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सौ साल के सुनहरे लम्हे

फोटोग्राफी और सिनेमा के जन्म के साथ ही भारत में भी इसके दीवाने पैदा हो गए थे इसीलिए इसके विकास क्रम में भारत अपने पाश्चात्य हमराहों से पीछे नहीं, बल्कि कई मामलों में आगे रहा है। इसके जन्म की कहानी भारत में बेहद दिलचस्प ढंग से शुरू होती है और आज बॉलीवुड हॉलीवुड से कई मामलों में टक्कर ले रहा है। जन्म से जवानी तक की यह यात्रा और इसके अहम किरदारों के सुनहरे पल हैं बेहद दिलचस्प… सिनेमा के जन्म की कथा भी बेहद दिलचस्प और फंतासी से भरपूर फिल्मी दृश्य जैसी ही है। 7 जुलाई 1896 का वह दिन। मुंबई का वॉटसन होटल। शाम 6 बजे। लुमिएर बंधुओं की बनाई छोटे-छोटे चलचित्र देखने के लिए दर्शकों में भारी उत्सुकता थी। फिल्म शुरू हुई। एक दृश्य में प्लेटफार्म पर गाड़ी धीरे-धीरे आ रही थी तो दर्शक यह सोचकर भाग खड़े हुए कि रेलगाड़ी उन पर चढ़ न जाए। आज यकीन करना कठिन है कि भारतीय सिनेमा का सफर ऐसे शुरू हुआ होगा।

1896 में बनी इन एक-एक शॉट की फिल्मों ने पूरी दुनिया के फिल्मकारों को आकर्षित किया। एक साल के भीतर ही दुनिया के कई और देशों में ऐसी फिल्में बनने लगीं। हीरालाल सेन इस दिशा में सक्रिय पहले भारतीय थे। वह 16 साल की उम्र में फ्रांस की पाथे कंपनी के साथ जुड़ गए। 1902 में उन्होंने पाथे कंपनी से एक कैमरा खरीदा और अगले 3 साल में करीब 20 नाटकों के दृश्यों का फिल्मांकन किया। लेकिन अफसोस भारतीय सिनेमा के इस जनक की बनाई कोई भी फिल्म आज उपलब्ध नहीं है। 1917 में उनकी मृत्यु से कुछ साल पहले, उनके भाई के गोदाम में भीषण आग लगी और हीरालाल सेन की सभी फिल्में जलकर राख हो गईं।

