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मंच और फिल्मी परदे से जुड़ी यादें

उम्र का शतक पार कर चुकी अभिनेत्री जोहरा सहगल को कई पीढिय़ों के लोग अपने-अपने स्तर पर याद करते हैं। हाल ही में जोहरा सहगल की आत्मकथा ‘करीब से’ प्रकाशित हुई है। इसमें उन्होंने अपने जीवन का लेखा-जोखा पेश किया है। हमें उनके जीवन के विभिन्न दौरों, जीवन के संघर्षों और उपलधियों का पता चलता है।

नजीबाबाद के नवाबी खानदान में पैदा हुई जोहरा सहगल ने शुरुआत नृत्य से की थी। 1935 में उदयशंकर की नाट्य अकादेमी के साथ कई नृत्य आयोजन किए। अभिनेत्री के तौर पर पृथ्वी थिएटर और इप्टा से लंबे समय तक जुड़ी रहीं। अपने इस दौर के बारे में उन्होंने काफी विस्तार से लिखा है। इप्टा के बनने से लेकर निष्क्रिय हो जाने तक की यात्रा को जोहरा सहगल ने करीब से देखा है। 1962 तक वह मुंबई और दिल्ली में सक्रिय रहीं। 1962 से 1973 के अपने लंबे लंदन प्रवास में उन्होंने बीबीसी टेलीविजन, ब्रिटिश ड्रॉमालीग के नाटकों के साथ-साथ वहां के अनेक धारावाहिकों और फिल्मों में भी अभिनय किया। 1974 में वह दिल्ली लौट आईं, लेकिन यहां भी उनकी गतिविधियों में कमी नहीं आई। यहां हम पेश कर रहे हैं उनकी आत्मकथा ‘करीब से’ का एक अंश:

फिल्म ‘द गुरू’ में मैंने मस्तानी नाम का एक किरदार किया था जो एक तरह की धार्मिक औरत है। वह पर्दा करनेवाली औरतों से मिलती है और उनकी राजदार बन जाती है। गुरू (उत्पल दत्त) की पहली बेगम (मधुर जाफरी) की पांच बेटियां होती हैं लेकिन बेटा एक भी नहीं। मैं उसे एक मंत्र वाला ताबीज लाकर देती हूं जिसमें एक दवाई है जिसे खाकर उसका बेटा हो सकता है। माइकल योर्क पश्चिमी पॉप स्टार बने थे जो सितार सीखने के लिए भारत जाते हैं। रिता तुशिंघम एक हैप्पी है जो खूबसुरत दिखनेवाले गुरू पर पूरी तरह लट्टू है। फिल्म में मेरे केवल दो दृश्य हैं एक बेगम के साथ जिसमें मैं उसके लिए ताबीज लाती हूं और दूसरा तब जब मैं झूले पर अकेले छोड़ दी जाती हूं और रिता तुशिंघम एक कोने पर बैठकर सितार बजा रही होती है। पटकथा में क्योंकि मेरे लिए कोई डायलॉग नहीं लिखा गया था, मुझे इस तरह के किरदार के लिए बम्बइया लहजे में डायलॉग तैयार करने में बहुत ही मजा आया।

भारत के लिए रवाना होने से पहले मुझे रावलपिंडी में अपने बहनोई हामिद बट के इंतकाल की दुख-भरी खबर मिली। कहने की बात नहीं कि उजरा बहुत दुखी थी। वह ‘द गुरू’ की शूटिंग पूरी होने के बाद उजरा मुझे अपने साथ पाकिस्तान ले गई जहां हम लाहौर, पिंडी, पेशावर और कराची जाकर अपने दो भाइयों और दूसरी दो बहनों से मिले। यह पाकिस्तान जाने का मेरा पहला मौका था, मुझे वहां के लोग बहुत जोशीले और वतनपरस्त लगे। मुझे अहसास हुआ कि वहां के सभी लोग आर्थिक तौर पर बहुत बढिय़ा हालत में हैं, रामपुर से आनेवाले हमारे कुछ बहुत ही गरीब रिश्तेदारों के यहां एक या कुछ के पास दो-दो मकान तक थे।

उजरा को इतना उदास और निराश देखकर मैंने उसे बहुत मनाने की कोशिश की कि वह लंदन मेरे साथ चले और एक नई जिंदगी की शुरूआत करे। लेकिन उसने यह कहते हुए मना कर दिया कि यहां टेलिविजन और रेडियो के लिए अदाकारी के काम के अलावा अपने पेट्रोल पंप से होनेवाली कमाई की वजह से वह आराम से गुजारा कर सकती है। इसके अलावा उसे लगता था कि उम्र के उस पड़ाव में एक नई शुरूआत करने की ताकत उसमें नहीं है।
(पृष्ठ संख्या 168)

जहां तक ब्रिटीश ड्रामा लीग का सवाल है, वहां मुझे अदाकारी से जुड़ी अपनी जानकारियों को समझने में मदद मिली है। जब से 1945 में मैंने एक अदाकारा के रूप में पहली बार मंच पर पैर रखे थे, मैं अपने किरदारों को अपने अंदर से ही ढूंढ़-खोज को एक नाम दे सकती थी। ऐसा नहीं है कि ड्रामा लीग में जो भी जो भी सिखाया गया, मैं सब कुछ सीख गई थी, कुछ तो इतना तकनीकी था जो मेरी समझ से बाहर था और हमने नाटकों के कई सारे दृश्य तैयार किए भी, लेकिन इससे न तो मुझमें एक नाटकार बनने का आत्मविश्वास पैदा हुआ और न ही इच्छा। मुझे हमेशा ही अदाकारी अच्छी लगती थी और आज भी यही मेरी एकमात्र इच्छा है।

पढ़ाई के इस अरसे में मेरे व्यवहार में एक बहुत खुशनुमा तब्दीली हुई। बहुत समय बाद मुझे ऐसा लगा कि मैं फिर से स्कूल में हूं, बिना किसी बात की परवाह के,जोश से भरी हुई और हर चीज और हर किसी को देखकर मुस्कुराने वाली। अपने जैसे हंसी-मजाक को समझनेवाले दोस्तों का मिलना बहुत ही शानदार होता है और हंसने के लिए हमारे पास हजार बहाने थे क्योंकि हम लोग भानमती के ऐसे कुनबे की तरह थे जिसमें दुनिया के अलग-अलग देशों, धर्म और कौमों से जुड़े लोग शामिल थे। दक्षिण अफ्रीका से एक पुजारी, मिस्र से एक मुसलमान, अमेरिका से एक नाटककार, माल्टा से एक अदाकार, हांगकांग से एक डांसर, स्पेन से एक जज, इस्राइल से एक गायक, इसी मिले-जुले कुनबे के कुछ सदस्य थे। मेरे अलावा इसमें दो और भारतीय थे जिनमें से एक कुंवर बहादुर सिन्हा थे जो दिल्ली में नाट्य अकादमी में मेरी क्लास में पढ़ चुके थे। इतने सालों तक लेक्चर देने और पढ़ाने के बाद खुद पढ़ाई करना एक खुशनुमा बदलाव था। मैं अपने सफेद होते बालों को पूरी तरह से भूल गई और एक साल की लड़की की तरह गैरजिम्मेदाराना बर्ताव करती थी और उसमें वही बचपन के जैसा मजा भी पाती थी। मुझे नहीं लगता कि मैंने किसी और चीज में इतनी मस्ती की जितना इस कोर्स के दौरान की।
(पृष्ठ संख्या 152)

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