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सीरिया पर हमला, भारत की भी तबाही

सीरिया पर यदि अमेरिकी हमला होता है तो इससे पूरा पश्चिम एशिया आग की लपटों में घिर जाएगा जिसकी तपिश भारत तक पहुंचेगी। भारत सहित बाकी दुनिया में ताजा आर्थिक बदहाली अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियों से तो पैदा हुई ही है लेकिन यदि अमेरिका ने सीरिया पर हमला कर दिया तो भारत की आर्थिक स्थिति को रसातल में भेजने के लिए सबसे अधिक सीरिया पर सैनिक हमला ही जिम्मेदार होगा।

पांच और छह सितंबर को रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में हुई शिखर बैठक का विचारणीय मसला हालांकि दुनिया को आर्थिक मंदी से उबारना था लेकिन सीरिया का मसला ही छाया रहा क्योंकि सीरिया पर यदि अमेरिकी हमला होता है तो इससे पूरा पश्चिम एशिया आग की लपटों में घिर जाएगा जिसकी तपिश भारत तक पहुंचेगी। भारत सहित बाकी दुनिया में ताजा आर्थिक बदहाली अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियों से तो पैदा हुई ही है लेकिन यदि अमेरिका ने सीरिया पर हमला कर दिया तो भारत की आर्थिक स्थिति को रसातल में भेजने के लिए सबसे अधिक सीरिया पर सैनिक हमला ही जिम्मेदार होगा। इसीलिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस शिखर बैठक में भाग लेने के लिए भारत की चिंताएं जाहिर की थीं और ताकतवर देशों से कहा था कि सीरिया पर हमला नहीं करें। सीरिया में गत दो साल से गृहयुद्ध चल रहा है और वहां सीरियाई राष्ट्रपति असद के खिलाफ खड़ी ताकतों को न केवल अमेरिका और यूरोपीय देशों की मदद मिल रही है बल्कि अल कायदा भी सैनिक साजो-सामान और पैसे से हर तरह की मदद कर रहा है। अल कायदा के करीब बीस देशों के जेहादी समर्थक वहां राष्ट्रपति असद के खिलाफ लड़ रहे हैं, जिनमें न केवल अफगानिस्तान, पाकिस्तान और तुर्की जैसे देशों केजिहादी शामिल हैं बल्कि भारत से भी इक्के-दुक्केजिहादी के वहां पहुंचने की रिपोर्टें हैं।

सीरिया में यदि राष्ट्रपति असद की सत्ता गिरती है तो हो सकता है कि अल कायदा समर्थक गुट सत्ता में बैठ जाएं। ऐसी चेतावनियों के बावजूद अमेरिका और यूरोपीय देश क्यों राष्ट्रपति असद की सरकार को गिराने पर तुले हैं यह राजनयिक पर्यवेक्षकों को समझ नहीं आ रहा। लेकिन पिछले दो दशकों का अमेरिका का इतिहास बताता है कि वह कभी चैन से नहीं बैठ सकता। जहां भी वह गृहयुद्ध चलता देखता है वहां वह अपना हाथ डाल देता है। नब्बे के दशक में अमेरिका ने खाड़ी का युद्ध खेला और पिछले दशक के शुरू में अफगानिस्तान में अपनी एक लाख से अधिक सेना भेजी। वहां से वह अपनी जिम्मेदारी निभाए बिना, फारिग भी नहीं हुआ कि अमेरिका ने इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की सत्ता उखाड़ फेंकने के लिये कमर कस ली। निश्चित तौर पर सद्दाम को सत्ता से बेदखल कर उसे सरेआम उनकी बेइज्जती करने में अमेरिका ने कामयाबी पा ली और बगदाद में अपनी एक पिट्ठू सरकार बना दी पर इराक आज भी पहले की तरह जल रहा है। इराक में आए दिन होने वाले आत्मघाती हमलों में बीसियों लोगों के मरने की रिपोर्टें अब आम हो गई हैं। लेकिन इराक केखून से सने अमेरिकी हाथ ने अपनी रक्त पिपासा नहीं छोड़ी और लीबिया में चले गए जहां कर्नल गद्दाफी को मार कर ही चैन लिया। लीबिया में भी जो सरकार आई है वह चैन की नींद नहीं ले रही। लेकिन घोर अमेरिका विरोधी कर्नल गद्दाफी को हटाने के बाद सीरिया के राष्ट्रपति असद बचे थे, जिन्हें अमेरिका अपनी आंखों की किरकिरी मानता था इसलिए शांति का नोबेल पुरस्कार पाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उन्हें भी सत्ताच्युत करने की ठान ली है।