शुरू के उस दौर में महज सामान्य दृश्य ही फिल्माए जाते थे। सिनेमा में फंतासी का पुट नहीं आ पाया था। उसे रचनात्मक मोड़ देने का काम किया जार्ज मेलिए और एडविन एस. पोर्टर ने। उन्होंने फिल्म को कल्पना से जोड़ा और फिल्म संपादन की तकनीक का इस्तेमाल करके 10-12 शॉट जोड़कर फिल्में बनाईं। पोर्टर की ‘ग्रेट ट्रेन रॉबरी’ में 12 शॉट जोड़े गए थे। एक शॉट के दौरान ढ़लान पर रखे होने के कारण कैमरा अचानक घूम गया। संयोग से उस समय ट्रेन से उतरते एक डाकू का शॉट लिया जा रहा था। कैमरे के घूमने से लग रहा था जैसे कैमरा उसका पीछा कर रहा है। इस तरह पैनोरमा शॉट का अविष्कार हो गया।लेकिन पूरी मुकम्मल फिल्म बनाने का श्रेय डेविड वार्क ग्रिफिथ को जाता है। उनकी 1915 में बनी ‘बर्थ ऑफ ए नेशन’ पहली पूरी फिल्म थी। यह 12 रील की फिल्म थी और उस जमाने में उस पर एक लाख डॉलर का खर्च आया था। इस फिल्म ने खूब कमाई की। अगले साल ही उनकी दूसरी फिल्म आई ‘इनटॉलरेंस’। ये दोनों फिल्में ग्रिफिथ की श्रेष्ठ कृतियां मानी जाती है।
फालके का आगमन
फिल्म निर्माण में भारत कभी भी अपने पाश्चात्य हमराहों से ज्यादा पीछे नहीं रहा। कई मौकों पर वह आगे ही रहा। ग्रिफिथ ने 1915 में अपनी पूरी लंबाई की फिल्म बनाई थी तो भारतीय फिल्मों के जनक कहे जाने वाले धुंडिराज गोविंद फालके 1913 में ही अपनी पहली पूरी लंबाई की फिल्म बना चुके थे। दादासाहब के नाम से मशहूर फालके को फिल्म निर्माण की प्रेरणा एक अमेरिकी फिल्म ‘लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ से मिली। उन्हें लगा कि जब वहां के लोग क्राइस्ट को लेकर फिल्म बना सकते हैं तो हम अपने कृष्ण को लेकर क्यों नहीं। उन्होंने न सिर्फ फिल्म बनाने की तकनीक सीखी, बल्कि इसके लिए पूरी व्यवस्था भी की। लेकिन फिल्म बनाने की उनकी राह आसान नहीं थी। उस समय का भारतीय समाज संभ्रांत महिलाओं को फिल्मों की दुनिया में आने की आजादी देने को तैयार नहीं था। फालके को अपनी पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाने के लिए तारामती की भूमिका में सालुंके नामक एक पुरुष अभिनेता को लेना पड़ा। इसका पहला शो 21 अप्रैल 1913 को बंबई (अब मुंबई) के ओलंपिया सिनेमाहॉल में किया गया था।
1914 में पहला विश्वयुद्ध छिडऩे के बाद का समय फालके के लिए काफी मुश्किलों से भरा रहा। ऐसे में उनकी मदद के लिए कपड़े के व्यापारी मूलशंकर भट्ट आगे आए। 1917 में उन्होंने वामनराव आपटे के साथ मिलकर ‘हिंदुस्तान फिल्म्स कंपनी’ की स्थापना की। फालके ने इस दौरान अपनी पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ का रीमेक करने के साथ-साथ ‘लंका दहन’ जैसी महत्वाकांक्षी फिल्म भी बनाई। इस फिल्म की सफलता के बारे में फालके ने लिखा है, ‘लंका दहन से केवल 10 दिन में बंबई के वेस्टएंड सिनेमा में 32 हजार रुपए की आय हुई। मद्रास में ‘लंका दहन’ के टिकटों की खरीद से जमा हुए सिक्कों को बैलगाड़ी में लादकर लाना पड़ा।’’लंका दहन’ के बाद उन्होंने ‘कृष्ण जन्म’ और ‘कालिया मर्दन’ फिल्में बनाईं। दोनों में ही कृष्ण की भूमिका उनकी बेटी मंदाकिनी ने निभाई। फिल्म ‘लक्ष्मी का गलीचा’ में उन्होंने ट्रिक फोटोग्राफी की मदद से सिक्के पानी में तैराए। ‘प्रोफेसर केलफा के जादूई चमत्कार’ में फालके ने खुद जादूगर की भूमिका निभाई। फिल्म
बनाने की तकनीक सिखाने के लिए फालके ने ‘फिल्में कैसे बनाएं’ नाम से एक फिल्म ही बना डाली।जमशेदजी फ्रामजी मदन पहले निर्माता थे, जिन्होंने भारत में व्यावसायिक सिनेमा की नींव डाली। शुरुआत में उन्होंने भी पौराणिक और ऐतिहासिक विषयों को ही उठाया। 1919 में उन्होंने ‘बिल्व मंगल’ से अपने थिएटर की शुरुआत की। अगले वर्षों में उन्होंने ‘महासती बेहुला’, ‘महाभारत’, ‘जय मां जगदंबे’, ‘नल दमयंती’ और ‘ध्रुव चरित्र’ आदि कई फिल्में बनाईं। नाटककार आगा हत्ता कश्मीरी के प्रसिद्ध नाटक पर आधारित फिल्म ‘पति भक्ति’ के नायक उस समय के प्रसिद्ध अभिनेता मास्टर मोहन थे और हीरोइन की भूमिका एंग्लो-इंडियन लड़की पेशेंस कूपर ने निभाई थी। उसमें खलनायिका की भूमिका में इतालवी अभिनेत्री सिनोरा मिनेली थी। मिनेली के गदराए शरीर को ऐसे कपड़े पहनाए गए थे, जिसका मुख्य उद्देश्य अंग प्रदर्शन था। पेशेंस कूपर ने मदन थिएटर्स की और भी कई फिल्मों में प्रमुख भूमिका की थी। इनके अलावा दूसरी विदेशी सुंदरियां, भारतीय नामों के साथ मदन की कंपनी में काम कर रही थीं। इनमें प्रमुख थीं – रीनी स्मिथ (सीता देवी), ऐफी हिप्पोलेट (इंदिरा देवी) और बौनी बर्ड (ललिता देवी)।
कोलकाता उन दिनों सिनेमा के एक बड़े केंद्र के रूप में जाना जाता था। मदन की कंपनी के साथ-साथ दूसरे लोग भी फिल्में बना रहे थे। 1918 में अनादि बोस की फिल्म कंपनी ने ‘रत्नाकर’ बनाई थी। धीरेंद्रनाथ गांगुली ने मदन की कंपनी के जनरल मैनेजर नीतीश लाहिड़ी के साथ मिलकर इंडो-ब्रिटिश फिल्म कंपनी नाम से अपनी कंपनी बना ली और पहली फिल्म बनाई ‘विलैत फेरात’ या ‘इंग्लैंड रिटर्न’। भारतीय सिनेमा के परदे पर पहली बार एक सामाजिक व्यंग्य पर फिल्म बन रही थी। धीरेंद्रनाथ गांगुली की एक उपलब्धि यह मानी जा सकती है कि उन्होंने अपनी फिल्मों में नायिका के तौर पर विदेशी अभिनेत्रियों के बजाय भारतीय अभिनेत्रियों को पेश किया। उन्होंने कलकत्ता के संभ्रांत परिवारों को विश्वास दिलाया कि सिनेमा एक स्वच्छ और उपयोगी माध्यम है।फालके और गांगुली के समकालीन बाबूराव पेंटर ने 1917 में कोल्हापुर में महाराष्ट्र फिल्म कंपनी की स्थापना की। उस दौर में आजादी के आंदोलनों के साथ सीधे जुडऩा फिल्मकारों के लिए संभव नहीं था, लेकिन उन्होंने प्रतीकात्मक रूप से इसे अपनाया। बाबूराव पेंटर ने पांडवों के अज्ञातवास पर ‘सैरंध्री’ फिल्म बनाई। इसमें द्रौपदी को भारतमाता के प्रतीक के रूप में पेश किया गया था। भीम और कीचक की भूमिका उस जमाने के पहलवानों ने निभाई थी। दो अच्छे तकनीशियनों, दामले और फत्तेलाल का उन्हें सहयोग मिलता रहा। इसके बाद उन्होंने दूसरी फिल्म ‘वत्सला हरण’ भी महाभारत की पृष्ठभूमि पर ही बनाई। इसी दौरान केशवराव धायबर और वणकुदे्र शांताराम इस कंपनी से आ जुड़े। इस कंपनी ने ऐतिहासिक फिल्में ‘सिंहगढ़’, ‘राणा हम्मीर’ और ‘शाह को शह’ के अलावा सामाजिक विषय पर एक गंभीर फिल्म ‘शाहूकारी पाश’ भी बनाई। दामले और फत्तेलाल ने मिलकर फिल्मों का निर्देशन करने का निर्णय लिया। उस जोड़ी की पहली फिल्म थी ‘महारथी कर्ण’। इसी तरह शांताराम और धायबर ने ‘नेताजी पालकर’ से निर्देशन की शुरुआत की।

हिंमाशु राय मूक युग के महान फिल्मकारों में माने गए। उनके साथ पटकथाकार के रूप में निरंजन पाल और निर्देशक के रूप में जर्मन निर्देशक फ्रांज ऑस्टन जुड़े। इनकी पहली कृति थी, बुद्ध के जीवन पर बनी ‘लाइट ऑफ एशिया’। इस फिल्म का एक भारतीय नाम भी था ‘प्रेम संन्यास’। बुद्ध की भूमिका इसमें हिमांशु राय ने खुद निभाई। इस फिल्म ने हिमांशु राय की ख्याति पूरी दुनिया में फैला दी। हिमांशु ने इसके बाद ‘शिराज’ और ‘प्रपंच पाश’ बनाईं।

