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बदलता जनसांख्यिकी ग्राफ… किसी पर अंकुश, किसी को छूट

विवाह केवल कामवासना की पूर्ति का ही मार्ग नहीं है बल्कि स्वत्याग जैसे जीवन के उच्च मूल्यों को आगे बढ़ाने ओर व्यक्तिगत जीवन में भ्रष्ट आचरण को रोकने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
बात सन् 1978 के आसपास की है। आधुनिक संचार माध्यमों की तकनीक ने तो आजकल मित्र बनाने के लिए अनेक साधन उपलब्ध कर दिए हैं। लेकिन लगभग चार दशक पूर्व उस समय न तो इंटरनेट था और न ही मोबाइल था। नए दोस्त बनाने के लिए पत्र-पत्रिकाओं में पेन-फ्रेंडशिप के लिए सम्पर्क-पते छापने की परम्परा जरूर थी। किसी पत्रिका में काम करने वाले किसी उत्साहित व्यक्ति ने ऐसे ही कॉलम में मेरा नाम और पता प्रकाशित कर दिया। उसके बाद पत्रों के आने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह काफी लम्बा चला। उन पत्रों में मेरी कोई खास रूचि नहीं थी, इसलिए अधिसंख्य पत्र बगैर पढ़े ही रह गए। इसे मैं इत्तिफाक ही कहूंगा कि ढेर सारे पत्रों में से केवल एक पत्र का मैंने जवाब दिया। इतने वर्षों बाद भी मुझे आज तक समझ नहीं आया कि मैंने केवल उस पत्र का जवाब क्यों दिया था। वह पत्र जयपुर से किसी कॉलेज छात्रा का था। सामान्य ढंग से पत्रों के माध्यम से परिचय हुआ और पत्रों का सिलसिला कुछ दूर तक चला। यह सिलसिला केवल पत्रों तक ही सीमित रहा। मैं उससे कभी मिला नहीं। अचानक एक दिन उसने अपने पत्र में लिखा कि वह ईरान से जयपुर विश्वविद्यालय में पढऩे आए एक मुस्लिम युवक से विवाह कर रही है।

मैं विवाह को एक बहुत ही पवित्र बंधन मानता हूं। मेरा मानना है कि अपने पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक संस्कारों के आधार पर ही लड़की विवाह के बाद सुखी और खुशियों भरा जीवन व्यतीत कर सकती है। इन्हीं संस्कारों के आधार पर ही कोई लड़की अपने पति और उसके परिवारजनों के साथ खुश रह सकती है। लड़की अपने पिता के परिवार और सुसराल के बीच एक पुल का काम करती है और दोनों परिवारों को रोशन कर सकती है।

इसी विश्वास के आधार पर मित्रता का रिश्ता महसूस करते हुए जवाब में उस लड़की को मैंने 75 पृष्ठों का पत्र लिख कर यह समझाने की कोशिश की कि भिन्न संस्कृति, धर्म और अन्य देश के युवक से विवाह कर जीवन व्यतीत करने में उसके समक्ष क्या कठिनाइयां आ सकती हैं।

मेरे पत्र के बाद उसके पत्र आने बंद हो गए। संभवत: वह लड़की उस युवक से विवाह कर ईरान चली गई होगी।

चार दशक पुरानी इस घटना को लिखने का मेरा मकसद यह बिल्कुल नहीं है कि मैं एक मुस्लिम युवक पर किसी हिन्दु लड़की को अपने प्रेम जाल में फंसाने का आरोप लगा रहा हूं। किसी के भी दूसरे की ओर झुकने के अनेक कारण हो सकते हैं। व्यक्तित्व, ज्ञान, धन, लच्छेदार बातें करने का सलीका आदि कुछ भी हो सकता है। सब कुछ सोचते समझते हुए यदि वह लड़की दूसरे धर्म और वह भी दूसरे देश के युवक के प्रेमजाल में फंसी तो कोई बड़ा ही कारण रहा होगा। विवाह को लेकर यह एक संदर्भ है जो दो जिन्दगियों को पूरे जीवनभर एक विश्वास में बांधता है।

हिन्दू धर्म ही नहीं बल्कि किसी भी धर्म में विवाह को केवल महत्वपूर्ण संस्कार ही नहीं बल्कि किसी न किसी रूप में एक यज्ञ के रूप में माना जाता है। धर्म के अनुसार विवाह के बगैर शारीरिक भोग करना पूर्णतया अनुचित है। विवाह उपरान्त व्यक्ति सन्तान को जन्म देकर उसका उचित प्रकार से लालन पालन कर पितृ ऋण से मुक्त हो सकता है।