ओबामा के इस फैसले को लेकर अमेरिका में आम राय नहीं है। अमेरिकी कांग्रेस तो विभाजित है ही अमेरिका की तीनोंं सेना की संयुक्त समिति केचैयरमैन ने भी सीरिया पर हमलों के प्रतिकूल नतीजों की चेतावनी दी है। लेकिन राष्ट्रपति ओबामा किसी की नहीं सुन रहे और अमेरिकी कांग्रेस से गुहार कर रहे हैं कि सीरिया पर हमले की अनुमति दी जाए। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन भी अपनी संसद में इस पर मात खा चुके हैं।

निश्चय ही पूरी दुनिया सीरिया पर होने वाले हमलों की वजह से खाड़ी के इलाके में बड़ी लड़ाई छिडऩे की आशंका से घबराई हुई है, क्योंकि खाड़ी के इलाके में यदि कोई बड़ा युद्ध होता है तो वहां से पेट्रोल सप्लाई पर काफी बुरा असर पड़ेगा और पेट्रोल के दाम आसमान छूने लगेंगे। इससे भारत सहित दुनिया के दूसरे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था बुरी तरह तबाह होगी।

सीरिया पर हमले को लेकर पश्चिम एशिया के देश भी बुरी तरह विभाजित हैं। जहां एक ओर सीरिया के राष्ट्रपति असद के समर्थन में ईरान तलवारें भांज रहा है तो सीरियाई विद्रोहियों के समर्थन में सऊदी अरब और कतर जैसे देश खड़े हंै। भारत ने हाल के सालों में खाड़ी के हर देश के साथ अपने मजूबत रिश्ते बनाने की कोशिश की है, क्योंकि इन सभी देशों में लाखों भारतीय रहते हैं। सऊदी अरब में तो करीब 18 लाख भारतीय रहते हैं, जो 25 अरब डालर से भी अधिक सालाना भारत को भेजते हैं। सऊदी अरब के पाकिस्तान के साथ गहरे रिश्ते रहे हैं, लेकिन हाल के सालों में भारत की चतुर कूटनीति की वजह से सऊदी अरब के साथ भारत ने अपने सुरक्षा संबंध भी बना लिए थे। रोचक बात यह है कि सऊदी अरब और ईरान एक दूसरे को फूंटी आंख नहीं देख सकते। सऊदी अरब पर सुन्नी मुसलमानों का शासन है, तो ईरान में शिया मुसलमानों का राज है। पूरे पश्चिम एशिया में सुन्नी और शिया मुसलमानों की आपस में नहीं पटती। इसलिए सीरिया के खिलाफ युद्ध की हालत में भारत की दुविधा होगी कि ईरान के साथ खड़ा दिखे या सऊदी अरब के साथ। दोनों में से एक देश भारत से नाराज होगा। ईरान के साथ भारत की दोस्ती अफगानिस्तान और पश्चिम एशिया में भारत के सामरिक हितों को बढ़ावा देने के नजरिए से काफी अहम मानी जाती है। खासकर 2014 के बाद, जब अमेरिकी फौज अफगानिस्तान से चली जाएगी तब अफगानिस्तान में एक साथी देश के तौर पर भारत को ईरान की जरूरत महसूस होगी।

उधर, सीरिया पर अमेरिकी हमले का यदि भारत ने विरोध किया तो न केवल अमेरिका बल्कि यूरोपीय देश भी यह कहेंगे कि अपनी जनता के खिलाफ रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल करने वाले तानाशाह राष्ट्रपति का भारत ने साथ दिया। सीरिया पर अमेरिकी सैन्य हमले का विरोध करने से अमेरिकी प्रशासन भारत से नाराज होगा।

