ब्रेकिंग न्यूज़ 

साम वेद का रहस्य: ऊॅँ गाय का रंभाना

तिस्रो वाच उदीरते गावो मिमन्ति धेनव: ।
हरिरेति कनिकऊदत् ।। (एसवी. 471)

थनों में दूध भर जाने पर, गाय अपने सामान्य ढंग से रंभाती है: ‘हम्बा’। गाय की वह आवाज बछड़े के कान में पड़ती है, जो तुरन्त ‘मा’,’मा’ चिल्लाता हुआ दौड़ा चला आता है और अपना मुंह थनों पर रगडऩे लगता है। पूरा दिन, गाय माता दूर रही है। जैसे ही आकाश में सूर्य ढलने लगता है, बछड़े का भाग्य भी तेज होता जाता है। वह तेज गति से दौड़ता हुआ आता है और अपनी मां के निकट आ कर खड़ा हो जाता है और ओम…(जिसे अंग्रेजी में ओ एम….ए यू एम कह सकते हैं) का उच्चारण करता है। अंग्रेजी के ‘ए यू एम’ के ‘ए’ की आवाज जब वह मुंह खोलता है और उसी के साथ ‘यू’ की आवाज आती है। अन्त में जब उसके होठ बंद होते हैं तो ‘एम’ के उच्चारण में मिल जाती है।

ये पंक्तियां कहती हैं: विश्व में सभी ध्वनियां केवल ‘ओम’ शब्दांश की प्रतिध्वनियां हैं। गरजते बादलों की आवाज में नि:शब्द रात्रि या तारों भरा आकाश, हर स्थान पर ‘ओम’ की ध्वनि प्रतिध्वनित होती है। चेतन और अचेतन, सभी ‘ओम’ की ध्वनि के अमृत से गतिवान हो जाते हैं। ‘ओंकार’ की अश्राव्य ध्वनि सृजन की प्रत्येक गतिविधि में छिपी है।

नवजात शिशु के होठों से निकलने वाले प्रथम शब्द की ध्वनि का उद्भव ‘ओम’ है। बिल्कुल सामान्य, लेकिन फिर भी कितना गहरा और अर्थपूर्ण है। ‘ए’ ईश्वर के लिए है, ‘यू’ आत्मा के लिए और ‘एम’ भौतिकता के लिए है। बछड़े की भूख दूध के लिए नहीं है, बल्कि ‘ओम’ की ध्वनि के लिए है। उस विचित्र ध्वनि के लिए वह बेचैन और आकुल हो जाता है।

मुनिश्री तरुणसागर
संत को गाय जैसा होना चाहिए,
हाथी जैसा नहीं।
गाय घास खाती है, इसके बावजूद घी-दूध,
मक्खन और छाछ देती है।
गाय का गोबर भी काम आता है।
जबकि हाथी गन्ना, गुड़ और माल खाता है
तो भी समाज को कुछ नहीं देता।
संत-मुनि को घास अर्थात् हल्का और सात्विक
भोजन करना चाहिए।
मतलब संत-मुनि वे हैं, जो समाज से अंजुलि-भर
लेते हैं और दरिया भर लौटा देते हैं।

где брать изображения для сайтапродвижение yandex

Leave a Reply

Your email address will not be published.