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इन्द्रप्रस्थ में शुरू हो गई महाभारत

भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। दिल्ली के चुनाव प्रभारी नितिन गडकरी ने दो टूक कह दिया है कि पार्टी में दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने लायक 3-4 नेता हैं। इससे यही संकेत मिलते हैं कि पिछले तीन चुनावों की तरह ही इस बार भी कांग्रेस को सत्ता सौंपने के लिए भाजपा तश्तरी सजाने की तैयारी कर रही है।दिल्ली में भी 2014 के चुनावों के सेमीफाइनल के लिए चुनावी शतरंज की बिसात बिछ चुकी है। दिल्ली के एक करोड़, 15 लाख 69 हजार 619 मतदाताओं को लुभाने के लिए राजनीतिक दल अपने-अपने मोहरे सजाने में लगे हैं। बस, अब तो जैसे बिगुल बजने का इंतजार हो रहा है। राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीतियों को धार लगा रहे हैं। चुनाव लडऩे का सपना देख रहे प्रत्याशियों ने टिकटें पाने के लिए दौड़-धूप तेज कर दी है। नाटकीय ढंग से मुख्यमंत्री की कुर्सी मदनलाल खुराना से लेकर पहले साहिब सिंह को और फिर साहिब सिंह से सुषमा स्वराज को देने से राजधानी की जनता भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से कितनी नाराज हुई इसका अनुमान पिछले चुनावों तक भाजपा को दिल्ली में सत्ता से दूर रखे जाने से लगाया जा सकता है। भाजपा 15 साल के वनवास के बाद अब फिर सत्ता में लौटने का ख्वाब देख रही है। इसके लिए विजय गोयल ने मेहनत भी खूब की है, लेकिन अब उन्हें केवल अन्य दलों से ही नहीं बल्कि अपने साथियों से भी जूझना पड़ रहा है। चुनाव शुरू होने से ठीक पहले चुनावी प्रकोष्ठ के संयोजक सुधांशु मित्तल का अचानक त्यागपत्र दे देने और कोर कमिटी में केवल छह-आठ नेताओं के स्थान पर 54 नेताओं की बारात भर देने और चुनावों से पूर्व किसी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित न कर, सामूहिक नेतृत्व रखने की नीति बनाए जाने से साफ है कि भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। दिल्ली के चुनाव प्रभारी नितिन गडकरी ने दो टूक कह भी दिया है कि पार्टी में दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने लायक 3-4 नेता हैं।इससे यही संकेत मिलते हैं कि पिछले तीन चुनावों की तरह ही इस बार भी कांग्रेस को सत्ता सौंपने के लिए भाजपा तश्तरी सजाने की तैयारी कर रही है। अभी तो भाजपा ने उम्मीदवारों की सूची घोषित नहीं की है। पार्टी में अन्दरूनी संघर्ष का खेल तो उम्मीदवारों की सूची की घोषणा के बाद शुरू होने की आशंका जताई जा रही है। बकौल भाजपा अध्यक्ष विजय गोयल उम्मीदवारों की पहली सूची 15 सितम्बर तक घोषित कर दी जाएगी और 30 सितम्बर तक सभी उम्मीदवारों के नाम घोषित हो जाएंगे। इसके लिए विजय गोयल की अध्यक्षता में 24 सदस्यीय समिति का गठन किया गया है।कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी पार्टी के उम्मीदवारों के चयन के लिए प्रदेशाध्यक्ष जयप्रकाश अग्रवाल के नेतृत्व में 27 सदस्यीय समिति का गठन कर चुनावों के लिए पार्टी के उम्मीदवारों की औपचारिक चयन प्रक्रिया शुरू कर दी है। समिति में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और दिल्ली के सभी सांसदों के अतिरिक्त दिल्ली सरकार में दो मंत्री-हारून यूसुफ और अरविन्दर सिंह लवली को भी शामिल किया गया है। इनके अतिरिक्त वरिष्ठ विधायक चौ. प्रेम सिंह, सुभाष चोपड़ा, नसीब सिंह और ताजदार बाबर भी इस कमिटी में हैं।

