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‘अर्थ’ का अनर्थ हुआ

मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों के मद्देनजर आम आदमी को किसी प्रकार की राहत मिलती नजर नहीं आ रही है। महंगाई जल्द कम नहीं होगी। ब्याज दरों के घटने की भी कोई संभावना नहीं है। आम आदमी या आम निवेशक के लिये मार्केट में ज्यादा कुछ करने की गुंजाइश नहीं है। निवेशक के तौर पर शेयर और सोने के मार्केट में शॉर्ट टर्म में मुनाफा कमाने की गुंजाइश ढूंढ़़ी जा सकती है।

रुपए और शेयर मार्केट में उठा-पठक जारी है। महंगाई लगातार बढ़ रही है। सीरिया संकट के कारण कच्चे तेल के दाम बढऩे से देश की आर्थिक विकास दर के 6 प्रतिशत से नीचे पहुंचने की आशंका है। ऐसे में कई सवाल उठ रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था क्या एक बार फिर 1991 जैसे वित्तीय संकट के जाल में फंसने जा रही है? क्या देश की अर्थव्यवस्था मौजूदा संकट से उबर पाएगी? इसमें कितना वक्त लगेगा? आम आदमी को बढ़ती महंगाई और ऊंची ब्याज दरों से कब और कैसे राहत मिलेगी?

इकोनॉमी स्लोडाउन के कारण
अमेरिका अपनी वित्तीय स्थिति में सुधार चाहता है। यही कारण है कि उसने बांड मार्केट में हर माह 85 अरब डालर की खरीददारी को धीरे-धीरे खत्म करने का फैसला किया है। इसे निवेशकों में बेचैनी है। क्योंकि बांड मार्केट में तेजी खत्म होने की आशंका है। अमेरिका अपनी मुद्रा डालर को मजबूत कर रहा है ताकि उसके यहां निवेश बढ़े। इससे भारतीय मुद्रा -‘रुपए’ सहित अन्य देशों की मुद्राओं में गिरावट आ रही है। भारत का इंपोर्ट बढऩे से विदेशी मुद्रा ज्यादा बाहर जा रही है और देश में कम आ रही है। इससे चालू खाता का घाटा बढ़ रहा है। सरकार को इंपोर्ट को लेकर ज्यादा विदेशी मुद्रा चाहिए। अब सीरिया का संकट बढ़ गया है। अगर अमेरिका ने सीरिया पर हमला किया तो कच्चे तेल की कीमत बढ़ सकती है। इससे भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ सकता है। इन सब कारणों से भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित हो रही है। लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक के नए गवर्नर रघुराम द्वारा की गई कुछ घोषणाओं से भारत की गिरती हुई अर्थव्यवस्था को कुछ सहारा मिला है। बाजार भी कुछ संभला है। रूपया भी कुछ सुधरा है।

1991 का संकट
1991 में देश में विदेशी मुद्रा का भंडार महज 1.2 अरब डॉलर बचा था। पूर्व वित्त मंत्री बी.डी. गुप्ता के अनुसार, उस वक्त इस राशि से 3 हफ्ते के लिए तेल और अन्य वस्तुओं का इंपोर्ट किया जा सकता था। पिछले इंपोर्ट बिल का भुगतान करने के बाद जून 1991 में विदेशी मुद्रा भंडार की राशि आधी हो चुकी थी। भारत के सामने इंपोर्ट बिल चुकाने का संकट था। भारत को इंपोर्ट जारी रखने के लिए तुरंत 2.2 अरब डॉलर का भुगतान करना था। तब भारत ने अन्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से कर्ज मांगा और उसके एवज में ‘बैंक ऑफ इंग्लंैड’ में अपना सोना गिरवी रखा। आईएमएफ ने कुछ शर्तों के साथ 67 टन सोना गिरवी रखने के बाद भारत को 3.9 अरब डॉलर का अंतरिम कर्ज दिया था।

