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रूपए का वास्तु दोष

हमारे नीतिकारों, अर्थशास्त्रियों और मुद्राशास्त्रियों को यह क्या हो गया है। रूपये के निशान के धड़ में आर-पार का चीरा लगाकर इन लोगों ने हमारी अर्थव्यवस्था का बंटाधार कर डाला।

हमारे देश में नायाब विचार और अनूठा विश्लेषण देने वाले महान मनीषियों की कोई कमी नहीं है। जब सारा देश रूपये की गिरती हुई कीमत के कारणों को समझने में दीवार से अपना सर फोड़ता हुआ लहूलुहान हो रहा है, तब एक महाशय ने बयान दिया कि रुपये के नए चिन्ह (र) में कोई वास्तु दोष है जिसके कारण रूपया डॉलर ($) की तुलना में अभी और गिरेगा। वास्तुशास्त्र में दिशाओं का बहुत महत्व है, इसलिए मैं उगते सूरज की ओर रूपये का यह रूनकता निशान लिए खड़ा हो गया हालांकि मुझे ईशान कोण की तरफ मुंह रखकर खड़ा होना चाहिए था। मैं देखना चाहता था इस वास्तु दोष का क्या प्रभाव पड़ता है। इस ठुनकती दुनिया में इस ठनठन गोपाल दास पर एक रूपया तो नहीं था मगर यह रुनकता निशान जरूर था। उसकी टांग मेरे मुख मंडल पर ऐसे पड़ रही थी जैसे बैसाख के महीने में गधे की लात पड़ती है। एक दम से मेरे मन में बिजली की तरह यह विचार कौंधा कि इस निशान में (र) की टांग को इस तरह खुला नहीं छोडऩा चाहिए था। (र) में ऊपर टोपी के समानान्तर जो चीरा लगाया गया है उससे स्पष्ट रूप से वास्तु दोष उत्पन्न हो गया। भारतीय संस्कृति में इस तरह चीरा लगाना वर्जित है क्योंकि यह तो किसी का पेट फाडऩे के समान है। अगर टोपी के समानान्तर इस चिन्ह की टांग में नीचे रेखा खींची जाती तो रूपया दोनों समानान्तर रेखाओं के बीच बंधा रहता। ठीक वैसे ही जैसे जीजा जी के बीच जा फंसा-बंधा रहता है। डॉलर कहता जा अबे जा तो रूपया कहता पहले बांयी और दांयी जीजियों को तो हटा। हिला के दिखा तो सही सैम अंकल की औलाद। इस बात को समझ लेना चाहिए कि डॉलर ($) को चीरने वाली खड़ी पाई वास्तव में मीठे पान को बांध कर रखने वाली सींक के समान है। यह अगर न हो तो डॉलर रायते की तरह बिखर जाए। अमेरिकी लोग वास्तुशास्त्र को कहीं ज्यादा अच्छी तरह समझते है और हम भारतीय लोग वास्तुशास्त्र के प्रणेता होते हुए भी खुद अपने प्यारे पुराने रूपैये का रायता फैलवाते है। हमारे नीतिकारों, अर्थशास्त्रियों और मुद्राशास्त्रियों को यह क्या हो गया है। रूपये के निशान के धड़ में आर-पार का चीरा लगाकर इन लोगों ने हमारी अर्थव्यवस्था का बंटाधार कर डाला। मैं तो कहता हूं जी की इस लग्जरी की जरूरत ही क्या थी। कौन सा हमारा रूपैया अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा बन गया था जो यह कलाकारी सोची गई? अब भुगतो भैया। चिन्ह बनाने वाले को तो घर बैठे बिठाए इनाम मिल गया और सारा देश उसका खामियाजा भुगत रहा है। वास्तुशास्त्र में जल कलश या घट का बड़ा महत्व है। मैं रिटायर होने से पहले जिस दफ्तर में काम करता था, उसमें जो कमरा मुझे मिला था, उसमें मेरी कुर्सी ऐसी थी कि मैं पूरब की ओर पीठ करके बैठता था और मेरी पीठ के पीछे एक खिड़की खुलती थी। एक वास्तुशास्त्री एक दिन मुझसे मिलने आए। बोले पूरब की तरफ पीठ करके बैठना बहुत अमंगलकारी है। आप अपनी सीट चेंज कर लीजिए। मैंने उन्हें बताया कि यह सम्भव नहीं है तो बोले इसका उपाय यह है कि आप एक लोटा पानी भरकर अपने पीछे रख लें। मैंने कहा – और उसके ऊपर नारियल। वे व्यंग्य नहीं समझ पाए और बोले कि नहीं सिर्फ पानी ही काफी है। अगले दिन मैं घर से लोटा ले आया और उसे भरकर खिड़की के पास रख दिया। कुलीग आएं और हंसें। नीचे काम करने वाले लोग मन ही मन मुस्कराएं। हफ्ते दस दिन तो वह लोटा रखा रहा। चपरासी रोज उसमें पानी भरता और मैं मंगल की कामना करता रहता। फिर एक दिन आया तो देखा कि लोटा नहीं है। वह गायब हो गया है। सिक्योरिटी को बुलाया। उसने कहा कि साहब यहां सरकारी दफ्तर में तो लोग आंखों में धूल झोंक कर हाथी तक ले जाते हैं, आपका लोटा भी कोई उड़ा ले गया होगा।

एक हंसोड़ कुलीग भी आ धमके और मजे लेते हुए बोले:
बड़े-बड़े दर्शन दिए
आकर प्रभु के धाम
लोटा लेकर चल दिए
जंगल सीताराम।
फिर उन्होंने भावार्थ किया: भाई सक्सेना जी जानते हो इसका क्या अर्थ है । इसका मतलब है कि कोई जरूरतमंद आपके इस पवित्र लोटे को लेकर दिशा मैदान करने चला गया है। आप धैर्य रखें और प्रतीक्षा करें। मैं तब से प्रतीक्षारत हूं। इस तरह से वास्तुशास्त्र ने मुझे लोटे की चोट दी। जिसे मैं आजतक सहता रहा हूं। लेकिन उगते सूरज के सामने रूपये के निशान ने मेरे को जो लात लगाई है उसके सामने लोटे चोरी का दंश कुछ भी नहीं।

 

मधुसूदन आनंद

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