संसद में बोला है कि ‘देश अभी एक गंभीर परिस्थिति का सामना कर रहा है।’

इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि राजनैतिक पार्टियां अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए शासनतंत्र को पूरी तरह भ्रष्ट बना चुकी हैं। शासन व्यवस्था देश हित की किसी विचारधारा से प्रेरित नजर नहीं आती। शासन व्यवस्था बुरी तरह व्यक्तिनिष्ठ हो चुकी है। कांग्रेस, भाजपा, समाजवादी पार्टी, वामपंथी दल या विभिन्न क्षेत्रीय राजनीतिक दल- सभी पार्टियां व्यक्तिनिष्ठा की बेडिय़ों में जकड़ी हुई दिख रही हैं। परिवारवाद दल के हितों से भारी हो चुका है।

भारतीय राजनीति में विचारधारा का एक विशेष महत्व है। परंतु भूमंडलीकरण शुरू होने के बाद देश में गठबंधन सरकारें आई, जिसमें विचारधारा एवं मूल्यबोध-राजनीति का स्थान गौण हो गया है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने हमेशा भाजपा की विचारधारा को हिमालय के समक्ष सम्मान दिया। उन्होंने 21 दलों को लेकर 6 साल तक एन.डी.ए. की सरकार चलाई थी। उस गठबंधन में अलग-अलग विचारधारा के लोग भी शामिल थे। पहले ऐसा लगता था कि भाजपा एवं वामपंथी दल एक वैचारिक दृष्टिकोण को लेकर राजनीति करते थे, परंतु आज वह स्थिति नहीं रही। कुछ बुद्धिजीवियों का मानना है कि राजनीति एवं विचारधारा का साथ-साथ चलना संभव नहीं हैं।
भाजपा एवं वामंपथी दलों के कई नेता विचारधारा पर उठते सवालों पर कई बार चुप्पी साध लेते हैं। राष्ट्र को परम वैभवपूर्ण बनाने के लिए जिन आचरणों एवं विचारों का अनुसरण करना चाहिए, वही हमारे राष्ट्र के लिए सर्वोपरि है। राजनैतिक दल जब तक विचारधारा का अनुसरण करते रहेंगे तब तक उन्हें लम्बे समय तक कोई परेशानी नहीं आएगी।

राजनीति में विचारधारा के विलुप्त होने के साथ-साथ राजधर्म का निर्वाह भी लगभग समाप्त होता जा रहा है। नेता किसी भी दल का हो, राजनीति में लम्बे समय तक रहने के लिए वह दल के विचार एवं स्वार्थनिष्ठ होकर अपने व्यक्तिनिष्ठ विचारों को आगे बढ़ा रहा है, जिससे विचारों का प्रदूषण बढऩे के साथ-साथ दलों का भी भारी नुकसान हो रहा है।

भारतीय राजनीति में कांग्रेस इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। भाजपा में भी लालकृष्ण

आडवाणी, नरेंद्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान एवं रमण सिंह जैसे मुख्यमंत्री दल से भारी होकर व्यक्तिनिष्ठ राजनीति को प्राथमिकता देते हैं। लेकिन अब समय आ गया है जब देश के प्रमुख राजनैतिक दलों को व्यक्तिनिष्ठ राजनीति एवं परिवारवाद से मुक्त होकर, देश को आगे बढ़ाने वाली विचारधारा को साथ लेकर चलने का संकल्प करना होगा।

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