आज भी गूंजती है सोहराब मोदी की वह खनकदार आवाज
सोहराब मोदी का जन्म 2 नवंबर 1897 को जामनगर के एक पारसी परिवार में हुआ था। मुंबई के परेल हाईस्कूल से मैट्रिक किया। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने बड़े भाई केकी मोदी के साथ ग्वालियर में फिल्म प्रदर्शन के व्यवसाय में लग गए। 26 साल की उम्र में उन्होंने आर्य सुबोध थिएट्रिकल कंपनी की स्थापना की। पारसी नाटकों में काम करने लगे और कुछ मूक फिल्मों में भी काम करने का मौका मिला। अपने भाई की थिएटर कंपनी के साथ देश भर में घूमते थे। 1931 में सिनेमा में ध्वनि आने के बाद थिएटर कम होने लगा लिहाजा मोदी ने 1935 में स्टेज फिल्म कंपनी की स्थापना की। उनकी पहली फिल्म थी शेक्सपीयर के हैमलेट पर आधारित ‘खून का खून’ (1935) जिसमें पहली बार नसीम बानो परदे पर आई थीं। दूसरी फिल्म सईद-ए-हवस (1936) किंग जॉन पर आधारित थी। दोनों फिल्में असफल रहीं। लेकिन उनकी खनकदार आवाज दर्शकों के दिलो दिमाग में छा गई। 1936 में उन्होंने मिनर्वा मूवीटोन शुरू किया। इस बैनर की पहली फिल्म थी मीठा जहर (1938) जो शराब पीने के खिलाफ थी। अगली फिल्म हिंदू औरतों के तलाक के अधिकार पर बनाई तलाक (1938)। ये फिल्में कोई बड़ा करिश्मा नहीं कर पा रही थीं। हलचल मचाई उनकी फिल्म पुकार (1939) ने। इस सफलता को जारी रखा उनकी अगली दो फिल्मों सिकंदर (1941) और पृथ्वी वल्लभ (1943) ने। सिकंदर में पृथ्वीराज कपूर ने शीर्षक भूमिका निभाई थी और पुरु बने थे खुद सोहराब मोदी। इन दोनों के संवाद बहुत लोकप्रिय रहे थे। सोहराब मोदी के पारसी शैली के संवाद लोगों को बहुत पसंद आ रहे थे। नसीम बानो के साथ अपने प्रेम संबंधों के असफल रहने पर सोहराब मोदी ने 1946 में अपने से 20 साल छोटी अभिनेत्री मेहताब से छिपकर शादी कर ली। मेहताब के साथ तब तक उन्होंने एक ही फिल्म परख (1944) की थी। मेहताब के साथ उन्होंने भारत की पहली टैक्नीकलर फिल्म ‘झांसी की थी रानी’ (1956), जिसके लिए टेक्नीशियन हॉलीवुड से बुलवाए गए और कलर प्रिंटिग लंदन में जाकर करवाई गई। फिल्म की लागत बहुत बढ़ गई और बॉक्स ऑफिस पर असफल रहने के कारण सोहराब मोदी की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई। इसके बाद उन्होंने फर्ज और मुहब्बत उर्फ नौशेरवान-ए-आदिल (1957), जेलर (1958), मेरा घर मेरे बच्चे (1960), समय बड़ा बलवान (1969) आदि कुछ फिल्में बनाईं। एक लंबे अंतराल पर मीना कुमारी के निधन के बाद सोहराब मोदी ने मीना कुमारी की फिल्मों के टुकड़े जोड़कर उनके जीवन पर मीना कुमारी की अमर कहानी (1981) बनाने का प्रयोग किया जो सफल नहीं रहा।सोहराब मोदी को 1980 में दसवें दादासाहब फालके अवार्ड से सम्मानित किया गया। अंतिम समय में मोदी हड्डियों कैंसर के शिकार हो गए थे। आर्थिक हालात इतने खराब हो चुके थे कि इलाज भी नहीं करा सकते थे। ऐसे में एक डॉक्टर ने बिना पैसे लिये उनका इलाज किया। 28 जनवरी 1984 को 86 साल की उम्र में मुंबई के कफ परेड के उनके घर में उनका निधन हो गया।
नितिन बोस, चंदूलाल शाह, होमी मास्टर, मणिलाल जोशी, एम. भवनानी, मानेक लाल पटेल, हर्षदराय मेहता जैसे फिल्मकार, मूक फिल्मों के युग में फिल्मों निर्माण में सक्रिय रहे। इन फिल्मों के विषय पौराणिक और समाज सुधार से प्रेरित होने लगे। होमी ईरानी ने स्टंट फिल्मों की शुरुआत की। वह निर्देशन करने के साथ-साथ फिल्म में मुख्य भूमिका भी निभाते थे। देश में पहली बोलती फिल्म के निर्माता आर्देशिर ईरानी ने अब्दुल अली के साथ मिलकर 1922 में इंपीरियल फिल्म कंपनी की स्थापना की थी। उसी साल उन्होंने अपनी पहली मूक फिल्म ‘वीर अभिमन्यु’ बनाई। इनके साथ काम करने वालों कलाकारों में जेबुन्निसा, सुलोचना (रूबी मेयर्स), मजहर खान, याकुब खान, ई. बिलिमोरिया, डी. बिलिमोरिया और जाल मर्चेंट आदि प्रमुख थे। ऐसे बोलना सीखा फिल्मों ने
फिल्मों में आवाज को लेकर ज्यादातर फिल्मकार दुविधा में थे। 1927 में अमेरिका में वार्नर ब्रदर्स ने पहली बोलती फिल्म ‘द जॉज सिंगर’ बनाकर उस दुविधा को समाप्त कर दिया। फिर भी कुछ निर्माता मूक फिल्में ही बनाने के मूड में थे। इनमें शांताराम भी थे। उन्होंने लिखा है, ‘बोलती फिल्मों को टक्कर देने के लिए हमने एक अति भव्य मूक फिल्म बनाने का निर्णय लिया। इसमें कैमरे को ट्रॉली पर रखकर कुछ शॉट लिए गए थे। ‘चंद्रसेना’ फिल्म अत्यधिक लोकप्रिय हुई। ‘चंद्रसेना’ भारत में ही नहीं, बर्मा में भी खूब चली।’