मौजूदा हालात
मौजूदा स्थिति काफी विकट है, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक, यह कहना जल्दबाजी होगी कि 1991 का दौर वापस आ सकता है। बेशक डॉलर के मुकाबले रुपया 67 के स्तर को पार कर गया है, लेकिन इस वक्त भारत के पास करीब 300 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है। इससे करीब 6 माह तक इंपोर्ट जारी रख सकते हैं। भारत ने इस साल 320 अरब डॉलर के निर्यात का लक्ष्य तय किया है। चिंता की बात यह है कि विदेशी निवेशक भारत में आने से न केवल कतरा रहे है, बल्कि वे शेयर मार्केट से रकम भी बाहर ले जा रहे हैं। निर्यात संगठन फियो के पूर्व अध्यक्ष रामू एस. देवड़ा का मानना है कि अगर भारत किसी भी तरह से रुपए को थोड़ा थामने और एक्सपोर्ट बढ़ाने में कामयाब हो गया तो स्थिति में सुधार आ सकता है।

आगे की चुनौती
विशेषज्ञों के मुताबिक, सबसे बड़ी चुनौती भारत के सामने यही है कि अगर अमेरिकी फेडरल रिजर्व बॉन्ड खरीद योजना में कटौती शुरू करता है तो फिर क्या होगा? ग्लोब कैपिटल के डायरेक्टर अशोक अग्रवाल का कहना है कि इसका असर दो मार्केट पर पड़ेगा। एक, शेयर मार्केट और दूसरा सोने का मार्केट। यूएस के बॉन्ड खरीद योजना में कटौती से जहां शेयर मार्केट में बिकवाली का दौर चलेगा, वहीं सोने को ऊपर ले जाने की कोशिशें की जाएंगी। इसके अलावा, अमेरिका सबसे अधिक जोर डॉलर को मजबूत करने के लिए लगाएगा। इस चुनौती से पार पाना भारत के लिए काफी मुश्किल होगा।

आम आदमी को राहत नहीं
मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों के मद्देनजर आम आदमी को किसी प्रकार की राहत मिलती नजर नहीं आ रही है। महंगाई जल्द कम नहीं होगी। ब्याज दरों के घटने की भी कोई संभावना नहीं है। आम आदमी या आम निवेशक के लिये मार्केट में ज्यादा कुछ करने की गुंजाइश नहीं है। निवेशक के तौर पर शेयर और सोने के मार्केट में शॉर्ट टर्म में मुनाफा कमाने की गुंजाइश ढूंढी जा सकती है।

खरीदार के तौर पर संतुलित रहना और वेट और वॉच की स्थिति में रहना ही बेहतर है।

क्या करे सरकार ?
सुधार कार्यक्रमों में तेजी

सुधार कार्यक्रमों में तेजी लाने के लिए उदार आर्थिक नीतियों में तेजी लानी चाहिए।

फायदा : ऐसा होने से विदेशी निवेशकों को यह संदेश जाएगा कि भारत विदेशी निवेश को लेकर गंभीर है। वह निवेश बढ़ाने की नीतियों पर काम कर रहा है। विदेशी निवेशक जो सरकारी नीतियों पर हो रही राजनीति से रुके हुए हैं, अपनी सोच बदल सकते हैं।

विनिवेश कार्यक्रम
तेल, रिफाइनरीज और स्टील सेक्टर की सरकारी कंपनियों का विनिवेश करना चाहिए।

फायदा: सरकार ने विनिवेश कार्यक्रम को ठंडे बस्ते में डाला हुआ है। मगर इस उतार-चढ़ाव के दौर में भी उन सरकारी कंपनियों के शेयर बेचे जा सकते हैं, जिनकी साख मार्केट में सही है। इससे मार्केट, खासकर रिटेल इनवेस्टरों को ताकत मिलेगी। गुरुवार को मार्केट ने करीब 500 अंक की रिकवरी की। इसका प्रमुख कारण था कि घरेलू संस्थानों ने शेयरों की खरीदारी की।

निर्यात
निर्यात बढ़ाने के ठोस कदमों का ऐलान करना चाहिए।

फायदा: सरकार अगर निर्यात सेक्टर को बढ़ाने के लिए कदम उठाती है, तो इससे विदेशी निवेश या मुद्रा का प्रवाह बढ़ेगा। व्यापार घाटा भी कम होगा। साथ ही आयातकों के लिए डॉलर की उपलब्धता भी बढ़ेगी।

