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सांप्रदायिक दंगों का अर्थ-गणित

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की लगातार पिछड़ती अर्थव्यवस्था भी सांप्रदायिक तनाव पैदा होने का एक बड़ा कारण हो सकती है। कई समाज विज्ञानी दंगों और आर्थिक विकास में सीधा रिश्ता देखते हैं। बसपा और सपा सरकारों के तहत यह कृषि आधारित क्षेत्र बिना उद्योगों के लगातार पिछड़ता गया है। इसीलिए छोटी-मोटी घटनाओं की हल्की-सी चिंगारी भी विकराल रूप लेने लगी है। ऐसे में चुनावी फसल काटने के लिए सियासी दल वोट बैंक के लिए जहर घोल रहे हैं।

गृह मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार 2005-2013 (31 अगस्त तक) के बीच देश भर में कुल 6444 सांप्रदायिक दंगे हुए, जिनमें 1006 लोग मारे गए। इस दौरान अकेले उत्तर प्रदेश में 1045 दंगे दर्ज किए गए, जिनमें सरकार के अनुसार 260 लोग मारे गए। सांप्रदायिक दंगों की संक्चया के हिसाब से महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश का स्थान उत्तर प्रदेश से ऊपर है, लेकिन वहां मरने वालों की संक्चया काफी कम है। इसका अर्थ यह हुआ कि यहां के दंगे भीषण होते हैं और इसलिए इनका घाव भी गहरा होता है। इसका कारण है पश्चिमी उत्तर प्रदेश का आर्थिक विकास के मोर्चे पर निरंतर पिछड़ते जाना। यह इलाका अपनी उपजाऊ मिट्टी और सिंचाई के साधनों के कारण सदियों से संपन्न रहा है, लेकिन जोत का आकार कम हो जाने तथा उद्योग-धंधे न लगने से स्थिति अब बदल चुकी है। केंद्र और राज्य सरकार ने भी इस क्षेत्र के विकास की कोई ठोस पहल नहीं की है।

चौधरी चरण सिंह के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ऐसा कोई कद्दावर नेता नहीं हुआ, जो राष्ट्रीय या राज्य की राजनीति को प्रभावित करने का दम रखता हो। सामंती मूल्यों और जाति-धर्म की राजनीति को हवा देने वालों ने यहां कोई जन-आंदोलन पनपने नहीं दिया। पिछले बीस साल में जात-बिरादरी और धर्म का राजनीति से ऐसा घालमेल हुआ कि राज्य में सच्ची सोच रखने वाले सारे राजनीतिक और सामाजिक लोग किनारे लगा दिए गए। अपराधी, दलाल और ठेकेदार किस्म के लोग राजनीति पर हावी हो गए। राजनीति उनके लिए जन-सेवा नहीं, सत्ता सुख भोगने और पैसा कमाने का जरिया मात्र है। नतीजा सामने है।

समाज शास्त्री एंजिली थामस और अर्नेस्ट जान ने 1950 से 1995 के बीच भारत में हुए सांप्रदायिक दंगों का गहन अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला कि किसी इलाके के आर्थिक विकास की गति धीमी होने से वहां सांप्रदायिक दंगे होने की संभावना बढ़ जाती है। उनके अनुसार विकास दर में एक फीसदी इजाफे से दंगे पांच प्रतिशत तक घट जाते हैं। इसकी पुष्टि केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के एक ताजा बयान से भी होती है। उनके अनुसार पिछले वर्ष देश भर में सांप्रदायिक टकराव के 410 केस दर्ज हुए, जबकि इस साल 31 अगस्त तक (8 माह में) यह संक्चया बढ़कर 451 पर पहुंच चुकी है। उल्लेखनीय है कि पिछले दो साल से देश की आर्थिक विकास दर निरंतर कम हो रही है। अब तो यह घटकर लगभग चार फीसदी रह गई है।

खुली अर्थव्यवस्था अपनाने के कुछ वर्ष बाद देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में उछाला तो आया, लेकिन इसके साथ ही अमीर और गरीब के बीच की खाई भी चौड़ी होती गई। नेशनल सैंपल सर्वे की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 2000 में जहां एक अमीर आदमी का खर्च गरीब के मुकाबले 12 गुना ज्यादा था, वहीं 2012 में यह बढ़कर 15 गुना हो गया। इस अध्ययन से यह भ्रम भी टूट गया कि गांवों के मुकाबले शहरों में महंगाई ज्यादा होती है। सच यह है कि आज गांवों में दाल, सब्जी, फल, तेल, दूध, चीनी और कपड़े जैसे जरूरी सामान की कीमत शहरों की अपेक्षा अधिक है। नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन की पुस्तक ‘इंडिया एंड इट्स कंट्राडिक्शन’ में सरकार के विकास के दावों और पैमानों की जमकर बखिया उधेड़ी गई है। सेन
के अनुसार केवल जीडीपी को किसी देश की खुशहाली का पैमाना नहीं माना जा सकता।

