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दिल्ली दरबार ‘लौह महिला’ बनाम ‘भगोड़ा आदमी’

दिल्ली दरबार ‘लौह महिला’ बनाम ‘भगोड़ा आदमी’

By सुधीर गहलोत

किरण बेदी के नाम भारत की पहली महिला आईपीएस ऑफिसर होने का तमगा लगा हुआ है। बेदी की छवि एक ऐसे आईपीएस अधिकारी की रही है, जिन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की गाड़ी का चालान काट दिया था। अपने 40 साल के पुलिस करियर में किरण बेदी ने पुलिस प्रशासन में कई तरह के सुधार किए थे। तिहाड़ जेल की प्रमुख होने नाते वहां के कैदियों के लिए बहुत से ऐसे कामों की शुरूआत की थी, जो सजा समाप्ति के बाद उनके पुनर्वास में महत्वपूर्ण साबित हुई।

भाजपा ने यह कहकर कि इस बार का चुनाव ‘आयरन लेडी’ (लौह महिला) बनाम ‘आई रन मैन’ (भगोड़ा आदमी) के बीच है, अण्णा के दो पुराने सहयोगियों के बीच लड़ाई का औपचारिक ऐलान कर दिया है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और भाजपा में हाल ही में शामिल हुईं किरण बेदी कभी अण्णा के साथ मंच को साझा करते हुए भारत से भ्रष्टाचार मिटाने का आह्वान किया करते थे और जनलोकपाल बिल को समय की मांग बताते थे। हालांकि जनलोकपाल का मुद्दा तो नेपथ्य में चला गया, लेकिन उस आंदोलन से उपजे अरविंद केजरीवाल एक बार सत्ता का स्वाद चखने में कामयाब रहे। दिल्ली में कांग्रेस की दुर्गति के बाद मोदी लहर पर अभी भी सवार भाजपा ने केजरीवाल का मुकाबला करने के लिए सख्त पुलिस अधिकारी की छवि वाली किरण बेदी को अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है।

जनलोकपाल बिल को पास कराने के लिए अराजकता और धरना-प्रदर्शन के रास्ते को छोड़कर राजनीति में आने का निमंत्रण तत्कालीन यूपीए सरकार ने केजरीवाल को  दिया था। इस निमंत्रण को केजरीवाल ने स्वीकार करते हुए 26 नवंबर 2012 को आम आदमी पार्टी का औपचारिक रूप से गठन किया। तब अण्णा हजारे ने कहा था कि केजरीवाल और उनके रास्ते अलग हैं। किरण बेदी ने तब अण्णा की हां में हां मिलाते हुए केजरीवाल द्वारा अपनाए गए रास्ते को गलत करार दिया था और कहा था कि भ्रष्टाचार के विरूद्ध उनकी लड़ाई जारी रहेगी, लेकिन किसी पार्टी के माध्यम से नहीं। इन सालों में कई नई इबारतें लिखी गईं। अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने तो शीला दीक्षित की अगुवाई वाली कांग्रेस विलीन हो गई। अब भाजपा ने केजरीवाल को नेपथ्य में धकेलने के लिए किरण बेदी को अपना मोहरा बनाया है। स्वभाविक है कि दिल्ली चुनावों में असली मुकाबला भाजपा और आआपा के बीच ही है।

15 जनवरी को भाजपा के केन्द्रीय मुख्यालय 11 अशोक रोड पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय की उपस्थिति में किरण बेदी भाजपा में शामिल हुईं। भाजपा में शामिल होते ही बेदी ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की विजनरी छवि ने उन्हें भाजपा ज्वॉइन करने के लिए प्रेरित किया। भाजपा में रहकर दिल्ली को विश्वस्तरीय शहर बनाने की भी बात कही। किरण बेदी ने केजरीवाल पर पहला वार करते हुए कह दिया कि वे अराजकता की राजनीति से अलग दिल्ली के विकास की राजनीति में विश्वास रखती हैं। केजरीवाल ने बेदी को खुली बहस करने की चुनौती दे डाली, लेकिन बेदी ने यह कहकर इस चुनौती को नकार दिया कि उन्हे सड़कों पर बहस करने के बजाय विधानसभा में बहस करना पसंद है।