लेकिन यह खुशी ज्यादा दिन नहीं रही। मुंबई की इंपीरियल फिल्म कंपनी ने आर्देशिर ईरानी के निर्देशन में ‘आलमआरा’ बना दी थी। जाहिर है कि अब इस चुनौती का मुकाबला सभी को अपने अपने तरीके से करना था। फिल्म इतिहासकार मनमोहन चड्ढा के अनुसार, ‘जहां ‘प्रभात’ के भविष्य निर्माता शांताराम और कुशल तकनीशियन दामले व फत्तेलाल ने सावधानी से काम लिया, वहीं (कोलकाता में) न्यू थिएटर्स के वीरेंद्रनाथ सरकार ने दो सालों में ही 8 ध्वनि फिल्में बनाकर न्यू थिएटर्स को डूबने की स्थिति में पहुंचा दिया।’

फंतासी और यथार्थ का बेजोड़ महबूब
उनका पूरा नाम महबूब खान रमजान खान था। जन्म 1907 में बड़ौदा के बिलिमोरा गांव के एक गरीब परिवार में हुआ। गरीबी के कारण पढ़ाई भी ठीक से न हो सकी। उन्हें टूरिंग सिनेमा देखने का शौक था और हीरो बनना चाहते थे। गांव के अपनी पहचान के रेलवे गार्ड इस्माइल जीवा की मदद से आर्देशिर ईरानी की इंपीरियल फिल्म कंपनी में एक्स्ट्रा के रूप में काम मिल गया। पहली बार फिल्म ‘अलीबाबा चालीस चोर’ में एक चोर की भूमिका मिली जो फिल्म के रिलीज होने तक गायब भी हो गई थी। पहली तनख्वाह तीस रुपए मिली तो चाल में एक कमरा ले सके वरना रातें बॉम्बे सेंट्रल स्टेशन की बेंच पर गुजरती थीं। उनके साथ संघर्ष करने वालों में पृथ्वीराज कपूर और दोनों बिलिमोरिया बंधु भी हुआ करते थे। निर्देशन का पहला मौका फरीदुन ईरानी के सहयोग से सागर मूवीटोन की फिल्म अल हिलाल (1935) में मिला। मनमोहन (1936), जागीरदार (1937), हम तुम और वो (1938) आदि फिल्में महबूब ने सागर मूवीटोन के लिए बनाई।विश्वयुद्ध के कारण जब सागर मूवीटोन बंद हो गया तो महबूब ने उसकी पूरी यूनिट के साथ मिलकर नेशनल स्टूडियो की स्थापना की और पहली फिल्म बनाई ‘औरत’ (1940) जिसमें सरदार अख्तर ने उस अकेली औरत की भूमिका निभाई थी जो लालची सूदखोर से संघर्ष करते हुए अपने दो बेटों को पालती है। इसी कहानी पर उन्होंने बाद में ‘मदर इंडिया’ (1957) भी बनाई थी जिसमें यह भूमिका नर्गिस ने निभाई थी। सूदखोर लाला की भूमिका में दोनों फिल्मों में कन्हैयालाल थे। ‘रोटी’ (1942) में उस समृद्ध वर्ग पर कटाक्ष है, जो दूसरों से छीनकर सब कुछ अपने लिए चाहता है लेकिन अंत में वह प्यासा मरता है। ‘अनमोल घड़ी’ (1946) में नूरजहां और सुरैया को एक साथ परदे पर उतारा गया था। साथ में सुरेंद्र थे। इस फिल्म के सभी गाने हिट रहे थे। अनोखी अदा (1948) में सुरेंद्र के साथ नसीम बानो थीं। अंदाज (1949) में उस दौर के दो सितारों दिलीप कुमार और राज कपूर को नर्गिस के साथ कास्ट किया गया था। आन (1952) में उन्होंने एक नई अभिनेत्री नादिरा को मौका दिया जिसकी भूमिका फिल्म में नकारात्मकता की ओर झुकी प्रतीत होती है। फिल्म की दूसरी हीरोइन निम्मी थीं, जो महबूब की कई फिल्मों में दूसरी हीरोइन के तौर पर ही नजर आती हैं। इस फिल्म को 16 एमएम में शूट करके महबूब से 35 एमएम में ब्लोअप किया। यह भारत की पहली टेक्नीकलर फिल्म मानी जाती है।

मदर इंडिया उनकी पुरानी ‘औरत’ का रीमेक होने के बावजूद इसे आजाद भारत के परिप्रेक्ष्य में औरत की आजादी और सशक्तीकरण का प्रतीक माना जाता है। ऑस्कर पुरस्कारों में विदेशी भाषा की फिल्म का नामांकन पाने वाली यह पहली भारतीय फिल्म है। पांच साल बाद महबूब ने एक और फिल्म ‘सन ऑफ इंडिया’ (1962) बनाई लेकिन वह प्रभाव नहीं छोड़ पाई।

लगातार असफलता के बाद सरकार ने एक नए निर्देशक देवकी बोस को आजमाने का निर्णय लिया। 1932 में देवकी बाबू ने पहली फिल्म बनाई ‘चंडीदास’ जो 64 हफ्ते चली। 1933 में उन्होंने ‘पूरन भगत’ बनाई। इन दोनों फिल्मों के बाद न्यू थिएटर्स एक बार फिर अपनी पुरानी ऊंचाइयों पर पहुंच गया। अब न्यू थिएटर्स के तीन प्रमुख स्तंभ थे देवकी बोस, नितिन बोस और प्रमथेश बरुआ। न्यू थिएटर्स का जोर सामाजिक विषयों पर बनी ऐसी फिल्मों की ओर था, जिनमें भावनात्मक कोण भी प्रमुखता हो। संगीत इन फिल्मों का एक प्रमुख पक्ष था।न्यू थिएटर्स की फिल्मों में भाव पक्ष प्रधान रहा। देवकी बोस जहां ‘चंडीदास’ और ‘विद्यापति’ जैसी संगीत प्रधान फिल्में बना रहे थे, वहीं प्रमथेश बरुआ 1935 में ‘देवदास’ के रूप में अपनी पहली ही फिल्म बनाकर देवकी बोस के समकक्ष माने जाने लगे थे। इसी दौरान न्यू थिएटर्स के लिए ही फणि मजुमदार ने 1938 में ‘स्ट्रीट सिंगर’ बनाई तो 1944 में हेमचंद्र ने ‘माई सिस्टर’ का निर्देशन किया। इन दोनों फिल्मों में भी संगीत का कमाल रायचंद्र बोराल ने ही दिखाया था। इन फिल्मों के नायक कुंदन लाल सहगल थे और उनके गाए गीत आज भी पुराने संगीत को पसंद करने वालों में क्रेज बने हुए हैं। यहां हम स्टार सिस्टम की भूमिका बनते देखते हैं।

