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खोखली नीतियों ने कर दी अर्थव्यवस्था बरबाद

तेल और सोने की बात तो दूर जब रेत, गिलास जैसी मामूली चीजें भी आयात की जा रही हों तो रुपए पर संकट क्यों नहीं आएगा। कोयला तो भारत में बहुत है। फिर भी उसका धड़ाधड़ आयात किया जा रहा है। दरअसल लकवाग्रस्त केंद्र सरकार ही इस देश का असली संकट है।

सरकार का निर्णय न लेना ही केवल देश की अर्थव्यवस्था को गड्ढे में डालने की असली वजह है, अन्यथा ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो भारत में नहीं बन सकती। भारत में उपलब्ध वस्तुओं का भी आयात किया जाएगा, तो विदेशी मुद्रा बाहर जाएगी ही। शुरू से यदि समस्या पर गौर करें तो रुपए के गिरने की वजह जगजाहिर है। तेल की बात अलग है, जिसके आयात पर सबसे अधिक पैसा बाहर जाता है। दूसरे नंबर पर सोना है। वह भी आयात होता है। उस मद में भी सबसे अधिक पैसा जाता है। इसके अतिरिक्त बहुत सारी चीजें हैं, जिनका आयात होता है। लेकिन केंद्र सरकार की सबसे बड़ी नाकामी निर्णय न ले पाना है। किसी भी बारे में कोई निर्णय न लेना। मैं एक छोटा-सा उदाहरण देता हूं। यह उदाहरण सब पर लागू होता है। आज की तारीख में देश कोयले का आयात कर रहा है। कोई यह पूछे कि भारत कोयले का आयात क्यों कर रहा है। कोयला तो भारत में भी बहुत है। भारत अपनी खानों से तो कोयला निकाल नहीं रहा और धड़ाधड़ आयात किया जा रहा है। अपना कोयला खानों में पड़ा है और कोयले का आयात कर विदेशी मुद्रा बाहर भेजी जा रही है। दूसरा है सोना। पूरी दुनिया में 12 से लेकर 16 कैरेट तक का सोना, आभूषणों में प्रयोग होता है। लेकिन भारत में आभूषणों में 22 कैरेट का सोना प्रयोग में लाया जाता है। यदि सरकार को लगता है कि विदेशी मुद्रा का संकट है तो केंद्र सरकार अपनी खानों के बारे में निर्णय ले। खनन किया जाए। सरकार को यह लगे कि विपक्ष उसे खनन नहीं करने देगा, तो जब तक विदेशी मुद्रा का संकट है, तब तक सरकार को यह प्रतिबंध लगा देना चाहिए कि कोई भी आभूषण 12 कैरेट से अधिक का नहीं बनाया जाएगा। इससे सोने की 50 प्रतिशत समस्या खत्म हो जाएगी।

