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फिल्म कैमरा खरीदने वाले पहले भारतीय थे हीरालाल सेन

भारत के दो महान छायाकर हरिश्चंद्र सखाराम भाटवड़ेकर (सावे दादा) और हीरालाल सेन लूमिएर बंधुओं के दिखाए रास्ते पर ही चले। दोनों ही कैमरे की कला में निपुण थे। लेकिन कैमरे के रचनात्मक इस्तेमाल से मौलिक कहानी भी कही जा सकती है, इस तथ्य से उनका साक्षात्कार बाद में हो पाया।

सन् 1896 में लूमिएर बंधुओं के लघु फिल्मों के प्रारंभिक प्रदर्शनों के बाद भारत में भी इस नए माध्यम की ओर बहुत से युवक आकर्षित हुए। उन युवकों में हीरालाल सेन भी थे। सेन का जन्म ढाका से 80 किलोमीटर दूर माणिकगंज गांव में एक जमींदार परिवार में 1866 में हुआ था।

उस समय तक सेन स्टिल फोटोग्राफी की कला में निपुण हो चुके थे। कोलकाता में चलती-फिरती फिल्मों का पहला प्रदर्शन जब 1897 में हुआ तब उसे देखकर हीरालाल सेन में भी फिल्में बनाने की रुचि पैदा हुई। 1898 तक हीरालाल सेन कई छायाचित्र, स्टिल फोटोग्राफी की विभिन्न अखिल भारतीय प्रतियोगिताओं और प्रदर्शनियों में पुरस्कृत व सम्मानित हो चुके थे। सन् 1882 में 16 वर्ष की आयु में ही उनके एक फोटोग्राफ को ‘सूर्यास्त दर्शाने वाले सर्वोत्तम फोटोग्राफ’ के लिए स्वर्ण पदक मिल चुका था।

फिल्म देखने के बाद हीरालाल सेन पर नई धुन सवार हो गई। संयोग से उन्हें कुछ पुरानी पत्रिकाएं मिल गईं और 1898 के अप्रैल में उन्होंने लंदन से एक फिल्म प्रोजेक्टर भी मंगा लिया। सेन ने चार-आठ आने के टिकट बेचकर पैसे कमाने के तरीके को छोड़कर एक नए तरीके को अपनाया। वह अपनी फिल्में लेकर बिहार, ओडिशा और बंगाल की दूर- दराज की रियासतों में घूमने लगे और वहां के राजाओं व जमींदारों के परिवारों और दरबारियों के लिए फिल्मों के प्रदर्शन आयोजित करने लगे। देश भर में फैली रियासतों तक पहुंचकर फिल्म दिखाने के इस व्यवसाय में कमाई की बड़ी संभावनाएं देखकर बंगाल के कई युवक इस काम में जुट गए। नारायण बैसाख ने लंदन बाइस्कोप, अनिल चटर्जी ने इंपीरियल बाइस्कोप, प्रमथनाथ गांगुली ने ओरियंटल बाइस्कोप और सत्यचरण घोष ने बंगाल बाइस्कोप नाम की कंपनियां बनाकर इस धंधे में कदम रखे। ये लोग विदेशों से फिल्में मंगाकर उनका प्रदर्शन करते थे।

सेन चूंकि एक कुशल फोटोग्राफर भी थे, इसलिए फिल्मों के प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहे। जल्दी ही उन्हें फिल्म निर्माण की कला को नजदीक से देखने का मौका मिल गया। 1900 में फ्रांस की पाथे कंपनी के कई कैमरामैन अपने उपकरणों के साथ कोलकाता पहुंचे और वहां के जनजीवन के जीवंत दृश्यों का फिल्मांकन करने लगे। हीरालाल सेन इनके सहायक बनकर इनके साथ घूमने लगे। कहा जाता है कि कुछ दिन बाद पाथे के कैमरामैन ने सेन को भी एक कैमरा देकर गंगाघाट के दृश्यों, मुर्गों की लड़ाई और विभिन्न रास्तों से गुजरती भीड़ के दृश्य फिल्माने के लिए भेज दिया। इस अनुभव ने सेन में आत्मविश्वास जगाया। बाद में सेन ने अपने लिए अलग से एक कैमरा मंगा लिया।