प्रभात ने अपनी पहली बोलती फिल्म बनाई ‘अयोध्या का राजा’। यह हिंदी और मराठी में साथ-साथ बनाई गई। इसका निर्देशन शांताराम ने किया था। 6 फरवरी, 1932 को मुम्बई में इसका प्रदर्शन शुरू हुआ। इसमें दुर्गा खोटे ने तारामती की भूमिका निभाई थी।

उसी साल इनकी टीम ने ‘जलती निशानी’ और ‘माया मछिंदर’ भी बनाई। प्रभात ने एक कदम और बढ़कर 1933 में फिल्म ‘सैरंध्री’ बनाई, जिसे जर्मनी की बाईपैक पद्धति से रंगा गया था। इस तरह यह पहली भारतीय रंगीन फिल्म भी बन गई। 1934 में ‘अमृत मंथन’ और 1936 में ‘अमर ज्योति’ ने प्रभात का न सिर्फ अब तक का घाटा दूर कर दिया, बल्कि एक सुखद स्थिति में भी ला दिया। ‘अमृत मंथन’ में पहली बार चंद्रमोहन की आंख टाइट क्लोजअप में पूरे परदे पर दिखाकर शांताराम ने अपनी तकनीकी कुशलता का परिचय दिया था। दामले-फत्तेलाल की जोड़ी ने भी प्रभात के लिए ‘संत तुकाराम’, ‘गोपाल कृष्ण’, ‘संत ज्ञानेश्वर’ और ‘संत सखू’ जैसी फिल्में बनाईं। इनकी गिनती अभिव्यक्ति के उच्चतम स्तर को छूने वाली फिल्मों में की जाती है।

सिनेमा की सामाजिक भूमिका पर भी प्रभात की नजर रही। ‘दुनिया न माने’ एक पढ़ी-लिखी लड़की के विद्रोह की कहानी है, जिसका विवाह उसकी मर्जी के खिलाफ एक बूढ़े व्यक्ति से कर दिया जाता है। अपने नरेशन में शांताराम प्रतीकों और रूपकों का इस्तेमाल बड़ी खूबसूरती के साथ करते हैं। जाने-माने पत्रकार वी.पी. साठे अपने लेख ‘द सिनेमा ऑफ वी. शांताराम’ में लिखते हैं, ‘शांताराम बड़ी खूबसूरती से बूढ़े काका द्वारा मूंछे रंगने की तुलना लोहार द्वारा पुराने बर्तनों को चमकाने से करते हैं। पुरानी घड़ी का प्रतीक और छाते से घड़ी चलाने का प्रयत्न बूढ़े की मानसिक दुविधा को दर्शाते हैं। ये प्रतीकात्मक दृश्य बाद में ‘शांताराम टच’ के नाम से जाने गए।’ फिल्म में प्रमुख भूमिका शांता आप्टे ने निभाई थी।

1939 में बनी शांताराम की ‘आदमी’ एक ऐसे आदमी की कहनी है, जो एक वेश्या से प्रेम करता है और देवदास की तरह खुद को शराब में डुबो देने के बजाए उसे घर ले आता है। 1941 में शांताराम ने ‘पड़ोसी’ बनाई, जिसमें हिंदू युवती और मुस्लिम युवक के बीच प्रेम संबंध दिखाया गया था। ‘दहेज’ उन्होंने दहेज प्रथा के खिलाफ बनाई।

1941 में प्रभात से अलग होकर शांताराम ने मुम्बई में राजकमल कलामंदिर स्टूडियो की स्थापना की। इसमें उन्होंने ‘शकुंतला’ और ‘डॉ. कोटनीस की अमर कहानी’ जैसी कालजयी फिल्में बनाईं।

शास्त्रीयता और तकनीक के महारथी शांताराम
पूरा नाम शांताराम राजाराम वणकुद्रे। उनका जन्म 18 मार्च 1901 को कोल्हापुर में हुआ। बचपन में परिवार काफी गरीबी में रहा। पिता और बड़ा भाई सिनेमा हॉल में चौकीदारी करते थे। शांताराम पढ़ाई करते हुए कंपोजिंग का काम भी करते। सिनेमा के प्रति बचपन से ही आकर्षण रहा। अभिनय का शौक नाटकों की तरफ ले आया। गंधर्व नाटक कंपनी में कुछ छोटे-मोटे काम किए। लेकिन लक्ष्य तो फिल्मों तक पहुंचना था। कोल्हापुर में ही बाबूराव पेंटर की महाराष्ट्र फिल्म कंपनी में रोटी कपड़े के बदले एपरेंटिस लग गए। झाड़ू लगाने से लेकर पोछा तक मारते थे। वहीं मूक फिल्म सुरेखा हरण (1921) में भगवान कृष्ण की भूमिका भी मिल गई। सिंहगढ़ (1923) में शेलार मामा की भूमिका मिली। सावकारी पाश (1925) पहली बार नायक बने। इसमें वह एक गरीब किसान की भूमिका में थे जो साहूकारी प्रथा के खिलाफ आवाज उठाता है। नेताजी पालकर (1927) में उन्हें निर्देशन का काम संयोग से ही मिल गया। फिल्म बनने के दौरान बाबूराव पेंटर बीमार हो गए और उन्होंने निर्देशन शांताराम को सौंप दिया। अब तक शांताराम फिल्मकला की बारीकियों को समझ चुके थे और उन्होंने अपने पूरे कौशल के साथ फिल्म को पूरा किया। फिल्म सफल रही और उनके नाम की धूम मच गई। उन्हें महीने के पचास रुपए मिलने लगे।पेंटर से किसी बात पर नाराज होकर शांताराम और उनके साथ केशवराव घायबर, विष्णु गोविंद दामले, शेख फत्तेलाल और सीताराम बाबू कुलकर्णी ने अलग होकर प्रभात फिल्म कंपनी का गठन कर लिया। शांताराम के ये चारों साथी अपने अपने क्षेत्र के चोटी के टैक्नीशियन थे। उनकी पहली मूक फिल्म गोपाल कृष्ण (1929) लोगों को बहुत पसंद आई। इस फिल्म में बैलगाडिय़ों की दौड़ को पहली बार दिखाया गया था। फिल्म की कमाई से पुणे में जमीन खरीदकर प्रभात स्टूडियो बनाया गया। यहां आकर उन्होंने उदयकाल (1930), चंद्रसेना (1931), माया मछिंदर (1932) आदि मूक फिल्में बनाई। उनकी पहली सवाक फिल्म थी अयोध्या का राजा (1932) थी। इसमें दुर्गा खोटे और गोविंदराव तांबे मुख्य भूमिकाओं में थे। फिल्म हिंदी और मराठी दो भाषाओं में बनाई गई थी। अमृत मंथन (1934) में पहले ही दृश्य में चंद्रमोहन की आंख का टाइट क्लोजअप लेकर उस जमाने में शांताराम ने तकनीकी श्रेष्ठता साबित कर दी थी। धर्मात्मा (1935) बनाकर गांधी और उनके आदर्शों परदे पर पेश किया जिसमें अछूतोद्धार पर जोर दिया गया था। अमर ज्योति (1936) नारी स्वातंत्र्य की बात करती है। दुनिया न माने (1937) आदमी (1939) और पड़ोसी (1941) के जरिए शांताराम रूढ़ सामाजिक परंपराओं के खिलाफ आवाज उठाते हैं। इन तीनों फिल्मों को उन्होंने हिंदी के अलावा मराठी में भी बनाया।

