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हर हाल में भाजपा के साथ

नीतीश कुमार के एनडीए से रिश्ता तोडऩे से लेकर एनडीए में नए सहयोगियों की तलाश तक में भाजपा के साथ खड़े, अकाली दल के सांसद सुखदेव सिंह ढींढसा से उदय इंडिया के संपादक दीपक रथ की बातचीत के अंश—

जेडीयू, एनडीए से अलग हो चुका है। सबसे पुराना सहयोगी होने के नाते, इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
जब जनसंघ था या आज भाजपा है, हमारा उसके साथ रिश्ता वही है और वही आगे भी चलेगा। कोई आए या जाए, हम तो एनडीए में ही रहेंगे।

नीतीश कुमार जिस तरह से भाजपा पर आक्रामक हुए हैं, उसकी भर्त्सना करेंगे आप?
नीतीश कुमार जी हमारे साथ भी रहे हैं। जो उन्होंने किया है, उन्हें वैसा नहीं करना चाहिए था। वे कांग्रेस के साथ मिलकर ऐसा करें तो यह अच्छी बात नहीं है। वाजपेयी साहब की सरकार में बहुत ऊंचे पद पर रहे हैं नीतीश जी। लेकिन उस वक्त उन्हें ऐसा कुछ नहीं लगा।

चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष नरेन्द्र मोदी के स्लोगन ‘नई सोच, नई उम्मीद’ पर आप क्या कहना चाहेंगे?
भाजपा के किसी भी फैसले पर, हम उसके साथ हैं। यह उनका आंतरिक मसला है कि वो किसको आगे लाते हैं और किसे नहीं। हम तो भाजपा के साथ हैं और उनका जो भी फैसला होगा, उनके साथ ही रहेंगे।

नरेन्द्र मोदी की छवि एक हार्डलाईनर और सख्त हिंदूवादी की है। क्या इससे एनडीए को कोई फर्क पड़ेगा?
नहीं, किसी समय आडवाणी साहब को भी यही कहते थे लोग। आहिस्ता-आहिस्ता, वो राष्ट्रीय राजनीति में आ जाएंगे। उन्हें बदलना होगा तो बदल जाएंगे।

नरेन्द्र मोदी में आप किस तरह का बदलाव देखना चाहते हैं?
उनकी जो छवि है, उसे किसी तरह से थोड़ी ठीक करने की जरुरत है। वो हम कर लेंगे।

किस तरह ठीक कर लेंगे, इसे स्पष्ट कीजिए?
नहीं। अब इसमें स्पष्ट क्या करुंगा।

भाजपा अगर नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रुप में आगे करती है, तो क्या अकाली दल उनके साथ है?
हमने पहले ही कह दिया है कि भाजपा जिसे भी आगे लाएगी, हम उसके साथ हैं।

पंजाब के भाजपा कार्यकर्ताओं का आरोप है कि वहां शहरों में भाजपा का थोड़ा बहुत आधार है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में बिल्कुल भी नहीं है। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
भाजपा के पास तो सारे शहरी विकास विभाग, स्थानीय निकाय, स्वास्थ्य और अन्य विभाग हैं। जितना बादल साहब भाजपा को साथ लेकर चलते हैं, उससे तो ऐसा नहीं लगता कि दोनों के बीच असंतोष है।

एक खबर के अनुसार, दिल्ली में आगे बढऩे के लिए अकाली दल ने खुफिया विभाग को लगाया है। क्या यह सच है?
नहीं, खुफिया एजेंसी की बात नहीं है। हर पार्टी चाहती है कि उसका संगठन हर जगह मजबूत हो। बात सिर्फ दिल्ली की नहीं है, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र में भी हम चाहते हैं कि अकाली दल का संगठन बन जाए। हम चाहते हैं कि दिल्ली में इस दफा विधानसभा चुनाव लड़ें। इस समय दिल्ली में हमारे 4-5 काउंसलर भी हैं। इसमें कोई हर्ज की बात नहीं है।

क्या मुद्दे देखते हैं आप 2014 के चुनाव के लिए?
सबसे बड़ा मुद्दा तो यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार और पिछले पांच साल की गलत नीतियां हैं। कोई ऐसी जगह नहीं है, जहां ये कामयाब हैं। कश्मीर का मसला देख लिजिए। जम्मू में क्या हो रहा है, वो देख लिजिए। विदेश नीति पूरी तरह विफल है। डॉ. मनमोहन सिंह के बारे में कहा जाता है कि वे बहुत बड़े अर्थशास्त्री हैं, लेकिन देख लिजिए अर्थव्यवस्था की क्या हालत है। रूपया लगातार नीचे जा रहा है। ना ही कोई विकास है और न ही कोई योजना। यह उनकी नीति है कि अगर हमारे साथ चलोगे तो, तुम्हारे राज्य को कुछ दे देंगे और साथ नहीं हो तो कुछ नहीं मिलेगा। नीतीश जी के मामले को ही देख लिजिए। क्या केन्द्र सरकार की ऐसी नीतियां हो सकती हैं?