7 फरवरी को होने वाले मतदान के लिए 21 जनवरी को नामांकन की प्रक्रिया समाप्त हो गई। किरण बेदी ने कृष्णा नगर सीट से अपना चुनावी पर्चा भरा, वहीं केजरीवाल ने नई दिल्ली सीट से। कांग्रेस के चुनाव अभियान के प्रमुख और उसका चेहरा बने अजय माकन ने दिल्ली सदर से अपना चुनावी पर्चा भरा। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने ग्रेटर कैलाश से कांग्रेस पार्टी से अपना पर्चा दाखिल किया। किरण बेदी के विरूद्ध आआपा ने एस.के. बग्गा को टिकट दिया है, वहीं केजरीवाल के खिलाफ नई दिल्ली से भाजपा ने दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष नुुपूर शर्मा को उतारा है। आआपा में नंबर दो की हैसियत रखने वाले मनीष सिसोदिया ने पटपडग़ंज से नामांकन पत्र दाखिल किया। कभी आआपा से विधायक रहे और अब भाजपा में शामिल हो चुके विनोद कुमार बिन्नी को भाजपा ने सिसोदिया के खिलाफ मैदान में उतारा है। पिछले विधानसभा चुनावों में बिन्नी ने आआपा की टिकट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता अशोक वालिया को लक्ष्मी नगर विधानसभा क्षेत्र से हराया था। जाहिर है, दोनों ही पार्टियों ने एक दूसरे के खिलाफ कमजोर प्रत्याशी उतारे हैं। तीनों पार्टियों के प्रमुख लोगों के नामांकन का पर्चा भरते ही राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप अपने चरम पर पहुंच चुका है।

किरण बनाम केजरीवाल 
केजरीवाल के पीठ पर भले ही भगोड़ा होने का ठप्पा लग चुका हो, लेकिन मजबूत विपक्ष के रूप में भाजपा के विरूद्ध केजरीवाल ही एकमात्र विकल्प हैं। केजरीवाल की ईमानदारी और उनकी जुझारू छवि को दिल्ली का एक तबका आज भी पसंद करता है। पिछली 49 दिनों की सरकार में केजरीवाल ने भले ही बहुत कुछ नहीं किया हो, लेकिन आम लोगों से संबंधित बिजली और पानी की समस्या का कुछ हद तक समाधान करने का दिखावा जरूर किया था। दिल्ली के लोग आज भी उस दौर को याद करते हैं, जब किसी काम के एवज में पुलिसकर्मी और अधिकारी घूस लेने से हिचकते थे। दिल्ली के गोविंदपुरी में रहने वाले रामकृपाल कहते हैं – ”हम जैसे लोगों के लिए सरकार का इतना ही अर्थ है कि अपने किसी काम के लिए किसी को घूस नहीं देना पड़े। भ्रष्टाचार का हाल यह है कि दिल्ली में बिजली का बिल भी जमा कराने के लिए घूस की मांग की जाती है। केजरीवाल के राज में अधिकारी और कर्मचारी घूस लेने से कतराते थे।’’ नामांकन के बाद केजरीवाल ने कहा कि मेरी लड़ाई किसी पार्टी से नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार से है।

केजरीवाल अपने बड़बोलेपन के लिए भी जाने जाते हैं, जिसके कारण उनकी किरकिरी भी होती रही है। हाल ही में केजरीवाल ने सतीश उपाध्याय पर आरोप लगाया था कि दिल्ली में बिजली कंपनियों के साथ उनके व्यवसायिक संबंध हैं। इसके बाद उपाध्याय ने उन्हें नोटिस थमा दिया। केजरीवाल ने कहा था कि इस आरोप के पीछे उनके पास पुख्ता सबुत हैं, जिसकी घोषणा वो एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। केजरीवाल ने मतदाताओं से यह कहकर सनसनी फैला दी कि अगर कांग्रेस और भाजपा वाले उन्हें पैसे देने आते हैं तो वे ले लें। इस मुद्दे पर कांग्रेस ने निर्वाचन आयोग से शिकायत की। आयोग ने केजरीवाल को इसके लिए नोटिस थमा दिया। चंदे को लेकर केजरीवाल पर कई आरोप भाजपा ने भी लगाए हैं। एक ही रसीद पर कई लोगों से चंदे लेने का आरोप दिल्ली भाजपा ने लगाए हैं। केजरीवाल इसके पहले दिल्ली भाजपा पर सांप्रदायिक हिंसा भड़काने का आरोप लगा चुके हैं। राजनीति का दामन थामते ही केजरीवाल के खिलाफ 7 मामले थे, जो इस बार बढ़कर 9 हो गए हैं।

किरण बेदी के नाम भारत की पहली महिला आईपीएस ऑफिसर होने का तमगा लगा हुआ है। बेदी की छवि एक ऐसे आईपीएस अधिकारी की रही है, जिन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की गाड़ी का चालान काट दिया था। अपने 40 साल के पुलिस करियर में किरण बेदी ने पुलिस प्रशासन में कई तरह के सुधार किए हैं। तिहाड़ जेल की प्रमुख होने नाते वहां के कैदियों के लिए बहुत से ऐसे कामों की शुरूआत की थी, जो सजा समाप्ति के बाद उनके पुनर्वास के लिए महत्वपूर्ण है। भाजपा में शामिल होने के दौरान उन्होंने कहा कि दिल्ली में सुरक्षा, शिक्षा और विकास उनकी प्राथमिकता में शामिल है।

