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शीला की सरकार: कुछ ना कहूं तो अच्छा है- विजेन्द्र गुप्ता

भाजपा की दिल्ली इकाई के पूर्व अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता से उदय इंडिया के कार्यकारी संपादक श्रीकान्त शर्मा से हुई बेबाक बातचीत के अंश:

दिल्ली की जनता भाजपा से क्यों रूठी है?
मैं आपकी बात से सहमत नहीं हूं। आप जो कह रहे हैं, स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। दिल्ली की जनता आज भाजपा की ओर बहुत ही उम्मीद और विश्वास की नजरों के साथ देख रहे हैं। दिल्ली की जनता किसी भी सूरत में कांग्रेस का सत्ता से बाहर करना चाहती है।

पिछले तीन चुनावों से दिल्ली की जनता ने कांग्रेस को सत्ता सौंपी है। इस बार भाजपा के पास क्या नया मंत्र है कि आप विश्वास के साथ कह रहे हैं कि दिल्ली में भाजपा को सत्ता मिलेगी?
हमारे जो भी पिछले खट्टे-मीठे अनुभव रहे हैं, उन्हें आधार बना कर हम नए उत्साह के साथ आगे बढ़ रहे हैं। मेरा पूरा विश्वास है, और तमाम सर्वे भी कह रहे हैं कि इस बार सिर्फ और सिर्फ भाजपा सत्ता में आएगी।

इन चुनावों में आपके पास क्या मुद्दे हैं?
यह स्पष्ट हो गया है कि शीला दीक्षित की सरकार भ्रष्टाचारियों की सरकार है। अभी तो शीला दीक्षित के खिलाफ एफआई.आर. दर्ज कराने के आदेश भी अदालत ने दे दिए हैं। उनके खिलाफ 409 और 420 जैसी धाराएं लगाने के लिए कहा गया है। दूसरे जिस प्रकार से महंगाई है, दिल्ली की जनता के घर का बजट बुरी तरह से बिगड़ गया है। इतना ही नहीं, दिल्ली में महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस कर रही हैं। देश की राजधानी में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। दिल्ली की जनता के साथ विकास के नाम पर जिस प्रकार का छल हुआ है, आम आदमी से पूछें तो पता चलेगा कि 60 प्रतिशत दिल्ली मूलभूत सुविधाओं से महरूम है। सड़क, पीने के पानी, नागरिक जनसुविधाएं, स्कूल, अस्पताल जैसी सामान्य सुविधाओं को देखें तो दिल्ली के 60 प्रतिशत क्षेत्र ऐसे हैं जहां ये सुविधाएं हैं ही नहीं। सवाल यह है कि शीला दीक्षित सरकार मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने में नाकाम रही, झूठे आश्वासन देती रहीं, 1639 कॉलोनियां नियमित करने की घोषणा की गई, लेकिन एक भी कॉलोनी नियमित नहीं हुई। चुनाव के मौके पर शीला सरकार एक लाख लोगों को मकान देने की घोषणा करने का नाटक करती है। कितने मकान बांटे गए?

भाजपा की अन्दरूनी गुटबाजी को कैसे संभाला जाएगा?
भाजपा एक लोकतान्त्रिक पार्टी है। किसी एक परिवार से चलने वाला दल नहीं है। भाजपा दृढ़ संकल्प और ईमानदारी से काम करने वालों की पार्टी है। जब एक से ज्यादा ऐसे लोग एक साथ बैठते हैं तो विचार विमर्श के बाद सामूहिक नेतृत्व के साथ निर्णय लिए जाते हैं। उसी ढंग से लगातार निर्णय लिए जा रहे हैं। मैं नहीं समझता कि इसे गुटबाजी कहा जा सकता है। भाजपा के साथ लोग वैचारिक दृष्टि से जुड़े हैं, सब लोग विचारधारा को ही सर्वोपरि मानते हैं। इसलिए सभी विचारों के लिए ही काम करते हैं।

चुनाव सिर पर हैं और भाजपा के चुनाव प्रकोष्ठ के संयोजक सुधांशु मित्तल ने त्यागपत्र दे दिया है। क्या आप समझते हैं कि पार्टी में सब कुछ ठीक-ठाक है?
भाजपा के 40 प्रकोष्ठ हैं, उनमें से एक प्रकोष्ठ के संयोजक सुधांशु मित्तल थे। सुधांशु मित्तल सीधे चुनावों से जुड़े हुए नहीं थे। मैं मानता हूं कि उन्होंने कुछ न कुछ सोच कर पार्टी हितों को ध्यान में रख कर ही त्यागपत्र दिया होगा।