हीरालाल सेन पहले भारतीय थे, जिन्होंने फ्रांस की पाथे कंपनी का कैमरा खरीदा था। पाथे बंधु उस समय फिल्म वितरण के अंतरराष्ट्रीय बाजार में लूमिएर बंधुओं से कहीं आगे निकल चुके थे। चाल्र्स पाथे ने अपने तीन भाइयों के साथ मिलकर 1896 में फिल्म कैमरे बनाने का काम शुरू कर दिया था। कुछ ही साल में फिल्मांकन और उससे संबंधित अन्य सामग्री के निर्माण में पाथे बंधु विश्व में श्रेष्ठ माने जाने लगे। वे न केवल कैमरे और प्रोजेक्टर बना रहे थे, बल्कि जॉर्ज ईस्टमैन से पेटेंट लेकर कच्ची फिल्म भी बनाने लगे। पाथे कंपनी खुद भी बहुत सी फिल्मों का निर्माण कर रही थी। दुनिया भर में उनके थिएटर थे जहां सिर्फ उनकी कंपनी की बनाई फिल्में ही दिखाई जाती थीं।

हीरालाल सेन ने 1898 मतिलाल सेन, देबकीलाल सेन और भोलानाथ गुप्ता के साथ मिलकर रॉयल बाइस्कोप कंपनी बनाई।

पाथे कंपनी के कैमरे से हीरालाल सेन ने सन् 1902 से सन् 1905 तक कम से कम 20 नाटकों के दृश्यों का फिल्मांकन किया। और इन्हें रॉयल बाइस्कोप कंपनी के बैनर तले प्रदर्शित किया। अपने सिनेमा के विकास को सही परिपे्रक्ष्य में देखने के लिए तटस्थ रहकर तथ्यों की पहचान करना जरूरी है। सुपरिचित फिल्मकार बासु भट्टाचार्य ने लिखा है, ‘सन् 1900 में फ्रांस की पाथे कंपनी के कुछ कैमरामैन कोलकाता पहुंचे। सेन ने उनसे कैमरे के बारे में जानकारी हासिल की और एक कैमरा स्वयं खरीदने का प्रयत्न किया। इस प्रयास में असफल होकर सेन ने स्वयं कैमरा बनाने का निर्णय किया और बना डाला। इस स्वनिर्मित कैमरे से सेन ने कई शॉट लिए।’

बंगाली फिल्मों के सुप्रसिद्ध अभिनेता प्रभात मुखर्जी के अनुसार, ‘सन् 1903 में सेन ने दो फिल्में (नाटकों और स्टेज शो का फिल्मांकन करके) बनाईं। ये दोनों फिल्में उस समय की विदेशी फिल्मों की तरह केवल 10 मिनट में ही समाप्त नहीं हो जाती थीं, बल्कि एक-एक घंटे चलती थीं। दोनों में ही सिनेमा माध्यम के नए प्रयोग किए गए थे जैसे क्लोजअप, पैनिंग, टिल्ट आदि। सेन ने न केवल स्वाधीनता को महत्व दिया, बल्कि इस नए माध्यम की ओर अन्य रचनात्मक प्रतिभाओं का ध्यान खींच पाने में सफलता हासिल की। इन फिल्मों को उन्होंने अपनी नवस्थापित रॉयल बाइस्कोप कंपनी के अंतर्गत प्रदर्शित किया।

