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अपने ही जाल में कांग्रेस

पहले संसद में उठे मुद्दे अखबारों की सुर्खियां बनते थे। आज स्थिति उलट है। लोकसभा और राज्यसभा में ऐसे सांसदों की भरमार है जो अपनी पारिवारिक राजनितिक पृष्ठभूमि, बाहुबल या पैसे की ताकत से वहां पहुंचे हैं। उन्हें न तो जनता के दुख-दर्द से कुछ लेना-देना है और न ही जमीनी हकीकत का पता है।

विपक्षी दलों पर संसद की कार्यवाही में बाधा डालने का सदा आरोप लगाने वाले कांग्रेसी भूल जाते हैं कि इस बीमारी के जनक भी वही हैं। सन् 1989 में वी.पी.सिंह के नेतृत्व में पहली बार केंद्र में गठबन्धन की सरकार बनी थी। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रचंड बहुमत से सत्ता में आए राजीव गांधी को बोफोर्स कांड के कारण कुर्सी खोनी पड़ी थी। तब कांग्रेस ने अपने सांसदों की एक हल्ला बोल ब्रिगेड बनाई थी, जिसका काम किसी न किसी बहाने शोर-गुल मचा कर संसद की कार्यवाही ठप कराना ही था। कुछ बरस पहले जब कांग्रेस सत्ता से बाहर थी, तब वाजपेयी सरकार को घेरने के लिए उसने संसद में हर हथकंडा अपनाया था। सन् 2001 में तहलका कांड को लेकर कांग्रेस ने 17 दिन तक संसद को ठप रखा था। लोकसभा और राज्यसभा में उसके सांसदों हंगामा किए रहते। तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीज को तो संसद में बोलने और सफाई देने की अनुमति तक नहीं दी गई थी।

कांग्रेस के बोये कांटे आज उसके गले की फांस बन गए हैं। हाल ही में समाप्त हुए मानसून सत्र में आंध्र प्रदेश के कांग्रेसी सांसदों ने निरंतर कई दिन तक लोकसभा की कार्यवाही में बाधा डाली। तेलंगाना राज्य बनाने की घोषणा से नाराज इन सांसदों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले रखा। खाद्य सुरक्षा और भूमि अधिग्रहण बिल पारित कराने के लिए बेताब सोनिया गांधी को मजबूरन अपने बागी सांसदों को सदन से निलंबित करने का फरमान जारी करना पड़ा। संसद के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि सत्तारूढ़ दल ने अपनी ही पार्टी के सांसदों को निलंबित कराया।

संसद को चलाने की मुख्य जिम्मेदारी सत्ता पक्ष की होती है, लेकिन अनुभव बताता है कि अब तो कई बार सत्ता पक्ष के इशारे पर भी हंगामा होता है। राज्यसभा में लोकपाल बिल पर बहस के दौरान संप्रग के सहयोगी दल के सांसदों ने ही हंगामा किया था जिस कारण यह बिल आज तक पारित नहीं हो पाया। वैसे सरकार जो बिल पारित कराने की इच्छुक होती है उसे हर हाल में पास करा लेती है। इसके लिए वह संसद का संयुक्त अधिवेशन बुलाने या विरोधी सांसदों का वोट ‘मैनेज’ तक करने का काम कर लेती है।

दुख की बात है कि आज सुरक्षा और विदेश नीति जैसे राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर भी सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्षी दलों में गहरा मतभेद है। इस स्थिति के लिए भी सरकार ही जिम्मेदार है। महत्वपूर्ण मुद्दों पर विपक्षी दलों को विशवास में लेकर आम सहमती बनाने की संसदीय परंपरा को उसने तिलांजलि दे दी है। सरकार हर बात केवल बहुमत के बल पर तय करना चाहती है। विपक्ष की तर्कसंगत मांग सुनने के लिए भी वह राजी नहीं है। इसी हठधर्मिता के कारण ही संसद की कार्यवाही शांतिपूर्ण ढंग से चलना कठिन हो गया है। अब भी संसद में वे बिल ही पारित हुए, जो चुनाव की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण हैं। देश की जर्जर अर्थव्यवस्था में प्राण फूंकने तथा भ्रष्टाचार से लडऩे के लिए जरूरी दर्जनों बिल अब तक संसद की मंजूरी की बाट जोह रहे हैं।

इस सच से कोई इंकार नहीं कर सकता कि अब हमारी संसद जन-हित से जुड़े मुद्दों पर बहस के लिए नहीं, हंगामे और शोर-शराबे के लिए जानी जाती है। इसी कारण कानून बनाने का कम निरंतर पिछड़ता जा रहा है। ग्यारहवीं लोकसभा का 5.8 फीसदी वक्त हंगामों की भेंट चढ़ गया था। यह आंकड़ा बारहवीं लोकसभा में बढ़कर 10.66, 13वीं में 22.4 तथा 14वीं में लगभग 40 प्रतिशत हो गया। वर्तमान लोकसभा का रिकॉर्ड भी कोई बेहतर नहीं है। यह हालत तब है जब संसद की हर एक मिनट की कार्यवाही पर लगभग ढाई लाख रुपए खर्च होते हैं। मतलब यह कि एक दिन हंगामे की भेंट चढ़ जाने का अर्थ है लगभग 9 करोड़ रुपए का नुकसान। यह नुकसान आम आदमी का है, क्योंकि उससे वसूले टैक्स के बल पर ही संसद चलती है। सांसदों के गैर जिम्मेदाराना रवैये को देख कर ही उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश वी.आर. कृष्णन ने कहा था कि जनता की खून-पसीने की कमाई को सांसद बड़ी बेदर्दी से नाली में बहा देते हैं।