लेकिन कुछ नाराजगी रही होगी, तभी तो इस्तीफा दिया?
इस बारे में तो सुधांशु मित्तल जी ही ज्यादा अच्छा बता सकते हैं। मैंने तो यही आकलन किया है।

आप पार्टी की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष रहे हैं। क्या कारण हैं कि पार्टी के वर्तमान अध्यक्ष विजय गोयल आपके अनुभवों का लाभ क्यों नहीं उठा रहे?
हर व्यक्ति का काम करने का अपना तरीका होता है। मुझे ऐसा नहीं लगता कि वह मुझसे सहयोग नहीं लेना चाहते। निश्चितरूप से वह सहयोग की अपेक्षा करते हैं। हम लोग लगातार मिल काम भी कर रहे हैं। जनता ने पिछले दिनों में महसूस भी किया होगा।

तो फिर अध्यक्ष की मोटर साइकिल के पीछे बैठने की जरूरत क्या पड़ गई थी?
वो तो मोटरसाइकिल रैली थी। मोटरसाइकिल रैली में कोई न कोई किसी न किसी के पीछे बैठा था। विजय गोयल ड्राईविंग सीट पर थे तो मै उनके पीछे बैठ गया। मैं ड्राईविंग सीट पर होता तो वह मेरे पीछे बैठे होते।

उससे क्या संदेश गया?
संदेश तो सामान्य ही गया। पार्टी का कार्यक्रम था, और सब लोग साथ हैं। साथ रहेंगे। हम सब एक ही नौका में सवार हैं। यही संदेश होना चाहिए था। यही संदेश गया भी है।

सामूहिक नेतृत्व की बात हो रही है। तो क्या दिल्ली में भाजपा के पास ऐसा कोई नेता नहीं है, जिसे पार्टी मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर घोषित कर चुनाव मैदान में उतर सके?
यह पार्टी की रणनीति है। हर पार्टी अपना नीतिगत फैसला करती है। शीला दीक्षित जब 1998 में मुख्यमंत्री बनीं तो पार्टी ने उन्हें चुनावों से पूर्व मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया था। मुख्यमंत्री पद के लिए निर्णय संसदीय बोर्ड लेता है।

बेसिक मुद्दा है कि बीजेपी को चुनाव जीतना है। और दिल्ली में कांग्रेस के कुशासन से जनता को मुक्ति दिलानी है। उसके लिए जो भी सही रणनीति अपनाई जानी चाहिए, बीजेपी उस रणनीति को अपनाएगी। उसके लिए मुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवार का नाम घोषित करना, या घोषित न करना, दोनों तरह की रणनीति हो सकती है।

अरविन्द केजरीवाल की पार्टी ‘आप’ दिल्ली में चुनावों को कितना प्रभावित कर सकेंगे?
केजरीवाल की पार्टी का जन्म ही भ्रष्टाचार और धोखे से हुआ है। अन्ना हजारे के गैर-राजनीतिक आन्दोलन से राजनीतिक लाभ लेने के लिए केजरीवाल ने यह राजनीतिक पार्टी बनाई। यानी कि अन्ना को धोखा दिया। भ्रष्टाचारी और धोखे की सोच से केजरीवाल की ”आप’’ पार्टी का जन्म हुआ। यदि यह दल अन्ना की सहमति से बनता तो अन्ना आज उनके साथ खड़े होते। अन्ना आज उनसे नाराज हैं और अन्ना की उनके प्रति भावना धोखा खाने वाले की भावना है। पहले वे अन्ना को लाए और फिर अन्ना को धोखा दिया। दूसरा मौका ‘निर्भया’ के साथ बलात्कार और हत्या के मामले में आया। मैं केजरीवाल से पूछना चाहता हूं कि उस ‘निर्भया’ को इंसाफ दिलाने में वह खुद प्रो-एक्टिव क्यों नहीं हुए। जब पूरा देश आन्दोलन कर रहा था, उस वक्त केजरीवाल कहां थे? तीसरा जब रामलीला मैदान में उनका आन्दोलन चल रहा था, तब उन्होंने कहा था कि उनकी लड़ाई शीला दीक्षित की सरकार से नहीं है। उनका यह बयान शीला दीक्षित के पक्ष में था। अब जब शीला दीक्षित को सेशन कोर्ट ने सही मायनों में भ्रष्टाचार निरोधक कानून में बुक किया है और वह थ्री-व्हीलर पर शीला दीक्षित को बेईमान लिखते हैं लेकिन जब वह सही मायनों में बेईमान सिद्ध होती हैं, तो आप बोलते नहीं हैं।