07-02-2015

किरण और केजरीवाल, दोनों ही ईमानदार छवि के व्यक्तित्व माने जाते हैं। दोनों ने अपनी पढ़ाई आईआईटी से की और दोनों ने ही प्रशासनिक सेवाओं में अपना योगदान दिया। केजरीवाल ने केन्द्रीय राजस्व सेवा में 5 साल बिताए तो किरण ने पुलिस सेवा में 40 साल। दोनों को ही रेमेन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। किरण जहां शांत और सख्त व्यक्तित्व की मालकिन हैं, वहीं केजरीवाल धरना-प्रदर्शन में ज्यादा विश्वास रखते हैं। वे खुद को अराजक भी बता चुके हैं। किरण बेदी स्पष्ट सोच, द्रुतगति से कार्य को अंजाम देने वाली कद्दावर और ईमानदार छवि की व्यक्तित्व मानी जाती हैं। पुलिस सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद वो अपने दो एनजीओ के जरिए महिलाओं और बच्चों के लिए लगातार काम करती रही हैं। शायद केजरीवाल की समकक्ष उनसे ऊंचे पायदान पर खड़े होने की काबिलियत ही है कि हर्षवद्र्धन, सतीश उपाध्याय जैसे दिल्ली प्रदेश के तमाम बड़े नेताओं की मौजूदगी के बावजूद किरण बेदी को भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है। हालांकि इस निर्णय के खिलाफ भाजपा में भी दबे-छुपे नराजगी के सुर उभरे, लेकिन केन्द्रीय नेतृत्व के निर्णय के सामने किसी की एक भी नहीं चली।

टिकट बंटवारे पर हंगामा
केन्द्र में मोदी और शाह की जोड़ी आने के बाद ही यह तय हो गया था कि टिकट बंटवारे से लेकर संगठन के हर ढांचे में संघ और पार्टी के नेताओं को तरजीह दी जाएगी। हालांकि लोकसभा चुनावों में भाजपा को बहुमत दिलाने के नाम पर पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज कर दूसरे दलों से आए और पार्टी में नए-नए शामिल हुए लोगों को तरजीह देते हुए उन्हें टिकट भी दिया गया और मंत्री भी बनाया गया। लेकिन केन्द्र में मोदी के नेतृत्व में बहुमत की सरकार बनने के बाद हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद वहां संघ और पार्टी नेताओं को अहम जिम्मेदारी मिलता देखकर दिल्ली के नेताओं को भी लगा था कि पार्टी के पुराने नेताओं की नजरअंदाजगी नहीं होगी। लेकिन सतीश उपाध्याय, हर्षवद्र्धन, जगदीश मुखी जैसे नेताओं के होन के बावजूद किरण बेदी जैसी कभी भाजपा की मुखर आलोचक को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाना पार्टी के नेताओं को नागवार गुजरा।

अंतर्विरोध कुछ ऐसा था कि पार्टी मुख्यालय में ही भाजपा कार्यकर्ताओं ने अमित शाह के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। अंत में सतीश उपाध्याय को खुद ही आगे आकर सफाई देनी पड़ी कि किरण बेदी को लाकर भाजपा नेतृत्व ने बेहतर रणनीति का परिचय दिया है। बात यहीं खत्म हो जाती तो गनीमत थी। पार्टी ने बिन्नी जैसे नए नवेले को पार्टी का टिकट तो दे दिया, लेकिन सतीश उपाध्याय का ही टिकट काट दिया। सतीश उपाध्याय महरोली से टिकट के दावेदार थे, लेकिन यहां से एमसीडी की महापौर रही सरिता चौधरी को भाजपा ने मैदान में उतार दिया। अपने समर्थकों के हंगामें को देखकर सतीश उपाध्याय को मीडिया में बयान जारी करना पड़ा कि चुनाव नहीं लडऩे का उनका अपना फैसला था। टिकट बंटवारे के बाद फैली अराजकता के बीच उन्होंने कहा कि वे सभी 70 सीटों के लिए काम करेंगे। वहीं 2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के टिकट पर ओखला सीट से लड़े धीर सिंह विधूड़ी ने टिकट कटने से नाराज होकर अपने समर्थकों सहित पार्टी से त्यागपत्र दे दिया। विधूड़ी ने आरोप लगाया कि जिन्हें भाजपा ने टिकट दिया है, उन पर जमीन कब्जा करने का आरोप है।