दिल्ली में चौबीस बरस पहले पहली बार वी.पी. सिंह के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार बनी थी। इसके साथ ही क्षेत्रीय दलों की ताकत में भारी इजाफा हुआ और उनकी महत्वाकांक्षाओं पर लगाम लगाना केंद्र सरकार के लिए चुनौती बन गया। स्थिति आज भी यह है कि दोनों राष्ट्रीय दलों (कांग्रेस और भाजपा) के सांसदों की संख्या मिला कर जोडऩे पर आंकड़ा तीन सौ के आस-पास सिमट कर रह जाता है। निकट भविष्य में भी किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना नहीं दिखती।

मंडल आयोग लागू होने तथा खुली अर्थव्यवस्था की राह पकडऩे के बाद संसद का चरित्र तेजी से बदला है। अब वह ‘भद्रलोक’ का बहस स्थल न रहकर विभिन्न जातियों, राजनितिक परिवारों और कॉरपोरेट लाबी का सभागार बन गया। पहले संसद में जनता के बीच बरसों काम करने वाले नेता आते थे। उन्हें जड़ तक हर मुद्दे की पहचान होती थी। इसलिए संसद में गंभीर और सार्थक बहस होती थीं। संसद में उठे मुद्दे अखबारों की सुर्खियां बनते थे। आज स्थिति उलट है। लोकसभा और राज्यसभा में ऐसे सांसदों की भरमार है जो अपनी पारिवारिक राजनितिक पृष्ठभूमि, बाहुबल या पैसे की ताकत से वहां पहुंचे हैं। उन्हें न तो जनता के दुख-दर्द से कुछ लेना-देना है और न ही जमीनी हकीकत का पता है। इसीलिए अखबारों में छपी खबरों पर संसद में हंगामा होता है। डिजाइनर कपड़ों और महंगी गाडिय़ों के शौकीन सांसद जन-सेवा नहीं, अपना हित साधने में व्यस्त रहते हैं। उनके पास बोलने के लिए मुद्दे नहीं होते। ज्यादातर वही हंगामे का सहारा लेते हैं। यह बदलाव हमारी संसद में हंगामों का प्रमुख कारण है।

एक कारण और है। सन् 1993 से विभिन्न मंत्रालयों के कामकाज की निगरानी के लिए अलग-अलग संसदीय समितियों का गठन किया जाने लगा है। इन समितियों में विभिन्न दलों के सांसद होते हैं, जो संबंधित मंत्रालय से जुड़े मुद्दों की गहराई से पड़ताल कर अपनी सिफारिश देते हैं। इन समितियों के कारण संसद का कामकाज हल्का हो गया है। होना तो यह चाहिए कि समितियों की रिपोर्ट पर लोकसभा और राज्यसभा में विस्तृत चर्चा के बाद निर्णय हो, लेकिन हंगामे के कारण अक्सर इन समितियों की रिपोर्ट प्रकाश में नहीं आती। कई बार सरकार इन समितियों की सिफारिशों की अनदेखी कर अपनी मनमर्जी थोप देती है। ऐसे में पूरी संसदीय प्रक्रिया पर ऊंगली उठाने वालों को मसाला मिल जाता है।

अटल बिहारी वाजपेयी के शासन काल में (सन् 2001) सभी विधानसभा अध्यक्षों, मुख्यमंत्रियों, लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति का एक सम्मेलन हुआ था। उसमें सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया गया। इस प्रस्ताव के अनुसार सदन की कार्यवाही में बाधा डालने वाले सदस्य को स्वत: निलंबित किए जाने का प्रावधान था। इस प्रस्ताव को पारित हुए एक दशक से ज्यादा समय बीत गया है, लेकिन अब तक इस पर अमल नहीं हुआ। यह देख कर तो माना जाएगा कि संसद या विधानसभा की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने में अब अधिसंख्य दलों की रुचि नहीं है।

हमारे संविधान निर्माताओं ने ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली से प्रभावित होकर ही लोकसभा और राज्यसभा के गठन का प्रस्ताव रखा था। ब्रिटिश संसद के करीब तीन सौ वर्ष के इतिहास में हंगामे के कारण कार्यवाही बाधित होने की घटना ढूंढना कठिन है। दूसरी ओर हमारी संसद का ऐसा कोई सत्र खोजना मुश्किल है जो हंगामे की भेंट न चढ़ा हो।

 

धर्मेंद्रपाल सिंह

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