फिर सवाल यह है कि क्या भारत में कोयला नहीं है? लेकिन ऐसा तो नहीं है। वह कोल इंडिया को मजबूत करे। कोल इंडिया की क्षमता बढ़वाए और केवल कोल इंडिया ही कोयला बेचे। कोयले का आयात बंद किया जाना चाहिए। इतने बड़े घाटे को तो केवल कोयला ही भर देगा। अब मैं दूसरी चीजों पर आता हूं। शीशे के क्षेत्र में भारत में जितनी मांग है, उतना गिलास यहां बनता है। लेकिन उसमें सरकार की भी नीति गलत है। गिलास बनाने की जितनी भी वस्तुएं कच्चे माल के तौर पर उपयोग होती हैं, उस कच्चे माल में गैस शामिल है। गैस का आयात किया जा रहा है और विदेशी मुद्रा बाहर जा रही है। गिलास बनाने में प्रयोग होने वाले कच्चे माल में सोडा ऐश भी है, जिसे बनाने की यहां तीन कंपनियां है। एक टाटा है, एक निरमा है और एक जीएससीएल है। तीनों कंपनियां काफी समय से अपना विस्तार करने की कोशिश कर रही हैं। इन कंपनियों को विस्तार करने नहीं दिया गया तो टाटा और निरमा ने बाहर जा कर सोडा ऐश की फैक्टरियां लगा लीं। ये कंपनियां बाहर लगी अपनी इकाइयों से सोडा ऐश भारत में लाती हैं और विदेशी मुद्रा बाहर चली जाती है। यदि इन कंपनियों को भारत में ही विस्तार करने दिया जाता तो विदेशी मुद्रा बाहर नहीं जाती। यानी जिन चीजों की भारत में ही बनाने की क्षमता है, उसे भारत में नहीं बना कर बाहर से आयात किया जा रहा है। गिलास बनाने में 70 प्रतिशत सिलिका का उपयोग किया जाता है। केंद्र सरकार सिलिका की खान ही आवंटित नहीं करती। उसका नतीजा हो रहा है कि सिलिका का भी आयात किया जा रहा है। सारा राजस्थान, उत्तर प्रदेश सिलिका से भरा पड़ा है। लेकिन न जाने किन नीतियों के तहत, हमारी सरकार सिलिका का आयात कर रही है। तुर्की या सऊदी अरब से रेत क्यों खरीदा जा रहा है? जब भारत में सोडा ऐश बन सकती है, तो बाहर से आयात क्यों किया जा रहा है? पिछले 6 साल से व्यवसायी सिलिका की खान के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन इसके आवंटन पर न कोई ध्यान दिया जाता है और न ही कोई निर्णय लिया जाता। परिणाम हुआ कि जो सिलिका 800 रुपए में मिलती थी, अब ढाई हजार रुपए में मिलती है।
इसका सीधा अर्थ है लागत में बढ़ोतरी। वाघा सीमा से केवल 20-30 किलोमीटर की दूरी पर पड़ोसी देश पाकिस्तान में गिलास बनाने की फैक्टरियां लग गईं। इन फैक्टरियों की गिलास बनाने की निर्माण क्षमता तो अधिक है, लेकिन पाकिस्तान में गिलास की मांग कम है। वे 50 प्रतिशत गिलास तो पाकिस्तान में बेच रही हैं और 50 प्रतिशत गिलास भारत में डंप किया जा रहा है। इतना ही नहीं, वे अपने देश में गिलास महंगे दामों में बेच रहे हैं, लेकिन भारत में वही गिलास सस्ता आयात किया जा रहा है। भारत में जिस गिलास की निर्माण लागत 62 रुपए प्रति एमएम आ रही है, उस गिलास को पाकिस्तान से 42 रुपए प्रति एमएम में आयात किया जा रहा है। उस 42 रुपए प्रति एमएम की लागत के आगे भारत के उद्योगपतियों को 52 रुपए प्रति एमएम बेचना पड़ रहा है। यानी भारतीय कंपनियों का नुकसान और पाकिस्तान की कंपनियों का सीधा फायदा। सार्क देशों के बीच व्यापार की संधियों के मुताबिक यदि पाकिस्तान का गिलास भारत में आता है, तो उसे ड्यूटी में छूट मिलती है। इसी प्रकार भारत का गिलास यदि पाकिस्तान में जाए तो भारतीय कंपनियों के माल पर भी ड्यूटी में छूट मिलनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं होता। असल में भारत में पाकिस्तान गिलास भेज सकता है, लेकिन भारत से पाकिस्तान में गिलास नहीं भेजा जा सकता। पाकिस्तान ने भारत की जिन वस्तुओं को निगेटिव सूची में डाला हुआ है, उनमें गिलास भी है। पाकिस्तान से जितना गिलास भारत में आया, भारत में उतना गिलास देश की कंपनियों का कम बिका। इससे भारतीय गिलास कंपनियां घाटे में आ गईं। बैंकों से भारतीय कंपनियों ने ऋण लिया हुआ है। भारतीय कंपनियों के घाटे में आने से बैंकों के ऋण की किश्त चुकनी बंद हो गई। बैंकों को अपने ऋण पर ब्याज भी नहीं मिल रहा। कंपनी कॉर्पोरेट रिस्टक्चरिंग में चली गई। सीडीआर से ब्याज कम हो गया और बैंकों का नुक्सान हो गया। सीडीआर में जाने से पहले बैंकों को उनके ऋण की किश्त और ब्याज नहीं मिला। उससे बैंकों का और अधिक नुकसान हुआ।