सन् 1904 में हीरालाल सेन ने ‘अलीबाबा और चालीस चोर’ नाम कि फिल्म बनाई। यह फिल्म दो घंटे से अधिक समय तक चलती थी। इस फिल्म में सेन ने कई अभिनव प्रयोग किए। सन् 1906 तक सेन कई कथा फिल्में बना चुके थे और कई नाटकों के फिल्मी रूपांतरण पेश कर चुके थे। इसी वर्ष उन्होंने एक समाचार वृत्तचित्र ‘बंगाल के विभाजन का आंदोलन’ बनाया। इस फिल्म को इंग्लैंड भी भेजा गया।

यह सब लिखते समय मुखर्जी साहब निश्चिंत थे कि उनकी बातों को गलत साबित नहीं किया जा सकता, क्योंकि उन्हीं के शब्दों में, ‘सन् 1917 में हीरालाल सेन की मृत्य से कुछ दिन पूर्व उनके भाई के गोदाम में आग लग गई और हीरालाल सेन द्वारा निर्मित सभी फिल्में जलकर राख हो गईं।’

इन अतिशयोक्ति पूर्ण वक्तव्यों से हीरालाल सेन का महत्व कम नहीं होता। इसमें कोई संदेह नहीं है कि पूर्वमंचित नाटकों का फिल्मांकन सफलतापूर्वक किया था। इसकी गवाही कोलकाता की अमृत बाजार पत्रिका के फरवरी 1901 के अंक में छपा यह विज्ञापन देता है : ‘हमारे विश्वविख्यात नाटकों अलीबाबा, बुद्ध, सीता-राम आदि को अति उत्तम चलचित्रों के रूप में देखिए। ये चलचित्र हमारे मित्रों और संरक्षकों को चकित और मुग्ध कर देंगे।’

कोलकाता के टाउन हॉल में 22 सितंबर 1905 को स्वदेशी के प्रचार के लिए और बंगाल के विभाजन के विरुद्ध एक जोरदार प्रदर्शन हुआ। इसे हीरालाल सेन ने फिल्मांकित करके एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म बनाई। इसे भारत की पहली राजनीतिक फिल्म माना जा सकता है। सन् 1912 में हिज मैजेस्टी किंग जॉर्ज पंचम और महारानी मेरी के आगमन का फिल्मांकन भी हीरालाल सेन ने सफलतापूर्वक किया था। यह एक महत्वाकांक्षी फिल्म थी। सन् 1913 में रॉयल बाइस्कोप कंपनी आर्थिक संकट के कारण बंद हो गई। उस समय से ही हीरालाल सेन बीमार रहने लगे थे। जीवन के अंतिम वर्षों में वह गले के कैंसर से पीडि़त रहे।

भारत के दो महान छायाकर और प्रदर्शक हरिश्चंद्र सखाराम भाटवड़ेकर (सावे दादा) और हीरालाल सेन लूमिएर बंधुओं के दिखाए रास्ते पर ही चले। दोनों ही यथार्थ घटनाओं को अपने कैमरे से कैद कर लेने की कला में निपुण थे। कैमरे के रचनात्मक इस्तेमाल के द्वारा एक मौलिक कहानी भी कही जा सकती है, इस तथ्य से उनका साक्षात्कार नहीं हो पाया था।

इसी बीच सिनेमा में जो दूसरा रास्ता खोज लिया था, वह लूमिएर बंधुओं के बताए रास्ते के ठीक विपरीत दिशा में ले जाता था, क्योंकि लूमिएर बंधुओं के दिखाए रास्ते पर चलकर उस दिशा में जा पाना ही असंभव था। उस राह पर चलने के लिए अच्छा कैमरामैन होना ही पर्याप्त नहीं था। सिनेमा की उस संभावना का द्वार एक जादूगर ही खोल सकता था। विश्व सिनेमा में यह काम जॉर्ज मेलिए ने किया था और भारतीय सिनेमा में इस जादूगर की भूमिका दादासाहब फालके ने निभाई।

मनमोहन चड्ढा

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