कश्मीर जल रहा है और पाकिस्तान पिछले 6 महीने से उग्र हो रहा है। ऐसे में एक राजनीतिक दल होने के नाते केन्द्र के लिए आपका क्या सुझाव है?
अकेले कश्मीर ही नहीं है। सारे देश में ऐसी हालत पैदा हो रही है। ऐसे लोगों से सख्ती से निपटने में केन्द्र सरकार नाकाम है।

महंगाई और रूपये की लगातार गिरावट को कैसे रोका जा सकता है?
अर्थशास्त्री ही बता सकते हैं कि इसे कैसे रोका जा सकता है। लेकिन मैं तो यही कहूंगा कि जिस देश में दुनिया के बहुत बड़े अर्थशास्त्री कहे जाने वाले प्रधानमंत्री हैं, उस देश की स्थिति ऐसे कैसे हो गयी।

जितनी भी नीतियां देश में बन रही है, चाहे वो यूपीए की सरकार हो या एनडीए की सरकार हो, सिर्फ तुष्टीकरण की नीतियां देखाईं देती हैं। हिंदू को बांटने और मुस्लिमों को बहलाने की कोशिश कर वोट पाने की राजनीति हो रही है। इस तरह की नीति देश के भविष्य पर क्या असर डालती है?
वाजपेयी सरकार जब इस देश के प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने लोगों को जाति या धर्म के नाम पर बांटने की कोशिश कभी नहीं की। लेकिन ये लोग जरुर कर रहे हैं और इसी से देश को सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है। ये बांटने की कोशिश करते हैं और लोग बंट जाते हैं। इसका नुकसान देश को उठाना पड़ता है।

जम्मू-कश्मीर की स्थिति विस्फोटक हो गयी है। कश्मीरी पंडितों की तरह जम्मू से भी हिंदूओं को भगाने की कोशिश की जा रही है…
यह गलत नीति है। इससे देश को नुकसान हो रहा है। ऐसी स्थिति को रोकी जानी चाहिए। यह इस देश की सरकार की जिम्मेदारी बनती है।

पाकिस्तान की तरफ से आतंकवाद को बढ़ावा, घुसपैठ, सैनिकों की हत्या की जा रही है, इस मामले में पाकिस्तान के साथ किस तरह का व्यवहार किया जाना चाहिए? क्या उसके उपर सीधी कार्रवाई करनी चाहिए या बातचीत के जरिए सुलझाना चाहिए?
ऐसे हमले को सख्ती से निबटा जाना चाहिए। लेकिन पाकिस्तान में सेना शक्तिशाली है। वाजपेयी साहब ने बातचीत शुरू की थी, तब उन्होंने कारगिल में कब्जा कर लिया था। पाकिस्तान में अभी सरकार बनी है लेकिन सेना नहीं चाहती है कि दोनों मुल्कों के बीच संबंध बेहतर बनें। पावर तो उनके पास है। लेकिन मेरी व्यक्तिगत राय है कि बातचीत तो करनी ही चाहिए। यह सत्य है कि नवाज शरीफ चाहते हैं कि रिश्ते बेहतर हों, लेकिन सेना उनमें सबसे बड़ी बाधा है।

यह पाकिस्तान की समस्या है कि वहां लोकतांत्रिक सरकार और सेना में तालमेल नहीं है …
मैं मानता हूं कि सेना को उचित जवाब देना जरुरी है। लेकिन यह भी नहीं है कि उनसे बिल्कुल बात बंद कर दें। जब तक हालात ठीक नहीं होते, तब तक तो बात रोक देनी चाहिए लेकिन रिश्ता नहीं तोडऩी चाहिए।

न्यूयार्क में मनमोहन सिंह को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से बातचीत करनी चाहिए?
बातचीत तो बड़ी बड़ी लड़ाई होने बाद भी होती है।

