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बरकरार रखें दांतों की चमक

दांतों के स्वास्थ्य के लिए लोगों को एक निश्चित समयावधि पर दंत-चिकित्सकों के पास जाते रहना चाहिए। दंत-चिकित्सकों के पास नियमित रूप से जाने से दांतों में पैदा होने वाली बीमारियों की जानकारी समय से मिल जाती है और उनका बेहतर इलाज करना संभव होता है। दांतों से जुड़ी हुई कई समस्याओं को पहचानने में एक सामान्य व्यक्ति असमर्थ होता है। ऐसे में एक दंत चिकित्सक ही दांतों और मसूढ़ों से जुड़ी समस्याओं को पहचानने में मददगार होता है। दांत का पीला होने जैसी कई समस्याओं को लोग नजरअंदाज कर देते हैं। लोगों में यह गलत धारणा होती है कि बाजार में उपलब्ध टूथपेस्ट या ब्रश बदलने से समस्या का समाधान हो जाएगा। दांतों में असमानताएं, अनुचित तरीके से दांतों का निकलना आदि बच्चों में दिखने वाली आम समस्याओं पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत होती है। आमतौर पर माता-पिता शुरूआती चरण में इसे नजरअंदाज कर देते हैं। जिसके कारण यह समस्या गंभीर हो जाती हैं।

मसूढ़ों से संबंधित समस्याओं के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार जंक फूड, बिस्कुट या बर्गर जैसे खाद्य पदार्थ दांतों में जमा होकर बैक्टीरिया को विकसित करते हैं।

समस्या बढऩे के पहले कुछ कार्य
बच्चों में ‘असमान दांतों के विकास’ के इलाज के लिए शल्य चिकित्सा की जरूरत होती है, लेकिन विकास के शुरूआती चरण में इस समस्या का निदान शल्य चिकित्सा के जरिए हो सकता है। बच्चों में यह समस्या सामान्यत: 9 से 12 साल की उम्र के बीच शुरू होती है और यही वो समय है, जब उनका उपचार शुरू किया जाए। इस उम्र में बच्चों के दूध के दांत टूटकर स्थायी दांत उगने शुरू होते हैं। एक और महत्वपूर्ण तथ्य, जिससे माता-पिता अनजान रहते हैं कि इस उम्र में जबड़ों का विकास एवं चेहरे का आकार स्थायित्व ले रहे होते हैं। ऐसे में बच्चों का इलाज आसान और उचित होता है।

दांतों में पीलापन छाना, एक ऐसा महत्वपूर्ण तथ्य है, जिसका सामना बच्चों से लेकर व्यस्क भी करते हैं। यह शरीर में कैल्शियम की कमी को दर्शाता है। भविष्य में यह मसूढ़ों के क्षरण, उनमें सूजन, मसूढ़ों से खून का रिसाव, सांसों का दुर्गंध आदि कई समस्याओं के लिए जिम्मेदार हो जाता है। इसके लिए दांतों की देखभाल और क्लिनिकल सफाई आवश्यक होती है।

कैविटी में संक्रमण का सीधा असर दांत की जड़ों पर पड़ता है। समय पर यदि इनका इलाज नहीं कराया जाता है, तो दांतों का क्षरण रोकने के लिए खर्चीले ‘रूट कनाल’ प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। दांतों में गड्ढ़े होने की बीमारी का इलाज समय पर कराने से, दांतों को भरने जैसी साधारण प्रक्रिया के तहत इसका समाधान हो सकता है। इससे मरीजों को दांतों के दर्द से छुटकारा तो मिलता ही है, साथ में पैसों की भी बचत होती है। इसे नजरअंदाज करने के परिणामस्वरूप ये गड्ढ़े गहरे होते हुए ऊत्तकों तक पहुंच जाते हैं और दांतों को बर्बाद कर देते हैं। इससे दांत समय से पहले गिर जाते हैं। संक्रमित दांत को निकलवाना ही इसका उपाय होता है। दांत को निकलवाने के बाद दांतों के बीच फासला हो जाता है, जिससे वहां भोजन का अंश जमा होने लगता है और खाने को चबाने मे समस्या आदि कई तरह की परेशानियां पैदा हो जाती हैं।