1941 में शांताराम मुंबई आ गए और राजकमल कलामंदिर के बैनर से फिल्में बनाने लगे। यहां उन्होंने पहली फिल्म बनाई शकुंतला (1943)। डॉ. कोटनीस की अमर कहानी (1946) में शांताराम ने एक ऐसे डॉक्टर की कहानी कही है, जो अपने जीवन को खतरे में डालकर चीन जाता है और वहां फैली हुई महामारी के पीडि़तों का इलाज करता है। दहेज (1950), परछाइयां (1952), तीन बत्ती चार रास्ता (1953), झनक झनक पायल बाजे (1955), तूफान और दिया (1956), दो आंखे बारह हाथ (1957), नवरंग (1959), स्त्री (1961) आदि फिल्मों के माध्यम से शांताराम ने सामाजिक संदेश दिए हैं। गीत गाया पत्थरों ने (1964) में उन्होंने अपनी बेटी राजश्री को पहली बार जितेंद्र के साथ परदे पर उतारा था। जितेंद्र की भी यह पहली फिल्म थी। लेकिन इसके बाद वह अपने पिता की किसी और फिल्म में नहीं आई। उनकी इसके बाद की उल्लेखनीय फिल्मों में ‘बूंद जो बन गई मोती (1967), जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली (1971), चानी (1977)’ आदि के नाम लिए जा सकते हैं।

शांताराम को फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ के लिए श्रेष्ठ निर्देशक, दो आंखें बारह हाथ के लिए श्रेष्ठ फिल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। 1985 में उन्हें दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 27 अक्तूबर 1990 को उनका निधन हो गया। 88 साल की उम्र में मुंबई में उनका निधन हो गया। 1992 में मृत्यु के बाद भारत सरकार ने उन्हें पद्मविभूषण से अलंकृत किया।

हिमांशु राय ने पहली बोलती फिल्म बनाई ‘कर्मा’, जो हिंदी और अंग्रेजी संस्करणों में एक साथ बनी। अंग्रेजी संस्करण 1932 में रिलीज हुआ और हिंदी संस्करण 27 जनवरी 1933 को। अगले साल हिमांशु राय ने बॉम्बे टॉकीज की स्थापना की और इसे एक लिमिटेड कंपनी बना दिया। 100 रुपए मूल्य के 25 हजार शेयर जारी कर दिए। यह एक तरह से भारत में किसी फिल्म कंपनी का पहला कॉरपोरेटाइजेशन था। तारीख थी 26 फरवरी 1934।देविका रानी के शब्दों में, ‘1935 में जब हमने बंबई में मलाड में बॉम्बे टाकीज स्थापित की तो उसे व्यापार की तरह चलाया। हमारे पास श्रेष्ठ उपकरण और श्रेष्ठ टेक्नीशियन थे। निर्देशक फ्रांज ऑस्टन और विदेशी तकनीशियनों के साथ हमारा करार था कि 5 वर्ष में वे हमारे लोगों को प्रशिक्षित कर देंगे।’’

फिल्म इतिहासकार मनमोहन चड्ढा इसे बॉम्बे टॉकीज की एक बड़ी भूल मानते हैं, ‘उन्होंने भारतीय प्रतिभाओं में विश्वास न करते हुए हर कदम पर विदेशी तकनीशियनों को प्रमुखता दी। इसी की वजह से बॉम्बे टॉकीज कभी न्यू थिएटर्स और प्रभात के मुकाबले खड़ा नहीं हो सका।’

बॉम्बे टॉकीज ने पहली फिल्म 1935 में बनाई थी ‘जवानी ही हवा’। अगली फिल्म ने हिंदी सिनेमा के एक नए सितारे को परदे पर उतरते देखा। ‘जीवन नैया’ में नायक के रूप में एक शर्मीला-सा नौजवान अशोक कुमार, देविका रानी के साथ नजर आता है। लेखक और निर्देशक तो तय ही थे, निरंजन पाल और फ्रांज ऑस्टन। अगले दो साल में इस चौकड़ी ने ‘अछूत कन्या’, ‘जन्म भूमि’, ‘इज्जत’ और ‘सावित्री’ बनाई, लेकिन कोई भी फिल्म दर्शकों को पसंद नहीं आई। दूसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत के साथ ही जर्मन नागरिक ऑस्टन को 1940 में ब्रिटिश शासन वाले भारत को छोड़कर जाना पड़ा। दूसरे विदेशी टेक्नीशियन भी चले गए और उसी साल हिमांशु राय का निधन हो गया। स्टूडियो की बागडोर देविका रानी के हाथों में आ गई।

