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भारतीय अर्थव्यवस्था एक सपने की मौत

विकास दर का ऊपर नीचे होना, रुपए में गिरावट, महंगाई, शेयर बाजार में ऊंच-नीच इन सबसे से खतरनाक है अर्थव्यवस्था में आम आदमी का भरोसा डिग जाना। इसलिए यूपीए सरकार का सबसे बड़ा पाप है उस सपने का टूट जाना, जो हर भारतीय की आंखों में अपने देश को महाशक्ति बनाने का था
खबर है कि मुंबई के आसपास के समुद्र तटों पर दशकों बाद एक बार फिर सोने के तस्कर सक्रिय हो गए हैं। वहां सोने की तस्करी फिर से शुरू हो गई है। यह नतीजा है सरकार की उन ताजा नीतियों का जो उसने सोने का वैध और कानूनी आयात रोकने के लिए लागू की हैं। लोगों को एक बार हिंदी फिल्मों के राबर्ट बॉस, सोना और मोना के दृश्य याद आने लगे हैं। सवाल है कि क्या हम फिर से अभावों, मंदी, कंट्रोल और लाइसेंस के युग में जा रहे हैं।

आइए, कुछ ताजा आंकड़े देखते हैं। अगस्त के महीने में देश में औद्योगिक गतिविधि में तेजी से गिरावट हुई है। मार्च 2009 के बाद पहली बार भारतीय अर्थव्यवस्था में ऐसा हुआ है। अप्रैल से जून के बीच विकास की दर 4.4 फीसदी रही है। रुपया गिर रहा है, महंगाई सुरसा की तरह बढ़ रही है, नौकरियां घट रहीं हैं और काम के बाजार में नए आने वाले युवा भारतीयों की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी हो रही है। देश एक विकट और भयावह आर्थिक स्थिति में फंसा है और सबसे कष्टप्रद बात है कि देश को चलाने वालों के पास किसी सवाल का संतोषजनक उत्तर नहीं है।

केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली रात को पेट्रोल पम्प बंद करने का हास्यास्पद सुझाव दे रहे हैं, तो प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह विपक्षी दल भाजपा को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। कोई अंतरराष्ट्रीय हालात को इसके लिए जिम्मेदार बता रहा है तो चालू खाते का घाटा कम करने के लिए वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने तो देश के सोने के भंडार को ही तकरीबन बेचने की सलाह दे डाली। हालांकि बाद में उन्होंने स्पष्टीकरण दिया कि वे तो सोने के मौद्रिकीकरण की बात कह रहे थे न कि उसे गिरवी रखने की। यह बात अलग है कि उन्होंने यह नहीं समझाया कि मौद्रिकीकरण से उनका आशय क्या था!

आर्थिक विशेषज्ञ और विश्लेषक इसका आकलन कर रहे हैं कि यूपीए सरकार ने ऐसा क्या किया (या क्या नहीं किया) जिससे ऐसे हालात पैदा हुए। बहुत संक्षेप में कहा जाए तो नीतिगत किंकर्तव्यविमूढ़ता, चुनावी मानसिकता और भ्रष्टाचार इसके लिए जिम्मेदार हैं। लेकिन इससे भी ज्यादा जिम्मेदार है कांग्रेस में शीर्षतम स्तर पर फैला वैचारिक भ्रम और नीतिगत अस्पष्टता की स्थिति। प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री जहां विकास के घोड़े का मुंह विश्व बैंक निर्देशित घोर उदारीकरण की तरफ करना चाहते हैं, वहीं सोनिया गांधी देश को 70 के दशक के समाजवादी युग में ले जाना चाहती हैं। इसलिए एक तरफ खुदरा व्यापार में विदेशी कंपनियों को खुली छूट की वकालत होती है तो दूसरी ओर खाद्य सुरक्षा बिल आता है। यह तो मात्र एक उदाहरण है। बुनियादी ढांचे में निवेश, कृषि, भूमि अधिग्रहण, शिक्षा, निर्यात, मेन्यूफेक्चरिंग, छोटे उद्योग और बैंकिंग तकरीबन हर क्षेत्र में नीतिगत असमंजसता की ऐसी स्थिति बनी हुई है। नतीजा हैं कि मौजूदा सरकार ने अर्थव्यवस्था के मर्ज को ठीक करने के लिए लगातार ऐसी खिचड़ी परोसी है कि मरीज और बीमार होता गया है। हालत यह है कि अब भारतीय अर्थव्यवस्था आईसीयू में वेंटिलेटर पर पहुंच गई है।

याद कीजिए कि किस तरह कुछ ही बरस पहले तकरीबन हर बहस में चर्चा होती थी कि हम चीन के बराबर कब पहुंचेंगे! 9 प्रतिशत के आसपास की विकास दर का आंकड़ा देखकर हम सोचते थे कि कैसे इसे दो अंकों का बनाएं? जब भी भारत के आर्थिक शक्ति बनने का जिक्र होता था, दिल में कैसी हर्ष देने वाली हिलोर उठती थी! हर भारतीय देश को एक विकसित देश बनने का अरमान दिल में संजोए हुए है, ऐसा होने की कल्पना मात्र से वो सिहर उठता था। मगर सोचिए आज देश का सोना बेचने की बात हो रही है? कहां से कहां आ पहुंचे हम? इस सरकार ने उस सपने को पूरी तरह तोड़ दिया है, जो यह देश कुछ समय पूर्व न सिर्फ देख रहा था, बल्कि पूरे आत्मविश्वास और यकीन के साथ उसे साकार करने में जुटा था।

विकास दर का ऊपर-नीचे होना, रुपए की दर में गिरावट, महंगाई, जिंसों के दाम घटना-बढऩा, शेयर बाजार में ऊंच-नीच – ये सब होता रहता है। मगर देश के समूचे आर्थिक भविष्य को लेकर ही आम लोगों में अनिश्चितता हो जाना खतरनाक है। इसलिए अगर सबसे बड़ा पाप हुआ है, तो वह है, उस सपने का टूट जाना, जो हम सब देख रहे थे। इसकी सजा जिसे मिलनी है वो तो मिलेगी ही, मगर देश को यह भारी पड़ा है और न जाने कितनी पीढिय़ों को इसका बोझ उठाना पड़ेगा!

 

उमेश उपाध्याय

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