विपक्ष ने बातचीत का विरोध किया है। पूरा देश भी इसका विरोध कर रहा है…
आखिर यह बात भी तो करनी पड़ेगी ना.. कि आपकी सेना रोज-रोज हमारे जवानों की हत्या कर रही है।

प्रधानमंत्री को उनसे मिलना चाहिए या नहीं?
मिलने में कोई ऐतराज नहीं होनी चाहिए। बात तो करना ही चाहिए। सभी मसले बातचीत से ही हल होते हैं। बांग्लादेश के जंग के बाद भी बातचीत हुई।

किश्तवाड़ हिंसा के बाद वहां के मंत्री किचलू का इस्तीफा देना ही पर्याप्त है या अब्दुल्ला सरकार को कोई और कदम उठाने की जरुरत है?
यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है। इस्तीफा से कोई बात नहीं बनने वाली। उमर को हिंसा करने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठानी चाहिए। सिर्फ इस्तीफा लेकर मामले की लीपापोती कर दी जाय तो यह सरकार की कमजोरी है।

उमर अब्दुल्ला ने ट्विट किया है कि जम्मू हिंसा में दो मुस्लिम भी मरे हैं और एक हिंदू मरा है। क्या उमर अब्दुल्ला धर्म के आधार पर, कश्मीर में मुस्लिमों को ज्यादा पीडि़त बताने की कोशिश कर रहे हैं?
मालूम नहीं उन्होंने ऐसा क्यों कहा। तथ्य क्या है वहां का, यह तो मुझे नहीं मालूम है। उन्होंने अपनी सफाई देने के लिए ऐसा कहा होगा।

2014 के चुनाव के लिए भाजपा के साथ जो तालमेल होगा, क्या वो वर्तमान आधार पर ही होगा या फिर आप भाजपा को कुछ और सीटें देंगे?
नहीं हमारा तो वैसा ही चलता है। वो उतनी ही सीटों पर लड़ते हैं।

सरकार बनाने के लिए पंजाब से आप कितनी सीटें लाएंगे?
पंजाब के ऐसे हालात हो रहे हैं कि हम 13 में से 13 सीटें भी जीत सकते हैं। बाकी तो वक्त ही बताएगा।

2014 में किसकी सरकार आएगी?
यह तय है कि एनडीए की सरकार बनेगी।

किस आधार पर एनडीए की सरकार बनेगी?
यह तो सभी सर्वे बता रहे हैं कि कांग्रेस सीटें कम हो रही है। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी। हर राज्य में दो समूह हैं। जैसे डीएमके है तो दूसरी एआईएडीएमके है। एक कांग्रेस के साथ जाएगी तो दूसरी कांग्रेस के खिलाफ। आप देखिएगा कि चुनाव से पहले एनडीए और मजबूत होगा। इसमें कई और पार्टियां आ जाएंगी।

क्या आपको लगता है कि नरेन्द्र मोदी के नाम पर वोटों का ध्रुवीकरण होगा?
कांग्रेस कोशिश कर रही है, लेकिन ध्रुवीकरण जैसी कोई बात नहीं है। लोगों में ऐसा विश्वास है कि नरेन्द्र मोदी के आने से प्रशासन में सुधार होगा और वो सुचारु रुप से काम करेगी।

अगर नीतीश कुमार कांग्रेस को समर्थन देते हैं, तो क्या शरद यादव का एनडीए में आने की संभावना है?
यह मैं अभी नहीं कह सकता। कभी किसी ने सोचा था कि नीतीश जी एनडीए को छोड़ देंगे? राजनीति में कुछ भी संभव है।

एनडीए में नए सहयोगियों के शामिल होने की कोई संभावना है?
कई आएंगे।

किन-किन लोगों से बातचीत चल रही है?
इन बातों को तो अभी मैं मीडिया में कहना उचित नहीं समझता। कई दफा ऐसा होता है कि अगर बात चल रही होती है और मीडिया में आ जाती है तो बात रुक जाती है। हां, मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि हम तीन नहीं, कई पार्टियां हैं और इक्कठा होकर लड़ेंगे।

प्री-पोल और पोस्ट-पोल, कभी भी गठबंधन हो सकता है …
हां… पोस्ट-पोल तो होगा ही होगा, प्री-पोल भी होगा।

देश के लिए शहीदों के स्मृति में ‘अमर शहीद स्मृति’ बनाने की बात बादल साहब ने कही थी, वो अभी तक पूरा नहीं हुआ?
उस पर जोर-शोर से काम चल रहा है। बादल साहब ने 25 करोड़ रूपये भी दे दिए हैं। आर्टिटेक्ट और इतिहासकार उस पर काम भी शुरू कर चुके हैं।