दांतों से संबंधित कुछ जानकारियां:-
• दांतों के ब्रश को टॉयलेट से कम से कम 6 फीट दूर रखें, ताकि फलश से निकलने वाले कीटाणुओं के पहुंच से वह दूर रहे।
• जाड़े के बाद दांत के ब्रश को बदल देना चाहिए। इससे संक्रमण फैलने का खतरा नहीं रहता है।
• दांत के ब्रश के ऊपर ढक्कन नहीं लगाना चाहिए, इससे बैक्टीरिया नहीं पनप पाता।
• दांतों पर ज्यादा दबाव से ब्रश करने से एनामेल को नुकसान होता है।

दांतों के स्वास्थ्य के लिए लोगों को एक निश्चित समयावधि पर दंत-चिकित्सकों के पास जाते रहना चाहिए। दंत-चिकित्सकों के पास नियमित रूप से जाने से दांतों में पैदा होने वाली बीमारियों की जानकारी समय से मिल जाती है और उनका बेहतर इलाज करना संभव होता है। दांतों से जुड़ी हुई कई समस्याओं को पहचानने में एक सामान्य व्यक्ति असमर्थ होता है। ऐसे में एक दंत चिकित्सक ही दांतों और मसूढ़ों से जुड़ी समस्याओं को पहचानने में मददगार होता है। दांत का पीला होने जैसी कई समस्याओं को लोग नजरअंदाज कर देते हैं। लोगों में यह गलत धारणा होती है कि बाजार में उपलब्ध टूथपेस्ट या ब्रश बदलने से समस्या का समाधान हो जाएगा। दांतों में असमानताएं, अनुचित तरीके से दांतों का निकलना आदि बच्चों में दिखने वाली आम समस्याओं पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत होती है। आमतौर पर माता-पिता शुरूआती चरण में इसे नजरअंदाज कर देते हैं। जिसके कारण यह समस्या गंभीर हो जाती हैं।

मसूढ़ों से संबंधित समस्याओं के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार जंक फूड, बिस्कुट या बर्गर जैसे खाद्य पदार्थ दांतों में जमा होकर बैक्टीरिया को विकसित करते हैं।

समस्या बढऩे के पहले कुछ कार्य
बच्चों में ‘असमान दांतों के विकास’ के इलाज के लिए शल्य चिकित्सा की जरूरत होती है, लेकिन विकास के शुरूआती चरण में इस समस्या का निदान शल्य चिकित्सा के जरिए हो सकता है। बच्चों में यह समस्या सामान्यत: 9 से 12 साल की उम्र के बीच शुरू होती है और यही वो समय है, जब उनका उपचार शुरू किया जाए। इस उम्र में बच्चों के दूध के दांत टूटकर स्थायी दांत उगने शुरू होते हैं। एक और महत्वपूर्ण तथ्य, जिससे माता-पिता अनजान रहते हैं कि इस उम्र में जबड़ों का विकास एवं चेहरे का आकार स्थायित्व ले रहे होते हैं। ऐसे में बच्चों का इलाज आसान और उचित होता है।

दांतों में पीलापन छाना, एक ऐसा महत्वपूर्ण तथ्य है, जिसका सामना बच्चों से लेकर व्यस्क भी करते हैं। यह शरीर में कैल्शियम की कमी को दर्शाता है। भविष्य में यह मसूढ़ों के क्षरण, उनमें सूजन, मसूढ़ों से खून का रिसाव, सांसों का दुर्गंध आदि कई समस्याओं के लिए जिम्मेदार हो जाता है। इसके लिए दांतों की देखभाल और क्लिनिकल सफाई आवश्यक होती है।

