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शिक्षा और शिक्षकों में संस्कार जरूरी: अशोक पाण्डे

श्री अशोक पाण्डे को हाल ही में सीबीएसई राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें यह पुरस्कार माननीय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति भवन में भेंट किया। उदय इंडिया से विशेष बातचीत के दौरान एल्कॉन इंटरनेशनल स्कूल के प्रधानाचार्य अशोक पाण्डे ने कहा की निजी क्षेत्र शिक्षा के विस्तार में महत्वपूर्ण भुमिका निभाई है। उदय इंडिया संवाददाता दिब्याश्री सतपथी से हुई बातचीत के मुख्य अंश… राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने के बाद आप कैसा महसूस कर रहे हैं?
राष्ट्रीय पुरस्कार से एक विशेष सम्मान का दर्जा तो मिला ही है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि अब हमारी जिम्मेदारी और बढ़ गई है। यह सम्मान हमारे कार्य को पहचान देने के लिए मिला है, लेकिन इसके साथ-साथ सम्मान की मर्यादा बनाए रखने के लिए भी आगे सोचना पड़ता है। यह सम्मान व्यक्तिगत रुप से मेरे लिए है क्योंकि यह मुझे इस संस्था के प्रधानाध्यापक के रुप में और शिक्षा क्षेत्र में मेरे 30 वर्ष के योगदान के लिए मिला है। यह सम्मान इस संस्था और इसके लोगों के सम्मिलित प्रयास के कारण मिला है।

भारत की शिक्षा प्रणाली पर आपकी क्या राय है? क्या शिक्षा में कोई गुणात्मक विकास हुआ है या सिर्फ पद्धति का ही विकास हुआ है?
आज से 30 वर्ष पहले एक शिक्षक और छात्र के बीच में संबंधों की जो प्रगाड़ता थी, उसमें कहीं न कहीं कमी आई है। पहले शिक्षक ही ज्ञान पाने के एक मात्र माध्यम या इकलौते स्रोत होते थे, परंतु अब ऐसा नहीं है। आज के समय में ज्ञान पाने के कई माध्यम हैं, जिसके कारण अब उनका वह स्थान नहीं रहा, जो पहले था। जिसके कारण अब शिक्षकों की जिम्मेदारी बढ़ गईं है। आज के समय में ज्ञान के कई सारे स्रोत हैं, परंतु शिक्षक की जिम्मेदारी है कि वह हर बच्चे तक इस ज्ञान को पहुंचाए। उनके जीवन को संवारने के लिए शिक्षकों को ज्यादा तैयारी करने की जरुरत होती है। डॉ ज़ाकिर हुसैन ने कहा है : ‘जन्म से मृत्यु तक, जीवन सीखने की एक प्रक्रिया है’ और इन सब से सीखाने वाले को ही शिक्षक कहते हैं।

आज के समय में शिक्षा के साथ-साथ शिक्षा पद्धति का व्यावसायीकरण हो गया है । इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है ?
हर बच्चे को शिक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी राज्य की है, पर राज्य अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से नहीं कर पाया है, जिसके कारण आज की तारीख में 35 प्रतिशत शिक्षा प्राइवेट हाथों में आ गई है। धीरे-धीरे यह बढ़ती ही जा रही है। जब प्राइवेट हाथों में पूर्णरूप से आ जाएगी और जब इस पर कोई नियंत्रण नहीं होगा तो इससे शिक्षा का व्यवसायीकरण होना निश्चित है। सीबीएसई का कार्य सिर्फ पाठ्यक्रम तैयार करना और परीक्षाएं आयोजित करना है। सीबीएसई सरकार नहीं है, वह सिर्फ एक ‘एग्जामिनिंग बॉडी’ है। सीबीएसई का काम नियम बनाना नहीं है, यह काम सरकार का है जिसमें वह असफल रही है। हमारे समय में 99 प्रतिशत स्कूल सरकारी हुआ करते थे और शिक्षा का व्यावसायीकरण नहीं हुआ था।

शिक्षा का निजीकरण देश के लिए वरदान है या अभिशाप ?
जब सरकारी क्षेत्र असफल होता है, तो प्राइवेट क्षेत्र उसकी जगह लेना शुरू कर देता है। हम इस बात को टाल नहीं सकते कि किसी न किसी को तो शिक्षा प्रदान करनी पड़ेगी। लोगों को निरक्षर नहीं रख सकते। जिस तेजी से निजी क्षेत्र सरकारी क्षेत्र की जगह ले रहा है, मेरे हिसाब से सरकार को अब अपने कदम आगे बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए, जिससे शिक्षा में हो रहे व्यवसायीकरण को नियंत्रण में रखा जा सके ।

आज के समय में शिक्षकों को कैसा प्रशिक्षण मिल रहा है?
मानव संसाधन मंत्रालय के अनुसार, आज की तारीख में दस लाख शिक्षक अब भी अप्रशिक्षित हैं। अब भी हमें दस लाख शिक्षकों की और जरूरत है। हमारे देश में बीएड के लिए कई सारे कॉलेज हैं, परंतु उनमें से कुछ ही गुणात्मक प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। यही अप्रशिक्षण का मुख्य कारण है। अत: सरकार को इस मुद्दे पर विशेष ध्यान देना चाहिए, जिससे शिक्षा में उन्नति हो सके।

निजी स्कूलों में शिक्षकों की चयन प्रक्रिया क्या है?
आज के समय में कोई भी शिक्षक नहीं बनना चाहता। माना जाता है कि जिन्हें कोई और नौकरी नहीं मिलती, वे शिक्षक बन जाते हैं। जहां तक निजी स्कूलों की बात है, तो मैं दावे से कह सकता हूं कि हमें अपनी पसंद का शिक्षक नहीं मिल पाता। इससे हमारे पास एक ही तरीका बचता है कि हमारे पास जो है, हम उसी से अच्छा निकालें और अपना काम नियमित रूप से संपन्न करें। हम शिक्षकों को नौकरी के दौरान निजी प्रशिक्षण देते हैं, जिससे उनका व्यावसायिक रूप से विकास हो सके। हर दस साल में पीढ़ी बदल जाती है, जिसके साथ-साथ शिक्षा प्रणाली में भी बदलाव आते हैं। इसके कारण शिक्षकों का प्रशिक्षण बहुत जरूरी है।

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