नकदी
बैंकों को नकदी उपलब्ध कराएं ताकि वह ब्याज दरें नहीं बढ़ाएं, बल्कि कर्ज ज्यादा देना चाहिए। बैंक, ब्याज दरें बढ़ा रहे हैं, साथ ही नकदी की समस्या भी बता रहे हैं। इसके चलते वे कर्ज भी कम दे रहे हैं। अगर सरकार बैंकों को नकदी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराएं तो बैंक, एक तो ब्याज दरें नहीं बढ़ाएंगे, साथ ही कर्ज भी ज्यादा देंगे। इससे मार्केट में पैसे का प्रवाह बढ़ेगा।

स्टॉक सीमा
खाद्य वस्तुओं की स्टॉक सीमा चेक करें। जमाखोरों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।

फायदा: खाद्य वस्तुओं की थोक और रिटेल कीमतों का अंतर काफी बढ़ गया। इसका एक प्रमुख कारण जमाखोरी है। ऐसे में अगर केंद्र सरकार, राज्यों के साथ मिलकर स्टॉक सीमा चेक करें। देखें कौन तय नियमों से ज्यादा वस्तुओं का भंडारण कर रहा है, उसके खिलाफ कार्रवाई करें तो वस्तुओं की सप्लाई मार्केट में बढ़ सकती है।

डॉलर का प्रवाह
थोड़ा रिस्क लेकर डॉलर का प्रवाह मार्केट में बढ़ाना चाहिए।

फायदा: सरकार के पास करीब 280 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है। सरकार डॉलर को मार्केट में डालने से इसलिए बच रही है ताकि उसका रिजर्व कम न हो जाए। मगर सरकार समय-समय पर अपनी सुविधा को देखते हुए मार्केट में डॉलर डाले तो कम से कम डॉलर की डिमांड को लेकर तनाव कम हो सकता है।

क्या करे खुदरा निवेशक …

शेयर मार्केट
निवेशकों को पहले शेयरों में निवेश का बजट तय करना चाहिए।
अपने बजट का करीब 50 प्रतिशत उन बड़ी कंपनियों के शेयरों में लगानी चाहिए, जो बुरी तरह से गिर चुके हैं। इनमें बैंङ्क्षकग, इंश्योरेंस रीयल्टी, एफएमजीसी, इंफ्रा सेक्टर की बड़ी कंपनियों के शेयर प्रमुख है।
कई बड़ी कंपनियों के शेयर अपने निचले स्तर पर हैं। मार्केट किसी भी कंपनी का एक निचला स्तर तय करता है। इसका मतलब होता है कि उस कंपनी के शेयर इससे नीचे नहीं जा सकते। अगर कंपनी के शेयर इस स्तर पर आते हैं तो उनका उठना तय होता है। ऐेसे में उन शेयरों पर दांव लगाना चाहिए।
अपने बजट का 50 प्रतिशत उन छोटे शेयरों पर लगाना चाहिए, जिन पर उठा-पठक ज्यादा चल रही है। इन शेयरों में शॉर्ट-टर्म रणनीति अपनाते हए कारोबार करना चाहिए।

सोना और चांदी
क्या करें इनवेस्टर: फिलहाल सोने का ऊंचा स्तर 33,000 रुपये प्रति 10 ग्राम का बन रहा है। ऐसे में फिलहाल इसमें लंबे समय का निवेश करना बड़ी भूल होगी। शार्ट-टर्म पर निवेश भी काफी रिस्की है। कुछ रिस्क लेकर छोटे फायदे के लिये शार्ट-टर्म निवेश किया जा सकता है। क्योंकि सोना बीच-बीच में करेक्शन के चलते गिर सकता है। ऐसे में कुछ फायदा कमाया जा सकता है।

खरीददार कुछ रुके: मार्केट विशेषज्ञों का कहना है कि सोना 32 हजार के ऊपर जाकर फिर नीचे की तरफ आ सकता है। ऐसे में खरीददार को एक या दो माह तक रुकना ठीक रहेगा। अगर खरीददारी बहुत जरूरी है तो सोना बीच-बीच में 300 से 500 रुपये टूट सकता है। ऐसे समय में खरीददारी करें।