खेतों में ज्यादा उर्वरक इस्तेमाल करने के कारण पंजाब में कैंसर की समस्या बढ़ती जा रही है। इस पर सरकार का क्या रुख है?
यह बात सही है। उर्वरकों के इस्तेमाल से भूजल दूषित हो गया है। पीने की पानी की भी समस्या खड़ी हो गई है। इसके लिए गांवों से लेकर शहरों तक में बादल सरकार काफी काम कर रही है। सीवरेज का पानी निकालने के लिए खास इंतजाम किए जा रहे हैं। पीने का पानी मुहैया कराने के लिए विशेष कोशिश की जा रही है। कैंसर से लडऩे के लिए टाटा सहित कई अस्पताल आ रहे हैं।

पिछले 15-20 वर्षों में पंजाब में भूजल स्तर काफी नीचे जा चुका है। इसके लिए सरकार क्या कदम उठा रही है?
सरकार इसमें क्या कर सकती है। इसके लिए फसलों में विविधीकरण जरुरी है। विविधीकरण तभी हो सकता है, जब केन्द्र सरकार चाहे। लेकिन केन्द्र सरकार की कोई नीति है नहीं। जो वो कहते हैं, वो करते नहीं। इसमें सारी गलती केन्द्र सरकार की है।

राज्य सरकार की भी तो कुछ जिम्मेवारी बनती है?
राज्य सरकार क्या कर सकती है।

माल गोदामों की कमी, पंजाब की एक बड़ी समस्या है। उत्पादकता तो बहुत है, लेकिन कोल्ड स्टोरेज के अभाव में वो अनाज खुले मैदान में सड़ रहे है…
उसमें तो बहुत दिनों से बात चल रही है। हम अनाज खरीदकर केन्द्र सरकार को देते हैं। यह उनकी जिम्मेदारी है कि वो अनाजों को रखने के लिए हमें गोदाम उपलब्ध कराएं। पिछले साल पंजाब सरकार ने कुछ गोदाम बनाएं हैं, लेकिन केन्द्र सरकार इस पर ध्यान नहीं दे रही है। अनाज लेने के बाद केन्द्र सरकार वहां से अनाज ले जाती ही नहीं है। अनाज बाहर सड़ता रहता है और एफसीआई ध्यान नहीं देती।

पंजाब के 60 प्रतिशत विद्यालयों में शिक्षकों की कमी है। यह तो राज्य सरकार का मुद्दा है। इस पर सरकार का क्या रुख है?
56 हजार नए शिक्षकों की हमने भर्ती की है। अभी 20-25 हजार शिक्षकों की और भर्ती कर रहे हैं ताकि हर स्कूल में शिक्षकों की संख्या पूरी हो जाए। शिक्षा के मामले में एक बार पंजाब 13 वें स्थान पर चला गया था लेकिन अब फिर पहले नंबर पर आ गया है। आप आंकड़े देख लिजिए।

समाज में अशांति फैलाने को लेकर अकाली दल का नाम भी आता रहा है…
नहीं… नहीं… ऐसा कभी नहीं हुआ। पंजाब सबसे शांत राज्य है।

पाकिस्तान से हो रही ड्रग्स की तस्करी के माल पकड़े जाते रहे हैं। आंतरिक सुरक्षा को लेकर आपकी सरकार सचेत है?
इसके लिए हमने सख्त कदम उठाए हैं। बाहर से तस्करी कर लाए गए ड्रग्स को जितना हमारी सरकार ने जब्त किया है, उतना किसी ने नहीं किया है। लेकिन हमें पढऩे को मिल रहा है कि बीएसएफ की रजामंदी के बिना तस्करी नहीं हो सकती है।

ठीक है कि बॉर्डर स्टेट होने के कारण सुरक्षा की जिम्मेवारी केन्द्र सरकार की है। लेकिन पंजाब पुलिस भी …
वो तो हम कर ही रहे हैं। हमने करोड़ों रूपये का माल पकड़ा है। हाल ही में हमने नशे की गोलियों से लदी पूरी ट्रक पकड़ी है। पंजाब पुलिस अपना काम कर रही है।

पंजाब पुलिस और केन्द्र सरकार के बीच कैसी तालमेल है?
तालमेल तो है ही। हमारी पुलिस की केन्द्रीय बलों के शीर्ष अधिकारियों के साथ मीटिंग होती रहती है।

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