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‘रामसेतु’ तोडऩे पर क्यों तुला है केंद्र

रामसेतु का विघ्वंस करने की जगह केन्द्र सरकार को रामसेतु को धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित करने की योजना बनानी चाहिए। सेतुसमुद्रम परियोजना से कई लाख गुना आय रामसेतु को धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित करने से होगी। अगर हम आस्था व गौरव के प्रतीकों को विकास के प्रसंग से जोड़ कर देखेंगे तो कल को कोई महात्मा गांधी की समाधि स्थल राजघाट, संसद भवन, लाल किला आदि का विध्वंस कर तरह-तरह के व्यापारिक प्रतिष्ठानों व विकास योजनाओं से लाभ कमाने की भी तो बात कर सकती है।

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में नया हलफनामा देकर फिर सेतु समुद्रम परियोजना पर आगे बढऩे यानी रामसेतु को तोडऩे का इरादा जाहिर किया है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिये हलफनामे में पचौरी कमेटी की उस रिपोर्ट को भी खारिज कर दिया है जिसमें रामसेतु को पर्यावरण के दृष्टिकोण से संरक्षित करने की बात कही गई थी और रामसेतु के विध्वंस से उत्पन्न होने वाली विकराल समस्या के प्रति सचेत किया गया था। सरकार विकास और व्यापारिक लाभ के लिए हिंदुओं की आस्था के प्रतीक और पर्यावरण के दृष्टिकोण ही नहीं, बल्कि सामरिक दृष्टि से भी अति महत्वपूर्ण रामसेतु को तोडऩे पर तुली हुई है।

विकास और व्यापार के सैंकड़ों, लाखों, करोड़ों रास्ते हैं। हमें रामसेतु को विकास-व्यापार के ही केंद्र बिन्दु में रखकर देखने तक सीमित क्यों होना चाहिए? केंद्र सरकार और कांग्रेस की यह विक्षिप्त नीति भाजपा के लिए ऑक्सीजन का काम करेगी? दक्षिण में भाजपा और नरेंद्र मोदी को नई जमीन तैयार करने का अवसर ही दिया जा रहा है? लेकिन विकास और पैसे कमाने के नाम पर अपने गौरव-आस्था के प्रतीक चिन्हों-स्थानों को ध्वंस कर देना कहां की समझदारी है। हमें विकास के नाम पर देश की सुरक्षा, पर्यावरण से खिलवाड़ कतई नहीं किया जाना चाहिए। यही नहीं, रामसेतु तोड़ कर हम समुद्री संकट और समुद्री तूफान को आमंत्रण देने की तैयारी कर रहे हैं।

आस्था, विज्ञान, सुरक्षा और पर्यावरण जैसे कई प्रश्न हैं जिससे हम न तो मुंह मोड़ सकते हैं और न ही इन प्रश्नों को खारिज कर सकते हैं। अगर हम सभी आस्था व गौरव के प्रतीकों को विकास के प्रसंग से जोड़ कर देखेंगे तो देश के अंदर आस्था रखने या गर्व करने के लिए बचेगा क्या? कल कोई सरकार कहेगी कि राजघाट पर महात्मा गांधी की समाधि गैरजरूरी है। महात्मा गांधी की समाधि की वजह से दर्जनों एकड़ भूमि खाली पड़ी हुई है। सो, महात्मा गांधी की समाधि को तोड़ कर वहां एक आवासीय या व्यावसायिक कांप्लेक्स बना दिया जाना चाहिए। इससे एक तो विकास होगा और दूसरे, सरकार के खाते में करोड़ों-अरबों रुपए जमा होंगे। कल कोई सरकार या समूह यह कह सकता है कि देश के संसद भवन को व्यापारिक कांप्लेक्स बना दिया जाना चाहिए और संसद भवन में व्यापारिक प्रतिष्ठानों को किराये पर दे दिया जाना चाहिए, इससे सरकार को एक बड़ा राजस्व मिलेगा, जिससे विकास कार्यों को गति मिलेगी। इसके बदले कोई छोटी-मोटी जगह पर स्कूल जैसा भवन बना दिया जाए, जहां बैठ कर सांसद बहस करें या कानून बनाएं। गंगा-यमुना जैसी तमाम नदियों को कोका कोला-पेप्सी जैसी कंपनियों को दे देना चाहिए, वे व्यापार करेंगी और उनके व्यापार से देश को लांभ मिलेगा। लाल किले पर प्रधानमंत्री द्वारा झंडा फहराने की क्या आवश्यकता है, लाल किले में वियर-बार खोल देना चाहिए ताकि सरकार को राजस्व हासिल हो सके, हिमालय को तोड़कर करोड़ों हाउसिंग कॉलोनियां बसा देनी चाहिए ताकि विकास का मार्ग प्रशस्त हो और सरकार को राजस्व प्राप्त हो। देश के तमाम धर्मस्थलों और गौरव के चिन्हों व प्रतीकों को लेकर ऐसे ही प्रश्न खड़े हो सकते हैं?