नैतिक तौर पर भारत को सीरिया पर अमेरिकी हमले का समर्थन करना चाहिए क्योंकि भारत भी जनसंहार के हथियारों के इस्तेमाल का घोर विरोधी है। भारत ने खुद रासायनिक हथियारों के भंडारण और उत्पादन नहीं करने वाली संधि पर हस्ताक्षर किए हैं और रासायनिक हथियारों के अपने भंडार समाप्त कर दिए हैं। भारत रासायनिक हथियारों का युद्ध में इस्तेमाल का घोर विरोधी रहा है इसलिए नैतिकता का तकाजा है कि भारत को राष्ट्रपति बशर असद द्वारा कथित तौर पर गत 21 अगस्त को रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल के खिलाफ बोलना चाहिए। लेकिन केवल नैतिकता केआधार पर भारत अपने राष्ट्रीय हितों को नहीं बचा सकता। नैतिकता की बात करने वाले उसी अमेरिका पर आरोप है कि उसने ईरान के खिलाफ इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन द्वारा रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल पर आंखें मूंद ली थीं। इराक ने जब कुर्द विद्रोहियों के खिलाफ रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया तब भी अमेरिका ने आंखें मूंद लीं।

सीरिया के खिलाफ भी ताजा आरोपों में यह बात भी कही जा रही है कि वास्तव में वहां के विद्रोहियों ने राष्ट्रपति असद को बदनाम करने के लिए रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया है। भारतीय राजनयिकों का कहना है कि यदि राष्ट्रपति असद की सेना ने रासायनिक हथियार चलवाए तो कोई विद्रोही क्यों नहीं मरा? निश्चय ही वहां केअस्पतालों में कुछ कराहते लोगों की तस्वीरें पश्चिमी और अमेरिकी मीडिया पर दिखाई जा रही हैं, लेकिन एक साथ हजार लोगों के मारे जाने की पुष्टि नहीं हो रही। इसलिए भारत ने कहा है कि जब तक संयुक्त राष्ट्र के इंस्पेक्टरों की टीम इन हथियारों के इस्तेमाल की पुष्टि नहीं करेगी, तब तक भारत इस पर कुछ नहीं बोलेगा। सीरिया पर हमला हुआ तो ईरान शांत नहीं बैठेगा। उसके लिए अमेरिका से बदला लेने का यह सुनहरा मौका साबित होगा और वह अमेरिका के साझेदार सऊदी अरब पर मिसाइली हमला बोल सकता है। ईरान इस्राइल पर भी हमला कर सकता है। जवाब में इस्राइल भी ईरान पर हमला कर सकता है। इस तरह पूरा पश्चिम एशिया आग की लपटों में घिर सकता है, जिसका तुरंत असर पेट्रोल उत्पादन पर पड़ेगा। वहां से न केवल भारत को पेट्रोल सप्लाई पर असर पड़ेगा बल्कि पेट्रोल के दाम भी आसमान छूने लगेंगे। भारत का आयात निर्यात संतुलन भी बिगड़ेगा और भारत की आर्थिक स्थिति और खराब होगी।

भारत की दुविधा यह भी है कि संप्रभु देश की सत्ता उखाड़ फेंकने में किसी तीसरे देश का साथ दे या नहीं। भारत हमेशा से यह कहता रहा है कि दूसरे देश के अंदरूनी मामले में यदि किसी कारणवश हस्तक्षेप करना ही हो तो संयुक्त राष्ट्र की अनुमति लेकर करें। लेकिन अमेरिका को संयुक्त राष्ट्र की परवाह नहीं। अमरिका ने यदि संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी लिए बिना सीरिया पर हमला किया तो इसके भयंकर दुष्परिणाम होंगे। अमेरिकी कार्रवाई को चुनौती देने के लिए रूस के जंगी जहाज भूमध्यसागर की ओर कूच कर चुके हैं। सीरिया की वजह से यदि रूस और अमेरिका ने एक दूसरे के खिलाफ बंदूके तान लीं तो दुनिया फिर तीसरे विश्वयुद्ध की कगार पर जा सकती है।

रण जीत

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