अब भारतीय टेक्नीशियनों को अपना काम दिखाने का मौका मिला। 1943 में ज्ञान मुखर्जी के निर्देशन में फिल्म बनी ‘किस्मत’। उसे एक विद्रोही फिल्म कह सकते हैं। इसमें एक रिबेलियन पहली बार फिल्म का नायक बन रहा था। यह नायक एक चोर था, एक खास अंदाज में सिगरेट पीता परदे पर आता था। फिल्म इतनी हिट साबित हुई कि कोलकाता के एक थिएटर में 3 साल 8 महीने तक चलती रही। इसे हिंदी सिनेमा की पहली ब्लॉक बस्टर कह सकते हैं। नायक? नायक और कौन हो सकता था, अशोक कुमार के अलावा। फिल्म इतिहासकार मनमोहन चड्ढा के अनुसार, इस फिल्म ने ‘हिंदी फिल्मों को बहुत से फार्मूले दिए। अमीर पिता और उसके दो बेटे, बड़े बेटे का बिछुडऩा और अंत में मिलना। एक बेटा दिल का खरा सोना है, लेकिन पेशे से चोर है। जब यह चोर अपने जीवन की अंतिम चोरी करने सेठ के घर पर जाता है, तो सेठ चोर के गले में पड़े लॉकेट से खोए बेटे को पहचान लेता है। आदि…..।’

1950 में बॉम्बे टाकीज के लिए कमाल अमरोही ने ‘महल’ फिल्म बनाई, जो एक और महत्वपूर्ण फिल्म साबित हुई। यहीं से हम हॉरर फिल्मों की शुरुआत मान सकते हैं। इसमें अशोक कुमार की हीरोइन मधुबाला थी। यह पुनर्जन्म के फार्मुले को जन्म देने वाली फिल्म थी। खेमचंद्र प्रकाश के संगीत में बनी इस फिल्म के गाने बहुत लोकप्रिय हुए। हॉरर दृश्यों में आज की तरह धांय-धांय का शोर करने के बजाए एक ठंडी ध्वनि, हॉल में बैठे दर्शक की नसों में झिरझिरी पैदा कर देती है।

1931 में ध्वनि आने से लेकर अगले 20 साल में 1950 तक, लगभग 2100 फिल्में बनीं। सोहराब मोदी, महबूब खान जैसे निर्देशकों ने इसी दौर में शुरुआत की थी, लेकिन उनकी ज्यादा महत्वपूर्ण फिल्में इसके बाद आईं। इस दौर में दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद की मशहूर त्रिमूर्ति ने अपनी शुरुआती फिल्में की थीं। गुरुदत्त की शुरुआत भी इसी दौर की है।

फिल्म संगीत का स्वर्ण युग
फिल्मों का संगीत पहले फिल्मांकन के साथ ही रिकॉर्ड होता था। लेकिन प्लेबैक सिस्टम के साथ ही संगीत के साथ बहुत सी संभावनाएं खुल गई थीं। अब कुंदनलाल सहगल, पंकज मलिक जैसे गायक अभिनेता के बिना भी काम चल सकता था। मुकेश, मुहम्मद रफी, तलत महमूद, हेमंत कुमार, शमशाद बेगम, नूरजहां, लता मंगेशकर, गीता दत्त जैसी आवाजें और नौशाद, शंकर जयकिशन, एस.डी. बर्मन, ओ.पी. नैयर, सी. रामचंद्र जैसे संगीतकार भारतीय फिल्म संगीत की परंपरा को नई ऊंचाइयां दे रहे थे। इनकी अगली पीढ़ी के रूप में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन आदि ने भी उसी मेलोडी को बनाए रखा। उस दौर के संगीत की लोकिप्रयता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि संगीत कंपनियां आज भी इस या उस बहाने, उस दौर के गानों के नए कैसेट और सीडी रिलीज करती रहती हैं। इन गानों के खूब रीमिक्स बन रहे हैं और नए फिल्मी गानों के मुकाबले ज्यादा हिट हो रहे हैं।

ऐसे में फिल्म बॉम्बे टॉकीज की फिल्म ‘ज्वार भाटा’ से दिलीप कुमार, केदार शर्मा की फिल्म ‘नील कंवल’ से राज कपूर और प्यारेलाल संतोषी (राजकुमार संतोषी के पिता) की फिल्म ‘हम एक हैं’ से देव आनंद ने फिल्म के परदे पर कदम रखा और आने वाले लगभग दो दशक तक उस पर छा गए। फिल्म के सफल होने में सितारों की भूमिका प्रमुख हो जाने के कारण वे किसी एक कंपनी से बंधकर रहने के बजाए फ्रीलांसर बन गए और धीरे-धीरे स्टूडियो सिस्टम कमजोर होता चला गया और स्टार सिस्टम ने उसकी जगह ले ली।ये तीनों नायक सिनेमा में तीन तरह की प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। दिलीप कुमार ट्रेजिडी फिल्मों के मसीहा माने जाते हैं। हालांकि बाद के दौर में इस टैग को नकारते हुए उन्होंने कुछ बहुत अच्छी कॉमेडी भूमिकाएं भी की हैं। राज कपूर ने एक आम हिंदुस्तानी के सपनों को पर्दे पर साकार किया। उनके अभिनय में दिलीप कुमार वाली रेंज भले ही न हो, लेकिन एक कमिटमेंट दिखाई देता है। एक निर्माता-निर्देशक के रूप में उन्होंने साबित किया कि पूरी व्यावसायिकता बनाए रखते हुए भी सामाजिक संदेश दिया जा सकता है। देव आनंद ने उस दौर के लवर ब्वॉय की छवि को अपनाया।

60 के दशक के उत्तरार्ध तक आते-आते त्रिमूर्ति का जादू कम होने लगा और इसी के साथ राजेश खन्ना नाम का एक तूफान इंडस्ट्री पर ऐसा छाया कि कुछ सालों के लिए वही वह था। राजेश खन्ना में भी एक शहराती लवर ब्वॉय था, लेकिन देव आनंद से एक अलग स्टाइल के साथ। इस दौर में फिल्मों के विषय, ट्रीटमेंट, संगीत आदि सब गौण हो गए थे। सिर्फ नायक था। लड़कियां इसे अपने खून से खत लिखती थीं। इसके लॉकेट अपने गले में पहनती थीं।

यों तो राजेश खन्ना 80 के दशक के अंत तक फिल्में करते रहे, लेकिन 1973 में फिल्म ‘जंजीर’ के साथ अमिताभ बच्चन के आगमन ने उनका जादू एक हद तक कम कर दिया।