आस्था और गौरव के प्रश्न को हम थोड़ी देर के लिए शिथिल भी कर दें तो वैज्ञानिक ढंग से सेतु समुद्रम परियोजना पर सवाल उठे हैं। सेतुसमुद्रम परियोजना की आयु व रखरखाव पर अवैज्ञानिक दृष्टिकोण स्थापित करने की कोशिश हो रही है। आरके पचौरी कमेटी ने साफ तौर पर कहा है कि यह सेतुसमुद्रम परियोजना तकनीकी और पर्यावरण की कसौटी पर भी हानिकारक है। थोड़े लाभ के लालच में ढेर सारी समस्याओं की खतरनाक जमीन खड़ी करने की कोशिश हो रही है। सेतुसमुद्रम परियोजना की लंबाई 167 किलोमीटर, चौड़ाई 30 मीटर और गहराई 12 मीटर रखी गई है। आरके पचौरी कमेटी ने कहा है कि यह परियोजना गले की फांस होगी, हमेशा जहाजों के फंसने की जड़ बनेगी, अबाध तौर पर पानी के जहाजों के आवागमन संभव नहीं हो सकता है। तेल और गैसों के रिसाव का खतरा हमेशा बना रहेगा। तेल और गैसों के रिसाव से समुद्री जीवों के अस्तित्व पर भी खतरा होगा। समुद्र की पूरी पारिस्थितिकी संकट में आ जाएगी।

समुद्री पारिस्थितिकी असंतुलन को आमंत्रण देना निश्चित रूप से आत्मघाती कदम है। इतना ही नहीं, समुद्र के आसपास रहने वाली आबादी के जीवन को भी कई बीमारियों से ग्रसित करेगा।

इस परियोजना की आयु पर भी सवाल है। निष्कर्ष यह है कि सेतुसमुद्ररम परियोजना की आयु कम होने से दिखाये जा रहे दिवास्वप्न का पूरा होना संभव नहीं है। सच तो यह है कि रामसेतु को तोडऩे-विध्वंस करने के लिए विकास और उन्नति के ऐसे-ऐसे सपने दिखाये जा रहे हैं, दावे किये जा रहे हैं जिसकी उम्मीद ही नहीं बनती है। भविष्य में ये सभी दावे और सपने झूठे साबित होंगे।

धार्मिक पर्यटन और परमाणु संपदा के रूप में विख्यात थोरियम की कसौटी को यहां देखते हैं। पहले धार्मिक पर्यटन पर विचार करते हैं। रामेश्वरम स्थित समुद्र तट पर प्रत्येक साल लाखों-करोड़ों लोग देश-विदेश से डुबकी लगाने आते हैं। रामसेतु के पास डुबकी लगाने और मुक्ति की आस्था है। सरकार अगर देश-विदेश में रामसेतु को धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित करे और स्थापित करने की चाक-चौबंद कोशिश करें तो निश्चित तौर पर यह आर्थिक प्रगति का एक बड़ा माध्यम हो सकता है। दुनिया भर में पर्यटन अर्थव्यस्वथा ख्याति अर्जित कर रही है। फिर हमें क्यों नहीं इस नई आर्थिक अर्थव्यवस्था को मजबूत देने वाले आधार पर सोचना चाहिए।