कैविटी में संक्रमण का सीधा असर दांत की जड़ों पर पड़ता है। समय पर यदि इनका इलाज नहीं कराया जाता है, तो दांतों का क्षरण रोकने के लिए खर्चीले ‘रूट कनाल’ प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। दांतों में गड्ढ़े होने की बीमारी का इलाज समय पर कराने से, दांतों को भरने जैसी साधारण प्रक्रिया के तहत इसका समाधान हो सकता है। इससे मरीजों को दांतों के दर्द से छुटकारा तो मिलता ही है, साथ में पैसों की भी बचत होती है। इसे नजरअंदाज करने के परिणामस्वरूप ये गड्ढ़े गहरे होते हुए ऊत्तकों तक पहुंच जाते हैं और दांतों को बर्बाद कर देते हैं। इससे दांत समय से पहले गिर जाते हैं। संक्रमित दांत को निकलवाना ही इसका उपाय होता है। दांत को निकलवाने के बाद दांतों के बीच फासला हो जाता है, जिससे वहां भोजन का अंश जमा होने लगता है और खाने को चबाने मे समस्या आदि कई तरह की परेशानियां पैदा हो जाती हैं।

दांतों से संबंधित कुछ जानकारियां:-
• दांतों के ब्रश को टॉयलेट से कम से कम 6 फीट दूर रखें, ताकि फलश से निकलने वाले कीटाणुओं के पहुंच से वह दूर रहे।
• जाड़े के बाद दांत के ब्रश को बदल देना चाहिए। इससे संक्रमण फैलने का खतरा नहीं रहता है।
• दांत के ब्रश के ऊपर ढक्कन नहीं लगाना चाहिए, इससे बैक्टीरिया नहीं पनप पाता।
• दांतों पर ज्यादा दबाव से ब्रश करने से एनामेल को नुकसान होता है।

दांतो को स्वस्थ रखने के कुछ उपाय
• दिन में कम से कम दो बार दांतों की सफाई करनी चाहिए।
• हर तीन महीने पर ब्रश को बदल देनी चाहिए। यदि उनके रेशे टेढ़े-मेढ़े हो गए हों तो समय से पहले ब्रश को बदल देनी चाहिए।
• जीभ को साफ रखें।
• पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।
• फलॉस के माध्यम से दांतों को रोजाना साफ रखें।

इन से बचें
• दांतों को भींचे या पीसें नहीं।
• खाने के दौरान स्नैक्स और मीठा खाने से बचें।
• बिना ब्रश किए सोएं नहीं।
• दांतों से बोतल खोलने का प्रयास नहीं करें।
• दांतों से नाखून को नहीं चबाएं।
• तंबाकू खाने से परहेज करें।
• कठोर ब्रश का इस्तेमाल नहीं करें। इससे दांतों के एनामेल को नुकसान होता है, जिससे दांत संवेदनशील हो जाते हैं।

 डॉ. प्रणब मेहता

• दिन में कम से कम दो बार दांतों की सफाई करनी चाहिए।
• हर तीन महीने पर ब्रश को बदल देनी चाहिए। यदि उनके रेशे टेढ़े-मेढ़े हो गए हों तो समय से पहले ब्रश को बदल देनी चाहिए।
• जीभ को साफ रखें।
• पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।
• फलॉस के माध्यम से दांतों को रोजाना साफ रखें।

इन से बचें
• दांतों को भींचे या पीसें नहीं।
• खाने के दौरान स्नैक्स और मीठा खाने से बचें।
• बिना ब्रश किए सोएं नहीं।
• दांतों से बोतल खोलने का प्रयास नहीं करें।
• दांतों से नाखून को नहीं चबाएं।
• तंबाकू खाने से परहेज करें।
• कठोर ब्रश का इस्तेमाल नहीं करें। इससे दांतों के एनामेल को नुकसान होता है, जिससे दांत संवेदनशील हो जाते हैं।

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