चांदी में होगी चांदी: इस बार सोने के साथ चांदी की मांग में तेजी है। सोना में फिलहाल ऊंचा स्तर 55 हजार प्रति किलोग्राम का बन रहा है। ऐसे में इसमें निवेश करना काफी फायदेमंद रहेगा।

निवेश के अन्य विकल्प
डेट फंड को देखें: डेट फंड इस वक्त सबसे सुरक्षित निवेश माना जा रहा है। डेट फंड में जो भी इनवेस्टमेंट आता है, उसको म्यूचुअल फंड सीधे तौर पर सरकारी इक्विटी में लगाते हैं या फिर कंपनियों के गैर परिवर्तनीय डिबेंचर में लगाते हैं। निवेश की राशि उन कंपनियों के गैर-परिवर्तनीय डिबेंचर में लगाई जाती है, जिनकी रेटिंग, एजेंसियां द्वारा की जाती है। पहले कंपनियों की रेटिंग तय की जाती है। जिन कंपनियों की बेहतर रेटिंग होती है, उनके ही गैर परिवर्तनीय डिबेंचर में इनवेस्टर की राशि का इनवेस्टमेंट किया जाता है। फिलहाल डेट फंड का रिटर्न 12 से 15 प्रतिशत के बीच चल रहा है। एलआईसी म्यूचुअल फंड के पूर्व रीजनल मैनेजर दिनेश कपूर का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में फिलहाल यह काफी बेहतर रिटर्न दे रहा है। यह काफी सेफ भी है।

सही रणनीति से एसआईपी में फायदा
अधिकांश मार्केट विशेषज्ञों का कहना है कि अगर रिटेल इनवेस्टर सही तरीके से स्टडी करने सिस्टैमेटिक इनवेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) में धन लगाएं तो काफी कमा सकता है। इसके लिए मार्केट की स्टडी और सही अवधि का प्लान लेने की जरूरत है। एसआईपी के तहत हर माह कुछ सेविंग इनवेस्टर से लिया जाता है। बाद में इससे मार्केट में लगाया जाता है। विनायक इंक के प्रमुख विजय सिंह के अनुसार एसआईपी को छह से एक साल के लिए लेना चाहिए। ज्यादा लंबा खींचना ठीक नहीं है। इसमें इस अवधि में करेंगे तो रिटर्न बेहतर मिल सकता है।
सरकार ने अब रुपए की हो रही सट्टेबाजी की जांच शुरू कर दी है। इस मामले में जांच एजेंसियों के साथ आरबीआई की भी मदद ली जा रही है। वित्त मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार इस बात की पुख्ता जानकारी मिली है कि दुबई और सिंगापुर सहित करीब 6 देशों में रुपए की जोरदार सट्टेबाजी हो रही है। सट्टेबाजी के चलते ही रुपए में जोरदार गिरावट हो रही है या उसे गिराया जा रहा है। यही कारण है कि डॉलर के मुकाबले रुपए में अन्य देशों की मुद्रा की तुलना में सबसे अधिक, मई से अब तक करीब 23 प्रतिशत तक की गिरावट आ चुकी है। जांच में इस बात का पता लगाया जा रहा है कि रुपए को क्यों गिराया जा रहा है। क्या इसके तार भारत या अन्य देशों में तो नहीं है। भारत सरकार, उन देशों के संपर्क में हैं, जहां पर रुपये को लेकर सट्टेबाजी करने की खबर है।
वित्त मंत्रालय के एक उच्चाधिकारी के अनुसार, रुपए में गिरावट के पीछे दो प्रमुख मकसद हो सकते हैं। एक तो भारत की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाना और दूसरा, भारत में आर्थिक अस्थिरता पैदा करके राजनीतिक हितों को साधना।
वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा इस बात से इंकार नहीं करते है कि रुपए की सट्टेबाजी जमकर हो रही है। रुपए में गिरावट को थामने के लिए इसकी सट्टेबाजी पर अंकुश लगाना होगा। सरकार इसके लिए कारगर कदम उठा रही है।

जोसफ बर्नाड

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