उत्तर प्रदेश आज देश के पिछड़े राज्यों में शुमार है। शिक्षा, स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर के मोर्चे पर उत्तर प्रदेश की स्थिति काफी कमजोर है और दंगों की सबसे ज्यादा वारदात वहीं हो रही हैं। अखिलेश यादव ने पिछले साल मार्च माह में मुक्चयमंत्री पद की शपथ ली थी। उसके बाद से देश के सबसे सघन आबादी के इस सूबे में 27 से ज्यादा दंगे हो चुके हैं। इन दंगों में दर्जनों लोग मारे जा चुके हैं, सैकड़ों घायल हुए हैं और करोड़ों रुपए की संपत्ति का नुकसान हुआ है। मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत और मेरठ के ताजा दंगों में खतरनाक बात यह है कि झगड़ा शहर या कस्बों में न होकर गांवों में फैल चुका है। ऐसे में जान-माल के नुकसान का सही-सही अनुमान लगाना और दंगों पर काबू पाना कठिन है। भले ही फौज और पुलिस के बल पर सरकार इस स्थिति पर तत्काल नियंत्रण कर ले, लेकिन गांव-देहात में लंबे समय तक शांति बनाए रखना उसके बस की बात नहीं है।

उत्तर प्रदेश में जब से बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी आई हैं, इस सूबे में सांप्रदायिक और जातीय राजनीति अपने चरम पर है। जनता ही नहीं राज्य की नौकरशाही भी जाति और धर्म के नाम पर बंट गई है। गंगा-जमुना की तहजीब पर मानो बारूद बिछा दी गई है। 27 अगस्त को शामली में एक लड़की से छेड़छाड़ की घटना ने तो बारूद को आग दिखाने का काम भर किया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट और मुसलमानों में सदियों से भाईचारे का रिश्ता रहा है। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ 1857 में आजादी की पहली लड़ाई में शोरम की पंचायत ने ऐतिहासिक निर्णय लिया था। उस फैसले से हिंदू-मुसलमान ने समान रूप से शिरकत की थी। महेंद्र सिंह टिकैत के किसान आंदोलन में भी जाट और मुसलमान किसानों (मूले) ने कंधे से कंधा मिलाकर भाग लिया था। वे आज कैसे एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए हैं?

दिल्ली से सटे नोएडा और गाजियाबाद को छोड़कर पश्चिमी उत्तर

प्रदेश के अन्य सभी जिले आज भी औद्योगिक दृष्टि से काफी पिछड़े हैं। अब इस पिछड़ेपन का असर सामाजिक रिश्तों पर पडऩे लगा है। आर्थिक तंगी ने सामाजिक रिश्तों में कड़वाहट घोल दी है। रही सही कसर राजनीतिक पार्टियों ने पूरी कर दी है। अगले साल के शुरू में होने वाले लोकसभा चुनावों को लेकर सभी दलों की नजर उत्तर प्रदेश पर टिकी है। 80 सांसदों के भाग्य का फैसला इसी राज्य से होता है। अब तक जो हालात हैं उनमें किसी एक दल या गठबंधन को अगले चुनाव में बहुमत मिलना कठिन दिखता है। ऐसे में एक-एक सीट के लिए गला काट संघर्ष होगा। उत्तर प्रदेश में तो अभी से घमासान मचा है। भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का अपना-अपना तय वोट बैंक है, जिसे बढ़ाने के लिए हर प्रकार का हथकंडा अपनाया जा रहा है। सांप्रदायिक दंगों से वोटों का ध्रुवीकरण तेज हो जाता है। 1992 में बाबरी मस्जिद ढहने के बाद हुए दंगे इसकी पुष्टि करते हैं। इन दंगों के बाद भाजपा ने उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक सीट जीत कर केंद्र में सरकार बनाई थी।

आर्थिक दृष्टि से पिछड़ चुके पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सामाजिक परिवेश में चुनावी लाभ के लिए अधिसंक्चय राजनीतिक दल जहर घोल रहे हैं। जाने-अनजाने जनता उनके हाथ की कठपुतली बन गई है। नेता भूल जाते हैं कि चुनाव तो हर पांच साल में होते हैं, लेकिन सदियों का रिश्ता टूट जाने के बाद जुडऩा मुश्किल हो जाता है। टूटे रिश्ते को जोडऩे के लिए तुरंत सामाजिक पहल होनी चाहिए। यह काम सर्वखाप पंचायत ही कर सकती हैं। इससे भी जरूरी है इलाके के आर्थिक विकास का रोडमैप बनाना। यह काम केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर करना चाहिए।

 

धर्मेंद्रपाल सिंह

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