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बृहस्पति के चंद्रमा पर नासा की नजर

यूरोपा बृहस्पति का बर्फ से ढका हुआ चंद्रमा है। नासा का मानना है कि मनुष्य एक दिन वहां अपनी बस्ती बसा सकता है। नासा के वैज्ञानिकों की एक टीम ने यूरोपा के भावी मिशन के लिए कुछ लक्ष्य निर्धारित किए हैं। पहला मुख्य लक्ष्य वहां के गैर-बर्फीले पदार्थों की विस्तृत जांच करने का है, ताकि वहां मौजूद लवणों, कार्बनिक पदार्थों और अन्य तत्वों के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सके। बर्फ रहित पदार्थ के नमूने एकत्र करने के लिए बर्फीली सतह पर दो अलग-अलग जगहों पर खुदाई करनी पड़ेगी। दूसरा बड़ा लक्ष्य बृहस्पति के इस उपग्रह का भू-भौतिक नक्शा तैयार करने का है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यूरोपा पर अंतरिक्षयान उतार कर उसकी सतह की भौगोलिक विशेषताओं को समझा जा सकता है। लेकिन, उपग्रह पर अंतरिक्षयान उतारना एक बहुत ही कठिन चुनौती है और नासा की जेट प्रोपल्सन लेबोरेटरी के वैज्ञानिक रॉबर्ट पापालाडऱ्ो का कहना है कि इस लक्ष्य को हासिल करने में कई वर्ष लग सकते हैं।गत मार्च में वैज्ञानिकों ने बताया था कि यूरोपा की बर्फीली सतह के नीचे, तरल पानी के समुद्र से खारा पानी सतह पर आ जाता है। इससे वहां जीवन होने की संभावना को बल मिलता है। वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में अनुमान लगाया था कि यूरोपा की बर्फीली सतह और उसके भूमिगत समुद्र के बीच निरंतर रासायनिक आदान-प्रदान होता रहता है, जिसकी वजह से समुद्र रासायनिक रूप से ज्यादा समृद्ध हो जाता है। यह रिपोर्ट कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के खगोलविद् माइक ब्राउन और जेट प्रोपल्सन लेबोरेटरी के वैज्ञानिक केविन हैंड ने तैयार की थी। ब्राउन का कहना है कि सतह और समुद्र के बीच आदान-प्रदान का मतलब यह है कि समुद्र में कहीं से ऊर्जा प्रविष्ट कर रही है, जोकि वहां जीवन की संभावनाओं के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि यूरोपा के समुद्र की रासयनिक संरचना शायद पृथ्वी के खारे पानी के समुद्र से मिलती जुलती है।

नासा के एम्स रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिक क्रिस्टोफर मैके के अनुसार, यूरोपा के विस्तृत खगोल-जीव वैज्ञानिक अध्ययन के लिए उसकी सतह पर यान उतारना सबसे महत्वपूर्ण कदम होगा। नासा के कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि हमें मंगल के बेजान लाल रेगिस्तान पर समय बर्बाद करने के बजाय यूरोपा पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। यदि हमारे सौरमंडल में पृथ्वी के बाद कहीं जीवन होने की संभावना है, तो वह यूरोपा ही हो सकता है, मंगल नहीं। वैज्ञानिकों का एक बड़ा वर्ग यह भी मानता है कि परग्रही जीवन की तलाश के लिए यूरोपा के अलावा शनि का एक नन्हा बर्फीला चंद्रमा, एन्सेलेडस भी एक उपयुक्त स्थान हो सकता है। सूरज से करीब 1.60 अरब किलोमीटर दूर शनि की परिक्रमा कर रहे इस चंद्रमा का व्यास सिर्फ 482 किलोमीटर है। इस विषम बर्फीली दुनिया में परालौकिक जीव-रूपों की मौजूदगी का विचार बहुत ही अनोखा लगता है, लेकिन रिसर्चरों का कहना है कि भविष्य के अंतरिक्ष अन्वेषण कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करते हुए, हमें एन्सेलेडस को भी शामिल करना चाहिए।

नासा के वोएजर यान ने सबसे पहले 1979 में यूरोपा को नजदीक से देखा था। नासा के ही गैलीलियो यान ने नब्बे के दशक में इसकी सतह के चित्र पृथ्वी पर भेजे थे। गैलीलियो गेलिली ने जनवरी 1610 में यूरोपा और बृहस्पति के तीन अन्य चंद्रमाओं की खोज की थी। वैसे बृहस्पति के कुल चंद्रमाओं की संख्या 64 है। यूरोपा हमारे चंद्रमा से कुछ छोटा है। पृथ्वी से यूरोपा की दूरी करीब 56 करोड़ किलोमीटर है। बहुत कम क्रेटर होने की वजह से इसकी सतह चिकनी और सपाट है। यूरोपा का मध्य भाग संभवत: लौह धातु का बना हुआ है, जिसके ऊपर सिलिकेट चट्टान की बड़ी परत है। चट्टान की परत के ऊपर समुद्र है, जो बर्फ की मोटी चादर से ढका हुआ है। यूरोपा के पतले वायुमंडल में ऑक्सीजन मौजूद है। यह उपग्रह करीब साढ़े तीन दिन में बृहस्पति की परिक्रमा पूरी करता है। यह सौर मंडल का 15वां सबसे बड़ा खगोलीय पिंड है। कुछ वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ज्वारीय गतिविधियों से मिलने वाली गर्मी से यूरोपा के समुद्र तरल बने रहते हैं। यह गर्मी यूरोपा की भौगोलिक गतिविधियों को संचालित करती है। पृथ्वी पर यह काम ‘प्लेट टेक्टोनिक्स’ अथवा भीतरी शिला-खण्डों की हलचल द्वारा किया जाता है।

 

मुकुल व्यास

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