दिल्ली में पंजाबी और सिख वोट बैंक लुभाने की नीति के तहत दलेर महंदी के लिए कांग्रेस ने पलक पांवड़े बिछा कर स्वागत किया है। दलेर मेहंदी के कांग्रेस में आकर पश्चिमी दिल्ली की चार सीटों (तिलक नगर, विकास पुरी, हरी नगर और राजौरी गार्डन) में से किसी सीट पर चुनाव लडऩे की अपनी इच्छा जाहिर करने से कांग्रेस के कई ऐसे नेताओं की पेशानी पर बल पड़ गए हैं, जो कई सालों से उन सीटों पर चुनाव लडऩे के सपने संजोए हैं। दूसरी ओर कांग्रेस में रूठों को मनाने का खेल चल रहा है। कांग्रेस में वापसी करने वालों में बदरपुर इलाके के गुर्जर नेता पूर्व विधायक रामबीर सिंह बिधुड़ी, पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान के छोटे भाई और बाटला हाउस मुठभेड़ को अदालत में लेकर जाने वाले पूर्व पार्षद आसिफ मोहम्मद खान, बदरपूर से पूर्व निर्दलीय विधायक रामसिंह नेताजी, मटिया महल से पूर्व विधायक शोएब इकबाल जैसे लोग जीत-हार का चुनावी गणित लगा कर कांग्रेस में आ रहे हैं। किसी भी पार्टी के लिए हार-जीत का खेल बिगाडऩे वाले अरविन्द केजरीवाल ने भी अपनी पार्टी ”आप’’ की ओर से पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी की लोकप्रियता भुनाने के लिए उन्हें अपनी पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने तक की पेशकश की है, लेकिन किरण बेदी ने फिलहाल तो उन्हें यह कह कर बैरंग लौटा दिया है कि वह गैर-राजनीतिक इंसान हैं।

दिल्ली में वैसे तो मुकाबला केवल कांग्रेस और भाजपा के बीच दिखता है, लेकिन यमुनापार की पटपडग़ंज जैसी अनेक सीटों पर केजरीवाल की ”आप’’ ने मुकाबले को त्रिकोण में बदल दिया है। ”आप’’ के अतिरिक्त शिरोमणि अकाली दल, समाजवादी पार्टी (सपा), शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा), पैंथर्स पार्टी, बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी), नेशनल कांफ्रेंस, लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) जैसी क्षेत्रीय पार्टियां भी दिल्ली विधानसभा के चुनावों में अपने हाथ आजमाने की कोशिश में हैं कि कहीं बिल्ली के भागों छींका टूटे तो दिल्ली की विधानसभा में उन्हें एक-दो सीटें मिल ही जाएं। लोजपा ने तो अपने सात उम्मीदवारों के नाम भी घोषित कर दिए हैं। दिलचस्प तो यह है कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में राज कर रही समाजवादी पार्टी दिल्ली विधानसभा के चुनाव में ”साइकिल’’ से ही डरी रहती है। ”साइकिल’’ समाजवादी पार्टी का उत्तर प्रदेश में चुनाव चिन्ह है, लेकिन अभी वह राष्ट्रीय पार्टी न बन पाने कारण अपने चुनाव चिन्ह ”साइकिल’’ को उत्तर प्रदेश से बाहर अन्य किसी राज्य के चुनावों में प्रयोग नहीं कर सकती। दिल्ली में यह चुनाव चिन्ह ”पैंथर्स पार्टी’’ के पास है।

दिल्ली के मतदाताओं में से 64 लाख 49 हजार 554 पुरूष और 51 लाख 54 हजार 506 महिला मतदाताएं हैं। इनमें युवा मतदाताओं की संख्या 3 लाख 50 हजार 288 है। ये आंकड़े 29 अगस्त 2013 तक हैं। राजधानी में दिसम्बर 2012 में युवा मतदाताओं के पंजीकरण का कार्य शुरू किया गया था और तब युवा मतदाताओं की संख्या केवल 98 हजार ही थी। दिल्ली की मतदाता सूची में 559 ट्रांसजेंडर मतदाता भी हैं, जबकि बेघर मतदाताओं की संख्या 6929 है।

श्रीकान्त शर्मा

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