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‘बार-गर्ल’ बनाम भारतीय नारी

भारत के बहुआयामी प्रजातंत्र में प्रतिबंध, खासकर सरकारी प्रतिबंध ठीक से लागू नहीं हो पाते। इस नंगी सच्चाई का एक उदाहरण महाराष्ट्र में डांस बार पर सुप्रीम कोर्ट का हाल में आया फैसला है। बार डांसरों का कहना था कि पुलिस का आदेश पक्षपातपूर्ण है और उनकी जीविका के अधिकार पर आघात करता है। उन्होंने यह भी कहा कि बार में नृत्य करने के अलावा उन्हें आजीविका का कोई और काम नहीं आता। महाराष्ट्र सरकार ने 2005 में बीयर बार और रेस्तराओं में नृत्य करने पर प्रतिबंध लगा दिया था। बंबई हाईकोर्ट ने 2006 में एक आदेश देकर महाराष्ट्र सरकार के फैसले को खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अल्तमश कबीर और न्यायाधीश एस. एस. निज्जर की खंडपीठ ने बंबई हाईकोर्ट के 2006 के आदेश को कायम रखा और राज्य सरकार को दिए गए स्थगन आदेश को हटा दिया। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देकर यह स्थगन आदेश प्राप्त किया था। महाराष्ट्र सरकार ने विधेयक में संशोधन करके प्रतिबंध का आदेश दिया था, वह न्यायपालिका के सामने अपने पक्ष को ठीक से रख नहीं पाई।

2005 में महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर. आर. पाटिल ने विधान परिषद में विचार विमर्श के बाद राज्य भर में डांस बारों पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया था। जिसके परिणामस्वरूप 1350 बार बंद हो गए थे। इन बारों में 75 हजार बार बालाएं काम करती थीं। राज्य सरकार ने एक अध्यादेश जारी करके प्रतिबंध लागू करने की कोशिश की, लेकिन राज्यपाल ने उसे यह कहकर वापस कर दिया कि सरकार इस मामले में विधानसभा में बिल ला सकती है। जुलाई 2005 में मुंबई पुलिस (संशोधन) बिल मानसून सत्र के दौरान रखा गया और दोनों सदनों में निर्विरोध पारित हो गया। तत्कालिन राज्यपाल एस. एम. कृष्णा ने बिल को स्वीकृति दे दी।
विधेयक पर बहस के दौरान सरकार का ध्यान भारी संख्या में गैर-कानूनी डांस बारों के खुलने और उनके समाज पर दुष्प्रभाव तथा नर्तकियों के परिवारों की बर्बादी की ओर खींचा गया था। सत्तारूढ़ और विरोधी दोनों पक्षों के सदस्यों ने यह स्वीकार किया था कि डांस बार अपराधियों के मिलने-जुलने और अनैतिक कार्यों में लगी लड़कियों के अड्डे हैं। देश भर के अनेक महिला संगठनों ने इस मनमाने प्रतिबंध का विरोध किया था और आरोप लगाया था कि डांस बारों पर रोक लगने से लड़कियां ऐसे काम करने को विवश हो जाएंगी, जहां अधिक यौन शोषण है। यह बात किसी हद तक सही थी, क्योंकि हाल के वर्षों में यह देखा गया है कि इनमें से अनेक बार बालाएं विदेश जाकर
खाड़ी देशों के बारों में काम करने लगीं। अनेक वेश्यावृत्ति करने लगीं या अभी तक गैर कानूनी धंधों में लगी हैं।प्रतिबंध लागू होने के फौरन बाद होटल एवं रेस्तरां संघ ने बंबई हाईकोर्ट में विधेयक को चुनौती दी। डांस बार बाला संघ की अध्यक्षा वर्षा काले ने भी हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने नर्तकियों के लिए पुनर्वास की कोई योजना नहीं बनाई है। प्रतिबंध के कारण बार बालाएं बेरोजगारी में वेश्यावृत्ति अपनाने को विवश हो जाएंगी। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा लागू प्रतिबंध को हटा दिया और महाराष्ट्र सरकार पर दबाव डाला कि वह सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करे।

इन वर्षों में आबकारी विभाग ने कानून की परवाह किए बिना खुले हाथों फटाफट लाइसेंस बांटे, जिससे डांस बारों की बाढ़ आ गई। बार मालिकों के दावों के अनुसार महाराष्ट्र सरकार को इन बारों से प्रति वर्ष 1500 करोड़ रूपये की अधिकृत आय थी। इन बारों के ज्यादातर मालिक पुलिसवाले और राजनीतिज्ञ हैं, जिन्हें अंडरवल्र्ड का संरक्षण प्राप्त है।

हम बार बालाओं पर नैतिक निर्णय नहीं थोप सकते, लेकिन उसी समय हम बकवास संगीत वीडियो, कामुक विज्ञापनों (जिनमें पोर्न स्टार से अभिनेत्री बनी सनी लिओन के कंडोम और जातक इत्र वाले ऐड शामिल हैं) और सारे चैनलों पर हर समय भौंड़े गीत प्रसारित करने की छूट देते हैं। भारतीय समाज के पाखंड, दोगलेपन और दोहरे चरित्र को खाप पंचायतों, अंतरजातीय विवाह करने पर अपहरण और हत्याकांडों, आवेश में किए अपराधों और तेजी से बढ़ रही बलात्कार की घटनाओं में देखा जा सकता है। ये सब सहन करते हुए भी हम असहिष्णु हैं।

गूगल द्वारा हाल में किए गए एक सर्वे के अनुसार, वेब पर अश्लील और वयस्क सामग्री की मांग करने वाले देशों में भारत सबसे उपर है। जिस देश में हर फिल्म में ‘आइटम नंबर’ जरूरी है, संगीत या भांगड़ा के बिना शादी पूर्ण नहीं मानी जाती है, वहां शीला, मुन्नी और जलेबीबाई की नकल में मटकना जरूरी हो जाता है। गुडग़ांव के बार और डिस्को में पिछले दिनों 100 किशोर नशे में धुत्त मिले, लेकिन यह दूसरा उदाहरण है।

भारतीय अदालतें लिव-इन-रिलेशनशिप, अकेली मां, पितृत्व के मुकदमे, रजामंदी की आयु आदि पर हाल में फैसले देने के कारण खबरों में है। वो दिन दूर नहीं है, जब एक ही लिंग में विवाह और क्रिकेट में सट्टा लगाने को कानूनी मान्यता दे दी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट का फैसला किसी भी राजनीतिक दल को हजम नहीं हुआ है। फैसला आने के कुछ घंटों बाद ही महाराष्ट्र सरकार ने यह साफ कर दिया था कि वह समीक्षा याचिका दायर करेगी। तब तक तरन्नुम, जूली, रोजी और स्वीटी चैन की सांस लें सकती हैं। उनके दिन फिर गए हैं।

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