केवल वासना की पूर्ति नहीं
विवाह केवल कामवासना की पूर्ति का ही मार्ग नहीं है बल्कि स्वत्याग जैसे जीवन के उच्च मूल्यों को आगे बढ़ाने ओर व्यक्तिगत जीवन में भ्रष्ट आचरण को रोकने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। ज्योतिष गुरू के.एन. राव के निर्देशन में भारतीय विद्या भवन ज्यातिष संस्थान के आचार्य के.के. जोशी ने अपनी पुस्तक में विवाह के महत्व को समझाते हुए लिखा है कि ‘ब्रह्म आदि पवित्र संबंधों से उत्पन्न पुत्र ही पितृगणों की आत्मा को मुक्ति प्रदान करने के लिए तर्पण का अधिकारी है।’

हिन्दुओं के धर्मशास्त्रों में निम्नलिखित आठ प्रकार के विवाह बताए गए हैं:

1. पैशाच: यह अत्यन्त निन्दनीय प्रकार का विवाह है। सोई हुई कन्या अथवा बेहोशी की अवस्था में छलपूर्वक बलात्कार करना ‘पैशाच’ विवाह कहलाता है।
2. राक्षस: किसी कन्या का उसकी और उसके संबंधियों की इच्छा के विरूद्ध बलपूर्वक अपहरण करना ‘राक्षस’ विवाह है। ऐसा विवाह ‘हरण’ विवाह कहलाता हैं। मनु के अनुसार क्षत्रियों में इस प्रकार का विवाह मान्य है।
3. गंधर्व: ‘गंधर्व’ विवाह को ‘प्रेम विवाह’ भी कहा जा सकता है। कामवासना के वशीभूत हो कर परस्पर सहमति से यदि विवाह किया जाता है तो ऐसा विवाह ‘गंधर्व’ विवाह कहलाता है। इस प्रकार के विवाह में ‘कामवासना’ अथवा शारीरिक आकर्षण मुख्य निर्णायक बिन्दु होता है।
4. आसुरी: कन्या के पिता या उसके संबंधियों को धन देकर किया जाने वाला विवाह ‘आसुरी’ कहलाता है। यह एक प्रकार से कन्या को खरीदने जैसा होता है और इसे भी निन्दनीय माना जाता है। आचार्य के.के. जोशी ने ‘बोधायन धर्मसूत्र’ का उल्लेख करते हुए कन्या को बेचने वाले व्यक्ति को महापापी बताया है और लिखा है कि ऐसा व्यक्ति अपनी अगली और पिछली सात-सात पीढिय़ों के पुण्यों को समाप्त करता है।
5. प्रजापति: इस प्रकार के विवाह के लिए इच्छुक व्यक्ति भगवान प्रजापति के ऋण से मुक्त होने के लिए सन्तान उत्पन्न करने और उस सन्तान को पालपोस कर बड़ा करने के लिए कन्या के पिता से उसकी कन्या के साथ सीमित समय के लिए अनुबंध करता है। भगवान प्रजापति को सृष्टि का रचनाकार माना जाता है।
6. आर्ष: कन्या का पिता किसी व्यक्ति से गाय दान में लेकर अपनी कन्या से विवाह करने की अनुमति दे तो ऐसा विवाह आर्ष विवाह कहलाता है। पिता द्वारा अपनी कन्या से विवाह के लिए अनुमति दिए जाने के एवज में ली गई गाय कन्या का मूल्य नहीं होती, बल्कि वे यज्ञ करने के लिए ली जाती है।
7. दैव: यज्ञ करने वाले ब्राहम्ण को विवाह के लिए यदि कोई अपनी कन्या दे तो वह ‘दैव’ विवाह होता है।
8. ब्राह्म: कन्या का पिता युवक को आमन्त्रित कर उससे कुछ भी स्वीकार किए बगैर धार्मिक एवं पारम्परिक रीति-रिवाजों के अनुसार अपनी कन्या का विवाह उससे कर दे तो वह ‘ब्राह्म’ विवाह कहलाता है।

