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क्रोध: सबसे बड़ा दुश्मन

क्रोध: सबसे बड़ा दुश्मन

By उपाली अपराजिता रथ

मनुष्य आगे बढऩे से रोकने वाले कारणों को हमेशा ढूंढता रहता है। देखा जाए तो उसका राज उसके अंदर ही रहता है। उसके अंदर रहनेवाले छ: गुण उसके छ: राजों जैसे ही होते हैं। वह गुण हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मासचर्य। क्रोध उनमें सबसे बड़ा शत्रु माना जाता है।

काम एवं क्रोध एव राजोगुणसमुद्भव:
महाशनो महापाप्मा वद्धियेनमहि वैरणिम्

भागवद् गीता के तीसरे अध्याय में यह वर्णन हुआ है कि क्रोध कैसे रजोगुण में आता है। वह मनुष्य के आध्यात्मिक विकास का प्रतिबंधक होता है। क्रोध मनुष्य को पूरी तरह से भष्म कर देता है। जब मनुष्य क्रोध में आता है, तो वह अपना सब कुछ भूल जाता है। वह दूसरों का नुकसान करने के साथ-साथ अपना सबसे अधिक नुकसान करता है। कभी-कभी यह इतना भयंकर हो जाता है कि आदमी किसी की अथवा अपने आप की भी जान लेने से पीछे नहीं हटता। क्रोध के कारण उसके  अपने उससे दूर हो जाते हैं।

हम यह नहीं सोचते कि हमें क्रोध क्यों आता है।

ध्यायती विणयानपुंस: सगस्तेपुण्यायते
संगातसक्षायते काम: कामत्क्रोधोअभिजायते

गीता में कहा गया है कि जब मनुष्य विषय-वासना के मोह में अंधा हो जाता है तो वह अपने मन को वश में नहीं रख पाता है, तभी उसे क्रोध आता है। जब वह एहसास कर लेता है कि यहां सब कुछ परमात्मा परम- शक्ति की इच्छा से होता है, तब उसके आचरण में अनेक परिवर्तन हो जाते हैं। खुद को सर्वश्रेष्ठ मानने वाला इंसान हमेशा अल्प में क्रोधित हो जाता है। जब मनुष्य कुछ सोचता है और वह नहीं हो पाता, तब भी वह क्रोधित हो जाता है। अगर हम केवल कत्र्तव्य करें और फल की आशा न रखें तब हालात कुछ और हो जाएंगे।

क्रोध अभ्यास करने से कम नहीं होगा। यह आदत धीरे-धीरे बचपन से बढ़ती है। अत्यधिक क्रोध एक मानसिक व्यतिक्रम होता है। जब व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन खो देता है, वह अत्यधिक क्रोधित हो जाता है। एक संतुलित दिमाग के मनुष्य के पास कोई भी दिक्कत आती है तो वह आसानी से  समझ लेता है। शांत दिमाग से किया गया कार्य हमेशा प्रशंसनीय होता है।

हमारे सहने की क्षमता भी क्रोध का कारण बनती है। आजकल हम सबको हर चीज आसानी से उपलब्ध हो जाती है। तो जब उसमें थोड़ा-सा व्यतिक्रम होता है तो व्यक्ति क्रोधित हो जाता है। क्रोध उसकी अनेक बीमारियों का कारण भी बन जाता है। एक स्वस्थ मानव को हमेशा क्रोध से दूर रहना चाहिए। अपने दिमाग को शांत रखने के लिए जीवन को आध्यात्मिक आधार से आगे बढाए, अपने अहंकार को छोड़कर अपने अंदर सरलता के भाव को स्थान दे। सरल भाव
में रहने वाले व्यक्ति के पास क्रोध कदापि नहीं आ पाता है। जब व्यक्ति को क्रोध नहीं आता है, तो उसके विकास के रास्ते में रूकावट नहीं आती है।

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