भारत सरकार की नीतियों के कारण पाकिस्तान, दुबई, सऊदी अरब की कंपनियों का माल दामों पर यहां डंप हो रहा है। दूसरी ओर भारतीय कंपनियों का माल मिट्टी के भाव बिक रहा है। सरकार के निर्णय न ले पाने के कारण न सिर्फ विदेशी मुद्रा बाहर जा रही है, बल्कि बैंकों का भी नुकसान हो रहा है। भारत सरकार को उन वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए, जिनका आयात आवश्यक नहीं है। गिलास जीवन रक्षक दवा तो है नहीं, जिसके आयात की जरूरत है। वैसे भी भारत में बन रहे गिलास से देश की मांग पूरी हो रही है। भारत में सारी गिलास कम्पनियों को मिला कर 5 हजार करोड़ रुपए का घाटा हो चुका है। इन कंपनियों ने ऋण पीएसयू बैंकों से लिया हुआ है, इसलिए ऋण न देने पर नुकसान सरकार का ही है। सवाल यह है कि जब रेत खरीदने के लिए भी विदेशी मुद्रा दी जा रही हो, ऐसी स्थिति में विदेशी मुद्रा कैसे आएगी? गुजरात मॉडल की तर्ज पर ही केंद्र सरकार को भी कुछ उपाय करना चाहिए। गुजरात में जो भी इंडस्ट्री लगती है, उसका कच्चा माल गुजरात से लिया जाता है। गुजरात में फैक्टरी लगाने के लिए पहले कच्चा माल और इंफ्रास्ट्रक्चर का प्रबंध करना होता है। उसके बाद ही सरकार से वहां फैक्टरी लगाने की इजाजत मिलती है।

आज भारत में हर तरह की वस्तु आयात की जा रही है, चाहे वह लकड़ी का सामान हो या फिर इलेक्ट्रानिक्स। भारत में चल रही केवल गिलास की 5 इंडस्ट्रियां साल में 28 मीलियन डॉलर की लकड़ी आयात करती हैं। सोचने की बात है कि भारत के पूरे उद्योगों के लिए कितनी लकड़ी का आयात किया जाता होगा। सरकार को चाहिए कि पेड़ों को उगाने का प्रयास देश में करनी चाहिए और इसके लिए किसानों को प्रोत्साहित करना चाहिए। इससे किसानों की आमदनी में सुधार के साथ-साथ देश में लकड़ी की जरूरत को भी पूरा किया जा सकेगा। आज पूरे भारत का बाजार चीन के सामान से अटा पड़ा है। चीन की मुद्रा इतनी मजबूत हो है कि यदि चीन उसे फ्री कर दे तो एक डॉलर एक आरएमबी के बराबर हो जाएगा। चीन ने अपनी निर्माण क्षमता बढ़ाकर पूरे विश्व को निर्यात कर, विदेशी मुद्रा कमा रहा है। भारत अपनी निर्माण क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर रहा है। भारत धीरे-धीरे आयात पर निर्भर होता जा रहा है और विदेशी मुद्रा खोता जा रहा है। विदेशी मुद्रा तो केवल उद्योगों से ही आ सकती है। जब तक भारत में निर्यात बढ़ा कर विदेशी मुद्रा अर्जित नहीं होगी, रुपए की हालत बद से बदतर होती जाएगी।

सुभाष त्यागी
(लेखक उद्योगपति हैं)

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