सतीश उपाध्याय के समर्थकों के हंगामें को केन्द्रीय नेतृत्व ने गंभीरता से लिया है। उन्हें अपने समर्थकों को शांत रखने की हिदायत दी गई है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कड़ा रूख अपनाते हुए कहा कि पार्टी में अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। साथ ही संघ के कुछ नेता भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को मनाने में लग गए।

कमोबेश यही स्थिति आआपा की भी है। पार्टी में टिकट बंटवारे को लेकर आआपा के नेता भी खासे विद्रोही बन चुके हैं। आआपा द्वारा महरोली और मुंडका के अपने उम्मीदवारों का नाम बदलते ही पार्टी में जैसे तूफान मच गया। इसके विरोध में केजरीवाल के कौशांबी स्थित पार्टी कार्यालय के सामने पार्टी कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन कर दिया। महरोली के आआपा उम्मीदवार रहे गोवद्र्धन सिंह और मुंडका के राजिंदर सिंह के समर्थकों ने हंगामा कर दिया। पार्टी ने महरोली से नरेश यादव को और मुंडका से सुखबीर दलाल को अपना प्रत्याशी बनाया है। गोवद्र्धन सिंह पर पार्टी ने आरोप लगाया है कि हाल ही में प्रधानमंत्री की रामलीला मैदान में हुई रैली में उनके रिश्तेदार लोगों को बसों में भरकर सभास्थल पर ले गए थे। दूसरी तरफ गोवद्र्धन सिंह का आरोप है कि मनीष सिसोदिया ने उनका टिकट काटकर दो करोड़ में उसे बेचा है। उनका दावा है कि इसकी रिकॉर्डिंग उनके पास मौजूद है। हालांकि मनीष सिसोदिया ने इस आरोप का खंडन किया है।

मुद्दों पर रस्साकशी
एक तरफ किरण बेदी ने दिल्ली को विश्वस्तरीय राजधानी बनाने की बात कही है तो दूसरी तरफ यहां की सुरक्षा और शिक्षा प्रणाली में सुधार करने की भी बात कही है। नामांकन से पहले बेदी ने कहा कि दिल्ली का सुरक्षा इंडेक्स तय होगा। साथ ही दिल्ली सरकार के हर विभाग का ह्वाईट पेपर भी जारी किया जाएगा। उन्होंने कहा कि अगर वे सीएम बनती हैं तो उनकी सरकार प्रतिदिन सुबह गरीबों से मिलकर उनकी समस्याएं सुनेगी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भाजपा की सरकार बनने के बाद सीएम पद के साथ गृह और शिक्षा विभाग भी वे स्वयं अपने पास रखेगी।

बेदी के इस बयान पर कांग्रेस के प्रचार अभियान के प्रमुख अजय माकन ने चुटकी लेते हुए कहा कि श्वेत पत्र निकालने से कुछ नहीं होता। बेदी के पास प्रशासन और नीति निर्माण का कोई अनुभव नहीं है।

आआपा ने दिल्ली के चुनावी दंगल के लिए 14 मुद्दों को प्राथमिकता दी है। इनमें महिला सुरक्षा, जनलोकपाल बिल, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा, बिजली-पानी का मुद्दा, भ्रष्टाचार का खात्मा आदि प्रमुख हैं। ये वही मुद्दे हैं जिनके सहारे दिल्ली की तख्त पर बैठने के बाद केजरीवाल 49 दिनों में ही भाग खड़े हुए थे। एक बार फिर उन्हीं मुद्दों को आआपा ने अपना प्रमुख एजेंडा बनाया है।

मोदी बनाम केजरीवाल
रामलीला मैदान में 10 जनवरी को प्रधानमंत्री मोदी द्वारा परोक्ष रूप से केजरीवाल को अराजक कहने के साथ ही यह साफ हो गया था कि यह चुनाव मोदी बनाम केजरीवाल होने वाला है, क्योंकि इसके पहले भी लोकसभा और सभी विधानसभा चुनावों में मोदी के नाम को आगे रखकर ही भाजपा ने चुनाव लड़ा था। दिल्ली भाजपा में भी ऐसा कोई चेहरा नहीं था, जिसके नाम को आगे कर मोदी लहर से फायदा उठाया जा सके और दुर्दिन में मोदी का चेहरा बचाया जा सके। ऐसे में रणनीति के धुरंधर माने जाने वाले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मोदी और केजरीवाल के बीच में बेदी के रूप में एक ऐसा चेहरा ला खड़ा किया, जो हार कि स्थिति में मोदी के दामन को दागदार होने से बचा तो सके, लेकिन जीत की स्थिति में भाजपा को एक बेहतर प्रशासन देने में सक्षम साबित हो सके। जब पुराने साथी रहे दो कद्दावर योद्धा मैदान में होते हैं तो जीत और हार की जिम्मेवारी भी उनके स्वयं के कंधों पर होती है, न कि सेनापति के।

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