आया अमिताभ
अमिताभ बच्चन उनके लिए एक नया नायक था, जिसका आचरण आदर्श तो नहीं था, लेकिन उस मध्यवर्ग की आकाक्षाओं का प्रतीक बन गया था जो आजादी के बाद के मोहभंग के दौर से गुजर रहा था। अमिताभ में उन्हें ऐसे नायक की छवि दिखाई दी, जो वह सब कर रहा था, जो वे करना तो चाहते थे लेकिन नहीं कर पा रहे थे। उसे खुद ऐसे किसी काम को करने से परहेज नहीं था जो मान्य सामाजिक परंपराओं के हिसाब से गलत था लेकिन बुरे लोगों को, समाज के अपराधियों को पीट रहा था, सजा दे रहा था। और जल्द ही अमिताभ ने अपने लिए सुपर स्टार की पदवी हासिल कर ली। फिर जो जादू अमिताभ का चला, वह आज भी दर्शकों पर छाया हुआ है। उनका करिश्माई व्यक्तित्व दर्शक को बांधकर रख देता था। वैसे इस सफलता के पीछे सलीम जावेद की जोड़ी की कलम का कमाल भी कम नहीं था। आखिर इस एंग्री यंगमैन के चरित्र की कल्पना तो उन्हीं की थी। ‘शोले’ वह फिल्म थी, जिसने अमिताभ को सफलता की एक नई ऊंचाई दी। ‘दीवार’ और ‘त्रिशूल’ वे फिल्में थीं, जो अमिताभ के इस नए नायक को परिभाषित करती हैं। इस दौरान भी हृषिकेश मुखर्जी अमिताभ के साथ उसकी छवि के विपरीत ‘अभिमान’, ‘चुपके चुपके’, ‘मिली’, ‘जुर्माना’ आदि फिल्में बना रहे थे। अमिताभ के साथ-साथ इस दौर में हम शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना, शशि कपूर को देखते हैं, फिर राजेश रोशन, विनोद मेहरा, राज बब्बर, मिथुन चक्रवर्ती आदि भी अमिताभ के छाया में ही काम करते रहे।

अमिताभ ने नायक के व्यक्तित्व को इतना बदला तो बाद के फिल्मकारों ने उसे उसे खलनायक तक बना दिया। खुद अमिताभ ही नहीं, शाहरुख (डर, अंजाम), आमिर (फना, 1947 अर्थ), संजय दत्त (रक्त), अजय देवगन (दीवानगी, खाकी), गोविंदा (शिकारी), अक्षय कुमार (अजनबी), सैफ अली खान (ओंकारा, एक हसीना थी), सुनील शेट्टी (रुद्राक्ष, खेल), अक्षय खन्ना (हमराज), आफताब शिवदासानी (कसूर) आदि नेगेटिव रोल करने लगे।

90 के दशक तक आते-आते अमिताभ का जादू कम होने लगा था। उम्र उनके चेहरे पर दिखाई देने लगी थी। एक ब्रेक के बाद उन्होंने नई पारी शुरू की जहां उन्हें ‘मेजर साब’, ‘सूर्यवंशम्’ आदि फिल्मों में उनकी उम्र की भूमिकाओं में स्वीकार किया। ‘मुहब्बतें’ से उनकी नई पारी में सफलता का दौर शुरू हुआ।

1980 के दशक के आसपास हम संजय दत्त, जैकी श्रॉफ, अनिल कपूर, सनी देओल आदि का आना देखते रहे। सबने कुछ बहुत अच्छी फिल्में भी दी, लेकिन अमिताभ के जादू को दर्शकों पर से कम न कर सके।

1950-60 की दिलीप, राज, देव की त्रिमूर्ति की तरह पिछली सदी के अंतिम दशक में एक नई खान तिकड़ी अपना वर्चस्व कायम कर रही थी। ये तिकड़ी ज्यादा प्रोफेशन एप्रोच के साथ मैदान में आई है। यहां हम दिलीप कुमार की तरह ही आमिर खान को परफैक्शन के साथ काम करने में विश्वास करता देखते हैं। शाहरूख ‘रोबोट’ के माध्यम से सुपर हीरो का एक भारतीय किरदार गढ़ रहे हैं, तो सलमान ने अपनी एक ‘दबंग’ शैली गढ़ ली है। सलमान के साथ एक सुविधा यह भी है कि उन्हें सलीम-जावेद की जोड़ी के सलीम का बेटा होने के कारण घर में ही एक मेंटोर मिल गया।

आज खान तिकड़ी – शाहरुख, आमिर और सलमान के अपने जलवे हैं (बीच बीच में सैफ भी चैथे खान के रूप में पहचान बनाने की कोशिश करते रहे हैं), लेकिन परदे पर जब अमिताभ आते हैं तो सब उनके सामने बौने ही लगते हैं। (ये सभी खान छोटे कद के जो हैं।)

इन तीन खानों के साथ-साथ अक्षय कुमार, अजय देवगन, सुनील शेट्टी आदि भी सफल फिल्में देते रहे हैं। इन तीनों की विशेषता यह भी रही है कि ये कॉमेडी और एक्शन दोनों में ही महारत रखते हैं।

पिछले कुछ सालों में हमने रोमांटिक फिल्मों के दौर भी देखे हैं, माइंडलेस कॉमेडी के भी और एक्शन थ्रिलर के भी। इस बीच कुछ गंभीर छोटे बजट की फिल्में भी आती रही हैं और उन्हें भी अपने हिस्से के दर्शक मिलते रहे हैं। उन पर बात हम अलग से करेंगे।

यह खान तिकड़ी कुछ ही साल में 50 की उम्र तक पहुंच रही है। अपनी खास शैलियों में यह कुछ सयय तक अपने आप को बनाए रख सकती है। इस बीच हृतिक रोशन, शाहिद कपूर, रणबीर कपूर, इमरान खान, रणवीर सिंह आदि की नई पीढ़ी सिनेमा में अपनी जगह बना चुकी है। इस दौर के कुछ अभिनेताओं के काम से लगता है कि खान तिकड़ी के जाने के बाद जो जगह बनेगी, वह ज्यादा समय तक खाली नहीं रहेगी।

सुरेश उनियाल

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