ब्रेकिंग न्यूज़ 

जीवन के महाभारत कैसे-कैसे

ग्रामीण जीवन को रेखांकित करने वाली प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, मार्कंडेय और हिमांशु जोशी की ग्राम कथा परंपरा की अंत:सलिला निरंतर प्रवाहमान है, जिसकी पहचान संजीव, शिवमूर्ति, उदय प्रकाश, सच्चिदानंद धूमकेतु और रामधारी सिंह दिवाकर आदि की रचनाओं में मौजूद है। इस परंपरा के सशक्त कथाकार हिमांशु जोशी की ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ पुस्तक रूप में छपी है, जिसमें उनकी सजा, किसी एक शहर में, कांछा, अक्षांश, काला दरिया, आंखें, पाषाण गाथा, अगला यथार्थ जैसी चर्चित कहानियां संकलित की गई हैं। संकलन की भूमिका में हिमांशु जोशी बताते हैं कि ‘एक दिन देखता क्या हूं कि ‘सजा’ कहानी की पात्र श्रुति सामने खड़ी गुस्से में पूछ रही है, ‘भावना दी को आपने दुख यानी दुख ही दुख के अलावा और क्या दिया? उनकी सूनी आंखों में अक्सर एक सवाल तिरता दीखता है। आपसे कुछ जानना चाहती हैं वे, पर कह नहीं पातीं।’

‘बिना उसके कुछ कहे ही मैं उसकी व्यथा जानता हूं’, मैं कहता हूं, जो वह जानना चाहती है, उसे भी मैं समझ सकता हूं, परंतु जो कुछ, जिस रूप में घटित हुआ, क्या वही उसका वास्तविक समाधान नहीं? जिंदगी कभी भी समानांतर रेखाओं की तरह सीधी-सीधी नहीं चलती। सिद्धांत अपनी जगह हैं, पर जीवन का सच अपनी जगह पर। जब भी उन्हें मिलाने का यत्न करते हैं, वहीं से सारे विग्रह प्रारंभ हो जाते हैं। सभ्यता, संस्कृति, समाज, इनकी नींव में ऐसे ही व्यक्तित्व होते हैं, जो सांसारिक होते हुए भी सांसारिक नहीं होते! वे आकाश नहीं छूते, बल्कि धरती के पर्याय बनकर, सब कुछ सहते हुए भी प्रतिदान में सब कुछ ले लेते हैं। ‘पाषाण-गाथा’ का वृद्ध मूर्तिकार शायद भौतिक रूप से अब नहीं, पर कभी-कभी भूले-भटके, छाया की तरह आता है-‘क्या समय का यही सच नहीं? सच कहूं तो ये सारी नारकीय यंत्रणाएं मेरे लिए अर्थहीन हैं। मेरे अपने सुखी रहें, मेरे लिए इस संसार में इससे बड़ा और क्या सुख होगा!’

कभी मिमियाते मेमने को गोदी में उठाए कांछा की छवि उभरती है ‘अंजुरी भर सागर, बित्ते भर दुनिया, यही मेरा ब्रह्माण्ड है। इसमें सांस लेकर जी सकूं, क्या मुझे इत्ता भी नैतिक अधिकार नहीं? मुझे नहीं चाहिए कोई संपदा! और कोई सुख! रेत के बने मेरे घरौंदे, मेरे लिए बचे रहें, इतना तो मुझे मिलना ही चाहिए।’

‘कांछा’ हिमांशु जोशी की एक लंबी कहानी है, जो कुमाऊं के दूसरे ही रूप से पाठकों का साक्षात्कार कराती है। ‘कांछा’ एक असहाय बच्चे के जीवन संग्राम का लोमहर्षक आख्यान है, जो कहानी की ऊंचाइयों को नापने का पैमाना बन सकता है, जिसमें इसके सार्वभौमिक और सार्वकालिक होने के सारे तत्व मौजूद हैं। ‘कांछा’ एक ऐसे बच्चे की कहानी है, जिसका पिता गरीबी की मार से त्रस्त होकर कहीं चला गया और मां की जीविका का कोई उचित साधन है नहीं। ऐसे में एक गरीब और असहाय स्त्री जो कर सकती है, कांछा की मां ने वही किया। किसी और की पत्नी बन गई। ऐसे में पितृहीन बालक कांछा का सर्वत्र शोषण होता है। सौतेले बाप से वह सताया जाता है, तो मामा के घर में भी उसकी कम दुर्गति नहीं होती। लाला की दुकान पर भी उसका शोषण होता है। हिंदुस्तान से लेकर नेपाल तक कांछा हर जगह अपमान और प्रताडऩा का शिकार होता है। और एक दिन… एक दिन वह शोषणकर्ता की हत्या कर एक अविस्मरणीय पात्र के रूप में पाठक के मानस में स्थाई जगह बना लेता है और कांछा की मां… वह भी हिमांशु जोशी के कांछा की तरह कहानी का एक अविस्मरणीय चरित्र है।

नेशनल बुक ट्रस्ट की ‘संकलित कहानियां’ सीरीज में हिमांशु जोशी की निम्न कहानियां ली गई हैं: अगला यथार्थ, सजा, किनारे के लोग, पाषाण गाथा, काला दरिया, स्मृतियां, जो घटित हुआ, स्मृति चित्र, एक वटवृक्ष था, तरपन, अंतराल, जलते हुए डैने, रथचक्र, इति, जड़ें, इस बार फिर बर्फ गिरी तो, सफेद सच, तपस्या, अंधेरा और, आश्रय तथा इस बार आदि।

 

बलराम

seo копирайтерлечение спортивных травм в германии

Leave a Reply

Your email address will not be published.