लेकिन केजरीवाल की ”आप’’ को बीजेपी की सहयोगी पार्टी बताई जाती है? बीजेपी ने केजरीवाल की बहुत मदद की है।
जो सारे उदाहरण मैंने दिए उससे साफ है कि केजरीवाल की ‘आप’ कांग्रेस की सहयोगी पार्टी है। केजरीवाली विपक्ष के वोटों को बांट रहे हैं। इससे किसे फायदा होगा? जो कांग्रेस से त्रस्त होकर उसे हटाना चाहते हैं, वो कांग्रेस के खिलाफ वोटों को बांटेंगे नहीं। उसमें केजरीवाल सफल नहीं होंगे। कांग्रेस और केजरीवाल की मिली-भगत है।

मतलब कि ‘आप’ कांग्रेस की प्लांटिड पार्टी है?
जैसा रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के आन्दोलन के पीक पर इन्होंने शीला दीक्षित के पक्ष में बोला था। वे शीला दीक्षित को बेईमान कह रहे हैं लेकिन जब वह बेईमान सिद्ध होने जा रही हैं तो वह चुप हैं। यदि वह समय पर मुद्दों पर नहीं बोलेंगे तो मतलब साफ है कि वह दुबारा से शीला दीक्षित को फिर से मुख्यमंत्री बनाने का काम कर रही हैं। इनका बेसिक मकसद कांग्रेस को फिर से सत्ता में लाना है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि ये अपने इस मकसद में बिल्कुल भी सफल नहीं हो पाएंगे।

क्या आप मुख्यमंत्री की दौड़ में हैं?
मेरा एक ही लक्ष्य है-काम करना और पार्टी को आगे ले जाना। जिससे दिल्ली की जनता को उसका हक मिले। दिल्ली की जनता का अधिक से अधिक न्याय मिले और उनकी समस्याओं के हल निकलें। मै अपना काम करता रहूंगा, मेरे लिए पद महत्व नहीं रखता।

बिजली के दाम कम करने जैसे चुनावी वादे कितने व्यावहारिक हैं?
कांग्रेस ने बिजली कम्पनियों को हमेशा फायदा पहुंचाया है। दिल्ली की जनता के हितों की बजाय, बिजली कंपनियों के हितों की बात की है। जनता के हितों को हमेशा दरकिनार किया है। 4 मई 2010 को दिल्ली विद्युत नियामक आयोग बिजली के दाम करने की घोषणा करने वाला था, तो मुख्यमंत्री ने पत्र लिख कर उसे रोका। बाद में सिद्ध हुआ कि मुख्यमंत्री का वह पत्र लिखना उनकी अनाधिकार चेष्टा थी। कंपनियों के साथ मिल कर जनता को फायदे से महरूम कर दिया। हम पारदर्शिता के साथ बिजली कंपनियों के साथ काम करेंगे और जरूरत पड़ी तो उन कंपनियों को बाहर कर देंगे। किसी भी वस्तु के दाम उसकी मांग और उपलब्धता पर निर्भर करते हैं। यदि मांग अधिक है और उपलब्धता कम है, तो बिजली के दाम बढ़ेंगे।

लेकिन भाजपा के पास क्या योजना है?
दिल्ली में कूड़े से बिजली पैदा कर बिजली की मांग पूरी करेगी। दुनिया भर में कूड़े से बिजली बनाई जा रही है। दिल्ली में एक किलाग्राम कूड़ा भी बिजली में कन्वर्ट हुए बगैर नहीं रहेगा। दिल्ली में ही जब बिजली का उत्पादन इतना बढ़ जाएगा तो उसके दाम स्वत: कम हो जाएंगे।

दिल्ली में क्या बीजेपी अन्य किसी दल से भी चुनावी सहयोग लेगी?
दिल्ली में बीजेपी अपने बलबूते पर चुनाव लड़ती रही है। शिरोमणि अकाली दल के साथ भाजपा का राष्ट्रीय स्तर पर ही समझौता है। इसके अतिरिक्त पंजाब और दिल्ली में भाजपा का उनसे समझौता है। उनके साथ मिल कर चुनाव लड़ा जाएगा।

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