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कब छंटेगा अंधेरा!

वोट बैंकों को मजबूत करने के लिए इन दंगों को लगातार सियासी हवा दी जाती रही है। मुजफ्फरनगर में भी सियासी हवा ने सांप्रदायिकता की लपटों को खूब सुलगाया है। यहां तक कि सेना को भी बुलाना पड़ा है। रस्मअदायगी के लिए हिंसा के इस समूचे घटनाक्रम की जांच के लिए एक सदस्यीय न्यायिक आयोग गठित किया गया है जिसे दो महीने में अपनी रिपोर्ट देने के लिए कहा गया है।
उत्तर प्रदेश के अति संवेदनशील जिले मुजफ्फरनगर में हुए दंगे में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लगभग 40 लोगों के मारे जाने की खबर है। लेकिन क्षेत्र के लोगों में हो रही चर्चा के मुताबिक मरने वालों का आंकड़ा 250 से अधिक बताया जा रहा है। अनेक लोग लापता बताए जा रहे हैं, लेकिन लापता लोगों के बारे में भी चर्चा है कि उन्हें काट कर गंग नहर में फेंक दिया गया है। नहर का पानी पीछे से बंद कर उसकी तलहटी में लाशें खोजी जा रही हैं। लेकिन जो लाशें बह गई हैं, वे तो वहां नहीं मिलेंगी। इन दंगों ने पूरे देश को झंझोड़ दिया है। इतने भयंकर दंगों की शुरूआत कहां से हुई? यह सवाल अनबूझा नहीं रहा है। जिले के एक गांव की किसी लड़की से दूसरे गांव का कोई लड़का छेडख़ानी किया करता था। बात यहां तक बढ़ गई कि मामले ने साम्प्रदायिक रंग ले लिया। साम्प्रदायिकता की बिसात पर जमकर सियासत हुई। फिरकापरस्तों ने जम कर अपना खेल खेला। देश के सिंहासन का रास्ता लोकसभा की 80 सीटों वाले प्रदेश से हो कर जाता है और देश की सत्ता के लिए चुनावों की धमक सभी को सुनाई दे रही है। ऐसे में कोई भी दल अपनी सियासी रोटियां सेंकने में कैसे पीछे रह सकता था। लिहाजा किसी भी राजनीतिक दल ने इस मामले में कोई कसर नहीं छोड़ी। एक पक्ष को पंचायत करने की इसलिए छूट दे दी गई कि उस पक्ष को उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ दल अपना वोटबैंक मानता है। दूसरे पक्ष को पंचायत करने की छूट नहीं मिली फिर भी पंचायतें होती रहीं। माहौल में लावा उबलता रहा। जैसा कि हमेशा होता है, प्रशासन कुंभकरण की नींद सोता रहा। पुलिस और प्रशासन को कुछ भी ऐसा नहीं लगा जैसे कि उन्हें कुछ करने की जरूरत हो। बताते हैं कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी रोम के नीरो वाली कहावत सुनी हुई थी। उन्हें वह कहावत बहुत ही पसन्द आती है कि जब रोम जल रहा था, तब नीरो बांसुरी बजा रहा था। किसी ने लखनऊ से मुझे बताया कि जब मुजफ्फरनगर जल रहा था और वहां मारकाट मची हुई थी….गोलियों की आवाज से आसमान गुंजायमान था….लोगों की चीखपुकार से पूरा देश परेशान, चिन्तित और दुखी था, तब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी नीरो की तरह किसी कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह में बज रही तालियां सम्मोहन में बांधे हुए थीं। जैसा होता है, गाज गिरा कर कुछ अधिकारियों के तबादले किए गए और सियासी दलों के नेताओं ने एक दूसरे पर आरोपों-प्रत्यारोपों का सिलसिला शुरू कर दिया। अखिलेश यादव की सरकार को बर्खास्त कर वहां राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग भी विभिन्न दलों ने की है। कांग्रेस के मधुसूदन मिस्त्री ने तो इसे गुजरात का मॉडल बताया है। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने इस दंगे के लिए सत्तारूढ़ सपा और उसके साथ भारतीय जनता पार्टी की सांठगांठ को जिम्मेदार ठहराया है तो सपा के मुखिया मुलायम सिंह ने इसे साम्पद्रायिक दंगा ही नहीं माना है। मुलायम सिंह के अनुसार तो यह जातीय संघर्ष है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया है कि उनकी पार्टी साम्प्रदायिक राजनीति नहीं करती।
दंगों का कारण कुछ भी रहे, मरना इंसान का ही होता है। वह भी ऐसे इंसानों को जिनका उन दंगों से कुछ लेना देना नहीं होता। दुकानें-वाहन जलते हैं। दुकानें लूटी जाती हैं। हर दंगे के दौरान भारी नुकसान होता है। वोट डालने का समय आने वाला है, आम जनता को अपनी आंखों के आगे छाए अंधेरे को हटा कर अपना हित देखना होगा। वैसे भी जितनी गंभीर समस्याओं से यह देश घिरा हुआ है, उसमें इन दंगों से विकास की गति को भारी धक्का लगता है। इन दंगों का दूरगामी प्रभाव आम
आदमी पर पड़ता है। देश के सामने खड़ी समस्याओं का प्रभाव भी आम आदमी पर पड़ता है। सबसे बड़ा संकट तो देश के आर्थिक हालात पर पड़ा हुआ है। इस बारे में आशंका तो यह भी जताई जा रही है कि हालात 1991 से अलग नहीं हैं, जब देश का सोना इंग्लैंड में गिरवी रखा गया था। प्याज और डॉलर एक ही दाम बताए जा रहे हैं। डॉलर के मुकाबले रूपया 65 के आंकड़े का छूने के बाद कुछ संभला है। लेकिन ऐसा नहीं कि देश राहत की सांस ले सके। सीरिया का संकट भारत पर भारी पड़ रहा है। अर्थ जगत के पंडित बताते हैं कि यदि अमेरिका ने सीरिया के संकट का राजनीतिक हल खोजने की बजाय अपना दम दिखाने के लिए हमला कर दिया तो भारत पर उसका असर बहुत ही खराब होगा।

