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फैल रही है दंगे और दरार की सियासत

राष्ट्रीय मीडिया में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर के दंगे छाए हुए हैं। हम ऐसी खबरों के आदी हो चले हैं। कोई भी टीवी चैनल खोलिए बलात्कार, हत्या, बच्चों पर यौन अत्याचार, किसानों की आत्महत्या, आतंकवादी हमले, नेताओं के भ्रष्टाचार या सांप्रदायिक दंगों में मौत के ब्रेकिंग न्यूज हमारी संवेदना की परीक्षा लेने लगते हैं। कैसे शर्मनाक दौर में हम पहुंच गए! क्या हमारा समाज इतना अराजक हो गया है कि अशांति पैदा करता रहता है या फिर कुछ निहित स्वार्थी तत्व अपने राजनीतिक फायदे के लिए पूरे देश के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। हमारा समाज जाति, धर्म और भाषा की विविधता के बावजूद एक सूत्र में शांति और सौहाद्र्र के साथ रहता रहा है। भारत दुनिया में इस सांप्रदायिक सौहाद्र्र की अनोखी मिसाल है। इस पृष्ठभूमि में यह विश्वास करना भी मुश्किल है कि कोई छोटी-सी छोटी घटना भी कैसे विकराल हिंसा का रूप ले लेती है और सांप्रदायिक तनाव बेकाबू हो जाता है। सरकार के पास यह पुख्ता सूचना है कि कौन वैमनष्य फैला रहा है, जिससे आम आदमी एक-दूसरे के खून का प्यासा हो गया है। केरल के मोपला दंगों से लेकर दिल्ली में सिख विरोधी दंगे या उत्तर प्रदेश के किसी भी दंगे पर नजर डालिए तो यह समझ पाना मुश्किल

नहीं है कि एक ही तरह के राजनीतिक तत्व निराधार विचारधारा और गुंडों की मदद से सदियों से स्थापित समाज के धागे को छिन्न-भिन्न कर रहे हैं। किसी भी दंगे में दोषियों को शायद ही पकड़ा जा सका है, क्योंकि वे पूर्वनियोजित रणनीति के साथ दुष्प्रचार और सरकार तथा राजनीतिक शह से काम करते हैं। अगर अदालतों के सख्त रवैए के कारण ये पकड़े भी जाते हैं तो वर्षों तक मुकदमे लटके रहते हैं और उनका या उनके परिवार का बाल भी बांका नहीं होता। वजह यह है कि उनके पीछे वह समूह या पार्टी खड़ी होती है, जिसके लिए वह ऐसा संगठित अपराध करता है। मुजफ्फरनगर में भी, जहां 38 लोगों की जान जा चुकी है और हजारों लोग बेघर हो चुके हैं, कुछ खास राजनीतिक तत्वों ने तांडव को अंजाम दिया। उन लोगों ने वहां की एक छोटी सी घटना को दुष्प्रचार कर ऐसा भयावह रूप दे दिया। उत्तर प्रदेश में अपराधिक गतिविधियों से जुड़े ऐसे कई नेता हैं जो हमारे लोकतंत्र को तार-तार कर रहे हैं। ऐसे नेता कानून के प्रति अपनी जवाबदेह सिर्फ इसलिए स्वीकार नहीं करते, क्योंकि वे ‘अल्पसंख्यक’ कहे जाने वाले गरीब समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिकों ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ‘अल्पसंख्यक’ और ‘गरीब’, इन दो शब्दों का भारी दुरुपयोग किया है। लेकिन क्या इससे उत्तर प्रदेश के मुसलमानों की आर्थिक स्थिति सुधरी? क्या उन्हें सियासी खैरात और तोहफों से कुछ हासिल हुआ? यकीनन नहीं। दरअसल मुसलमान ही नहीं, समाज के हर वर्ग को उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री से काफी उम्मीदें थीं। वह जब सत्ता में आए तो लोग उम्मीद लगा बैठे थे कि प्रदेश में नए युग की शुरुआत होगी, लेकिन वह सपना मुजफ्फर नगर और उसके आसपास के गांवों में फैले दंगों के साथ चूर-चूर हो गया। अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश के लोगों के सामने इस सवाल का जवाब जरूर देना चाहिए कि उन्होंने दुर्गाशक्ति नागपाल को मुअत्तल करने में मिनटों नहीं लगाए, लेकिन सांप्रदायिक दंगों को रोकने में नाकाम अधिकारियों के खिलाफ अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की। अगर सेना नहीं बुलाई गई होती, तो मौत के आंकड़े कई गुना बढ़ गए होते।
भारत में दंगों को अक्सर किसी चिंगारी से भड़की स्वभाविक आग की तरह देखा जाता है, जिसमें असामाजिक कट्टरवादी तत्व अपनी रोटियां सेंकते हैं। अपेक्षाकृत मामूली घटनाओं को भी राजनीतिक तत्व बढ़ा-चढ़ाकर ऐसे प्रस्तुत कर देते हैं कि गांवों और समाज में भावनाएं भड़क जाती हैं। इसलिए ऐसे राजनीतिक तत्वों, अधिकारियों और धार्मिक नेताओं की भूमिका की जांच करने की दरकार है, जो दंगों से फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। लोगों की भावनाओं को अमूमन चुनाव नजदीक आने के के साथ ही हवा दी जाती है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते हैं, दंगों की आशंकाएं भी बढ़ती जाती हैं। इससे साबित होता है
कि धार्मिक हिंसा का धर्म से कोई लेना-देना नहीं, बल्कि यह राजनीतिक आकांक्षाओं और विचारधाराओं को उचित ठहराने के लिए धर्म के दुरुपयोग का मामला है। जब तक देश धर्म, जाति, भाषा में बंटा रहेगा और निरक्षर जनता को राजनीतिक नेता अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते रहेंगे, देश में विकास की उम्मीद नहीं की जा सकती है। इतिहास गवाह है कि सांप्रदायिक दंगों से कभी कोई रचनात्मक समाज नहीं बन पाया है। अगर समाज की ऊर्जा छोटे-मोटे बेमानी मसलों में ही बंटी रहेगी तो किसी क्षेत्र में प्रगति की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है। ”एकता में ही शक्ति’’ – यह महज मुहावरा नहीं है। अगर हम भारतीय धर्म, जाति, प्रदेश की भावनाओं से ऊपर उठकर एकजुट हो जाएं तो धरती पर यह एक अनूठे सपने के साकार होने जैसा होगा। सीमा पर दुश्मन हो तो चलेगा, लेकिन दुश्मन हमारे भीतर हो तो हमारी राष्ट्रीयता का आधार ही बिखर जाएगा। हमारे राष्ट्र को आकार देने वाले महापुरुषों ने हमारे लिए कुछ सपने संजोए थे। सियासतदानों ने अपने स्वार्थों के लिए उन सपनों को चूर-चूर कर दिया। लेकिन जरा सोचिए – कितनी राजनीतिक पार्टियों ने समाज के टकरावों को सुलझाने की कोशिश की है।

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