अगर सरकार रामसेतु को धार्मिक पर्यटन के रूप में प्रचारित-प्रसारित करेगी तो उन पर हिंदू समर्थक होने या फिर हिन्दुत्व की महिमा मंडित करने के आरोप लगेंगे और उनकी तुष्टीकरण की नीति विध्वंस होगी, इस खतरे से कौन खेलना चाहेगा? यह भी हमें ध्यान रखना चाहिए कि रामसेतु के आसपास समुद्री खनिज संपदाओं की ही खाजाना नहीं छिपा हुआ है,बल्कि थोरियम जैसे अति महत्वपूर्ण संपदा भी है।

सबसे पहले तो किस प्रकार के हथकंडे अपनाये गये हैं, वह भी आप देख सकते हैं। यहां तक कि राम के

अस्तित्व को ही नकारने की कोशिश हुई। यह कोशिश कांग्रेस की सरकार ही नहीं, बल्कि तमिलनाडु की तत्कालीन करुणानिधि सरकार की भी थी। तमिलनाडु की करुणानिधि सरकार की विदाई हो गयी। केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा था कि राम भगवान थे, इसका कोई प्रमाणित आधार नहीं है, राम एक काल्पनिक शख्सियत हैं और मिथक हैं। जब इस पर हंगामा हुआ तब वह हलफनामा केंद्र की कांग्रेसी सरकार वापस लेने के लिए बाध्य हुई थी। हथकंडे यहीं तक सीमित नहीं थे। यह भी कहा गया कि रामसेतु का कोई अस्तित्व ही नहीं है, सिर्फ पौराणिक मिथक भर है। इस पर वैज्ञानिक तथ्य खोजे गए। अमेरिकी अंतरिक्ष संगठन ‘नासा’ ने अपने वैज्ञानिक सर्वेक्षण से प्रमाणित किया है कि रामेश्वरम और श्रीलंका के बीच समुद्र में एक ऐसा पुल है जो सदियों पुराना है। इतना ही नहीं, यह पुल समुद्री गतिविधियों को भी नियंत्रित करता है। अगर अमेरिकी अंतरिक्ष संगठन ‘नासा’ ने प्रमाणित वैज्ञानिक तथ्य उजागर नहीं किए होते तो केंद्र सरकार और तत्कालीन तमिलनाडु सरकार रामसेतु को तोडऩे की इच्छा शायद कब की पूरी हो चुकी होती।

इससे हमारी समुद्री सुरक्षा पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा हो सकता है। भारतीय तट रक्षक बल की आपत्तियां और चिंता भी उल्लेखनीय है। भारतीय तटरक्षक बल के मुख्य वाइस एडमिरल आर एफ कॉन्टैक्टर ने साफतौर पर कहा है कि सेतुसमुद्ररम परियोजना पूरी होने और रामसेतु के विध्वंस से देश की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है और तटरक्षक बल के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। हमें ध्यान यह रखना चाहिए कि चीन ने श्रीलंका में नौसैनिक अड्डे बना रखे हैं। रामसेतु के अस्तित्व में रहने से श्रीलंका से समुद्र के रास्ते कोई आक्रमण आसान नहीं हो सकता है। व्यापारिक जहाजों के माध्यम से हमारी सुरक्षा मजबूतियों की गुप्तचरी संभव नहीं हो सकती है।

हमने ‘सुनामी’ जैसी विभीषिका देखी है। सुनामी ने कैसी तबाही मचायी थी और कितनी क्षति पहुंचायी थी और कितनी जानें ली थीं, यह जगजाहिर है। भविष्य में सुनामी जैसी विभीषिका से इनकार नहीं किया जा सकता है। केरल और तमिलनाडु सिर्फ रामसेतु के कारण सुनामी की विभीषिका से बचे थे। रामसेतु का अवरोध नहीं होता तो सुनामी केरल और तमिलनाडु में भीषण तबाही मचाती। वैज्ञानिकों का कहना है कि ‘रामसेतु’ सिर्फ पौराणिक प्रतीक और धरोहर मात्र नहीं है, बल्कि यह समुद में घटने वाली प्राकृतिक घटनाओं को भी नियंत्रित करता है।

रामसेतु का विध्वंस करने की जगह उसे धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित करने की योजना बनानी चाहिए। सेतुसमुद्रम परियोजना से कई लाख गुना आय रामसेतु को धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित करने से होगी।

विष्णुगुप्त

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