देश में दिल्ली सहित पांच राज्यों में नवम्बर में चुनाव होने वाले हैं। इन चुनावों को 2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल माना जा रहा है। इसलिए सभी राजनीतिक दलों की नजर इस सेमीफाइनल पर है। राजनीतिक दलों के जो भी कदम हैं, वे इस सेमीफाइनल और 2014 के चुनावों से प्रेरित हैं। संसद का मानसून अधिवेशन अभी सम्पन्न हुआ है। वोट बैंक को प्रभावित करने वाले बिलों को पारित कराने के लिए यूपीए ने पूरा जोर लगा दिया। उसके लिए सरकार को बेशक संसद के अधिवेशन का कार्यकाल भी बढ़ाना पड़ा, तो बढ़ा लिया।

चुनावी वर्ष में सरकार के लटके-झटके सियासी हो जाते हैं। चुनाव कराने का बोझ तो सरकारी खजाने पर पड़ता ही है, साथ ही चुनावी वर्ष के लटके-झटके भी आम करदाता की जेब पर बोझ बन जाते हैं। गरीबों को बेहतर शिक्षा या बेहतर रोजगार देकर उनके जीवन स्तर को ऊंचा करने की सरकार की कोई सकारात्मक ठोस कोशिश सामने नहीं आती। उसके बदले इस प्रकार की योजनाएं सामने आती हैं, जो गरीब को आत्मसम्मान से जीना नहीं बल्कि खैरात लेना सिखाती हैं। इन योजनाओं में कहीं न कहीं भ्रष्टाचार के ‘बीज और खाद’ डालने की गुंजायश भी बहुत रहती है। देश के सामने मुंह बाए खड़ी समस्याओं को सुलझाने की बजाय, इस प्रकार के दंगा-फसाद से जनता का ध्यान मूल समस्याओं से हटाने की कोशिश रहती है। इन दंगों से होने वाले आर्थिक नुकसान, जान-माल की हानि का भी आकलन होता है, जिसकी भरपाई होनी मुश्किल होती है। लेकिन भ्रष्टाचार, महंगाई, अशिक्षा, गरीबी, पिछड़ेपन आदि से लडऩे की बजाय लोग आपस में ही खून के प्यासे हो जाते हैं।

देश को आजादी के समय हुए विभाजन ने दंगों का दंश दिया है, जो कभी नहीं भर सकता। इतना ही नहीं आजाद भारत में भी इतने दंगे हुए हैं, लेकिन कभी हमने कुछ सीखा नहीं। यहां तक कि उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार के दौरान ही तीन दर्जन से अधिक दंगे हो चुके हैं, लेकिन सरकार की दिलचस्पी उनके परिणामों से कुछ सीखने की नहीं दिखाई देती। अपने वोट बैंकों को मजबूत करने के लिए इन दंगों को लगातार सियासी हवा दी जाती रही है। मुजफ्फरनगर में भी सियासी हवा ने सांप्रदायिकता की लपटों को खूब सुलगाया है। यहां तक कि सेना को भी बुलाना पड़ा है। रस्मअदायगी के लिए हिंसा के इस समूचे घटनाक्रम की जांच के लिए एक सदस्यीय न्यायिक आयोग गठित किया गया है, जिसे दो महीने में अपनी रिपोर्ट देने के लिए कहा गया है। पूर्व न्यायधीश विष्णु सहाय की अध्यक्षता में इस एक सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग का गठन हुआ है। देश में जिस प्रकार से दंगों से पहले, दंगों के दौरान और दंगों के पश्चात सियासत होती है, उससे कहीं ऐसा नहीं लगता कि दंगों से प्रभावित निर्दोष लोगों को न्याय मिल सकता है। दंगों की जांच के लिए पहली बार किसी आयोग का गठन नहीं हो रहा है। पहले भी इस प्रकार के अनेक आयोग गठित किए जा चुके हैं। उनकी रिपोर्ट आती है, और ठंडे बस्ते में चली जाती है। उन रिपोर्टों का कोई असर किसी राजनीतिक दल पर नहीं पड़ता। इसके विपरीत राजनीतिक दलों के वोट बैंक और मजबूत हो जाते हैं। ऐसे आयोगों के गठन का लाभ तभी होगा जब सरकार उन पर विचार करेगी और चिंगारी को लपट बनने से पहले ही शांत करने के उपायों को लागू करेगी। सियासत छोड़ कर अन्य सभी दलों को भी उद्देश्यपूर्ण और गंभीर ढंग से साथ लेकर चलना पसंद करेगी।

 

श्रीकान्त शर्मा

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