जो हो जाए, सो थोड़ा
आजकल ‘गांधर्व’ और ‘ब्राह्म’ विवाह ही अधिक प्रचलित हैं। वैसे तो आजकल कलयुग है। जो हो जाए, सो थोड़ा। आज की युवा पीढ़ी शारीरिक आकर्षण को ही अधिक महत्व देती है। आधुनिक विचारों से उसे भरपूर प्रोत्साहन मिलता है। लिव-इन-रिलेशनशिप के मामलों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। शारीरिक आकर्षण समाप्त होते ही परस्पर संबंधों में कटुता आ जाती है और उसके परिणाम कहीं कहीं बड़े घातक होते हैं। यदि संबंध दो अन्तरजातीय या दो भिन्न धर्मों के लड़के-लड़कियों के बीच हो तो परिणाम और अधिक घातक हो सकते हैं। हालात बिगडऩे पर लड़की और उसके परिवार वालों को अधिक कष्ट झेलना पड़ता है। इन संबंधों से यदि दोनों की सन्तान हो तो, अधिसंख्य मामलों में लड़की और उसके परिवारवाले ही समाज के अधिक कोपभाजन बनते हैं। आर्थिक हालात लड़की को मजबूर कर देते हैं कि वह इन संबंधों से दुनिया में आए उस जीव को कहीं कूड़े के ढेर पर छोड़ दे या फिर आत्महत्या जैसा अति क्रूर कदम उठा ले।

युवा पीढ़ी को संयमित करें
हालांकि नारी सशक्तिकरण जैसे अनेक कदमों और महिलाओं के हित में बने कानूनों ने नारी में आत्मविश्वास भरने की कोशिश की है, किसी हद तक इसमें सफलता भी मिली है, लेकिन इस दिशा में युवा पीढ़ी को अधिक जागरूक करने और संयमित बनाने की जरूरत है। नहीं तो, प्रतिदिन होती बलात्कार की घटनाओं में लगातार वृद्धि और मासूम लड़कियों पर आए दिन तेजाब फेंके जाने की घटनाओं का बढ़ता सिलसिला कहीं जा कर रूक सकता है, इस पर सभी को संदेह है।

हमें रूढि़वादिता से परहेज जरूर करना चाहिए लेकिन धार्मिक और सामाजिक नियमों की तरफ पूरी तरह आंख भी बंद करना उचित नहीं है। समाज और पारिवारिक प्रणाली में बने ‘चेक एंड बैलेंसिज’ को रूढि़वादिता नहीं माना जाना चाहिए। समाज और धर्म के तथाकथित ठेकेदारों, अमानवीय, अव्यावहारिक और अत्याचारपूर्ण फैसले और फतवे देने वाली पंचायतों और खापों को भी मनमानी नहीं करने दी जानी चाहिए, लेकिन समाज और परिवार के हित में बने धार्मिक और सामाजिक नियमों की अनदेखी भी नहीं की जानी चाहिए।

तुष्टिकरण ने किया अहित
राजनीतिक दलों के वोटबैंक की ओर उनका अंधा रूझान भारतीय लोकतन्त्र की सबसे बड़ी कमजोरी बन गई। राजनीतिक दलों की तुष्टिकरण के इसी अंधे रूझान ने धार्मिक मामलों में ‘किसी को पूरी छूट दे दी है, तो किसी पर लगा दी हैं बंदिशें।’ इसी ने देश की जनसांख्यिकी के ग्राफ को बिगाड़ दिया है।

देश में सभी राजनीतिक दल सत्ता के समीकरणों के हिसाब से अपने फैसले लेते हैं और उसी के अनुसार कदम उठाते हैं। इससे उनका कोई मतलब नहीं होता कि अपने वोट बैंक विशेष से जुड़े समूह के अहम की तुष्टि से समाज के अन्य वर्गों पर क्या असर होगा? एक धर्म के निजी क्षेत्र में प्रवेश कर उस पर अंकुश लगा कर देश के जनसांख्यिकी नक्शे पर कितना असर डाल दिया है, उससे किसी भी राजनीतिक दल का कोई सरोकार नहीं दिखता। अगले पचास साल में जनसंख्या की दृष्टि से जो धर्म-समूह पीछे था, वह तेजी से आगे बढ़ जाएगा और जो आगे था, वह पीछे हो जाएगा। जनसांख्यिकी होड़ एक अन्तराष्ट्रीय साजिश-सी दिखाई देती है, जिसमें आगे बढऩे की इस प्रवृति में देश के राजनीतिक हालात भी काफी प्रेरक बन रहे हैं। प्रकृति के खिलाफ चल रही इस होड़ के परिणाम क्या होंगे, यह तो समय बताएगा, लेकिन दिन-प्रतिदिन चौड़ी होती जा रही धार्मिक सौहार्द की खाई तो अभी से साफ दिखाई दे रही है।

श्रीकान्त शर्मा

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