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चित्रा मुद्गल के आत्मवृत

पहली रचना और किताब किसी लेखक के जीवन में पहली मुहब्बत-सी होती है, जिसे वह जीवन भर सीने से लगाए रहता है। उसके प्रकाशन के रोमांच की तुलना सिर्फ और सिर्फ पहली मुहब्बत से इसीलिए की जाती है, क्योंकि वह क्षण किसी भी व्यक्ति के लिए अद्भुत और अभूतपूर्व ही नहीं, जीवन की दिशा बदल देने वाला भी होता है। किसी लेखक के लिए उस पल का सुख और सुकून शब्दातीत होता है। चित्रा मुद्गल ने अपने उस पल के रोमांच को शब्द देने की कोशिश ‘पाटी’ में की है! हाल ही में चित्रा मुद्ïगल को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के चार लाख रुपये के अवंतीबाई सम्मान से विभूषित किए जाने की घोषणा हुई है।

युवतर और शहरी पाठक विस्मय से पूछ सकते हैं-‘पाटी’ माने क्या! ग्रामीण परिवेश से आए लोग लेकिन इस शब्द के रोमांच को भूले नहीं होंगे, जब पिता के साथ पाटी और बस्ता लेकर वे पहली बार स्कूल गए होंगे। लकड़ी की पाटी (पट्टी, जिसे शहरी बच्चे स्लेट के रूप में हासिल करते हैं) और बुदिक्का अब उन्हें कहां हासिल होता है। चित्रा मुद्गल को वह सब याद है, जस का तस, चेन्नै में जन्म लेने और मुंबई में पलने-पुसने के बावजूद। तभी तो सृजन से जुड़े आत्मकथात्मक संस्मरणों की किताब को उन्होंने ‘पाटी’ नाम दिया, जिसे पढ़कर उनके लेखकीय जीवन में दाखिल होने वाले छोटे-बड़े नाम और घटनाक्रम सहसा सामने आ खड़े हुए।

‘पाटी’ के पहले ही लेख ‘पहली मुहब्बत-सी पहली किताब’ में चित्रा मुद्गल किताबों के प्रति अपनी दीवानगी का इजहार करते हुए लिखती हैं, ‘चारों ओर किताबों से घिरी चौंधियाई-सी कुछ देर कुछेक किताबों के समक्ष ठिठक कर गतिशील होती हूं। किताबों की परिक्रमा करते हुए उन्हं- हाथ में लेकर सहलाते-छूते, उनके शीर्षक से लेकर फ्लैप पर दी गई टिप्पणियों तक को पढ़ते हुए मन ही मन पर्स के भीतरी कोनों को टटोलती हिसाब लगाती रहती हूं कि जिन पुस्तकों को अपने अध्ययन कक्ष की अमानत बना लेने का सपना काफी पहले से जेहन में संजोए हुए हूं, उनकी कीमत चुकाने लायक पैसे भी हैं मेरे पास।’

चित्रा मुद्ïगल के प्रथम कथा संग्रह ‘जहर ठहरा हुआ’ का प्रकाशन 1980 में हुआ था। दिल्ली के अनन्य प्रकाशन के उमेश मेहता ने ‘सारिका’ में प्रकाशित कहानी ‘बावजूद इसके’ पढ़कर उन्हें पत्र लिखा था कि कहानी ने उन्हें गहरे तक छुआ है। वे कहानी संग्रह वे छापना चाहते हैं। चित्रा जी लिखती हैं कि उमेश जी का पत्र पढ़कर पटाखों वाली नाचती चरखी की भांति सितारे फूट-फूटकर मेरे चारों ओर थिरकने लगे थे।

तब चित्रा मुद्ïगल ने अपने पति से कहा था, ‘किसी बड़े प्रकाशक का पत्र आना चाहिए था मेरे पास। नहीं आया तो न सही। पहली किताब मेरी वहीं से छपेगी, जहां से उसके प्रकाशन की मांग हुई है। पुस्तक का भी कोई स्वाभिमान होता है। मैंने तय कर लिया है कि ‘अनन्य प्रकाशन’ को ही पांडुलिपि दी जाएगी।’

अपने पहले कहानी संग्रह के बारे में उन्होंने लिखा है कि ‘तीस वर्ष हो गए ‘जहर ठहरा हुआ’ को प्रकाशित हुए, लेकिन किताबों के रैक के जिस हिस्से में मेरी किताबें कतार में लगी हुई हैं, जब भी जरूरत-बेजरूरत उनके निकट जाना होता है, यकीन कीजिए ‘जहर ठहरा हुआ’ को निकालकर बड़ी देर तक उसे उलटते-पुलटते छूते हुए मयाती रहती हूं। उसके भीतर के पन्ने मलिन हो रहे हैं। समय की थपकी से बुढ़ाते। कहते हैं कि बूढ़ी किताबें अधिक सयानी होती हैं। पकती दुधहड़ी-सी।’ दुधहड़ी में पकते दूध की भांति क्या सयानी होती किताबों में भी रचनाएं समय की (धीमी-धीमी) आंच के साथ पकती रहती हैं! इस तरह के नौ आत्मकथात्मक लेख ‘पाटी’ में संग्रहीत हैं। कुल मिलाकर ‘पाटी’ एक ऐसी किताब है, जिससे चित्रा मुद्गल के जीवन और लेखन के अनेक बंद दरवाजे अनायास खुलते चले जाते हैं, धीरे-धीरे। और उनके साथ खुलते जाते हैं अनेक साहित्यिक संदर्भ।

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