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मोदी रहेंगे दिल्ली भाजपा के खेवनहार

दिल्ली में चुनावी रणभेरी बजने से पहले प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी के नाम का ऐलान और दिल्ली विवि छात्र संघ चुनावों में एबीवीपी की भारी जीत से भाजपा की उम्मीदें आसमान पर हैं।
दिल्ली में विधानसभा चुनावों के लिए चुनावी बिगुल बजने से पहले ही दो घटनाओं से दिल्ली में भाजपा के नेताओं के आत्मविश्वास का ग्राफ सीधे आकाश में पहुंचा दिया है। भाजपा ने अंतत: नरेंद्र मोदी को अधिकारिक रूप से प्रधानमंत्री पद के लिए पार्टी का उम्मीदवार घोषित कर दिया और उसके अगले ही दिन दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) के चुनावों में भाजपा की छात्र इकाई ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ (एबीवीपी) ने धमाकेदार जीत दर्ज की। इन दोनों घटनाओं का दिल्ली के युवा वोटरों पर भारी असर होने की उम्मीद है। एबीवीपी ने सचिव पद को छोड़ कर डूसू की बाकी तीनों सीटें-अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और संयुक्त सचिव जीत ली हैं।

पिछले साल कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई ने संयुक्त सचिव पद को छोड़ कर बाकी तीनों शीर्ष सीटें जीती थीं। संयुक्त सचिव पद पर भी कांग्रेस ने एबीवीपी को अकेले कब्जा नहीं करने दिया था। लेकिन इस बार एनएसयूआई को केवल सचिव पद से ही संतोष करना पड़ा। डूसू के चुनावों का परिणाम भाजपा द्वारा मोदी को पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से अगले दिन आया था। सो, इसे एबीवीपी ने मोदी की जीत बताया क्योंकि डूसू के चुनावों के परिणाम बेशक मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के अगले दिन ही आए हों, लेकिन एबीवीपी के उम्मीदवारों ने मोदी के पोस्टर-बैनरों का जम कर प्रयोग किया और परिणाम सामने था।

मोदी चुनावों के दौरान जब एसआरसीसी में आए तो उन्हें सुनने आई छात्रों की भीड़ से नमो (नरेंद्र मोदी) का युवा वर्ग में जादू दिखाई दिया था। दिल्ली की राजनीति को करीब से जानने वाले डूसू के चुनाव परिणामों को शीला सरकार के लिए खतरे की घंटी मान रहे हैं। वैसे भी 2009 के बाद हुए अधिकतर चुनावों में कांग्रेस ने दिल्ली में हार का मुंह ही देखा है। 2012 में दिल्ली नगर निगम के चुनाव हुए जिनमें कांग्रेस हार गई थी। 2013 में निगम की दो सीटों पर उपचुनाव हुए, जिनमें कांग्रेस दोनों पर ही हार गई। गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के चुनावों में कांग्रेस समर्थित गुट हार गया। दिल्ली विधानसभा के चुनावों से ऐन पहले डूसू के चुनाव परिणामों ने कांग्रेस के हाथ पैर फुला दिए हैं। इसकी बानगी केवल इसी से देखी जा सकती है कि दिल्ली छावनी बोर्ड के चुनाव छह महीने के लिए आगे खिसकवा दिए गए हैं।

भाजपा की दिल्ली इकाई ने एबीवीपी की जीत का सेहरा मोदी की लोकप्रियता के सिर बांधने में देरी नहीं लगाई। भाजपा की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय गोयल खुद भी छात्र नेता के रूप में डूसू के अध्यक्ष रह चुके हैं। हाल तक विजय गोयल भी मुस्लिम वोटों के चक्कर में नरेंद्र मोदी से परहेज करते दिखाई दे रहे थे, लेकिन नमो के जादू को देख कर उन्होंने पलटी मारने में देर नहीं लगाई।

मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की घोषणा के बाद जिस प्रकार से मोदी का स्वागत करने में विजय गोयल उत्साहित दिखाई दे रहे थे, उससे साफ लग रहा था कि विधानसभा चुनावों में दिल्ली भाजपा की रणनीति मोदी के कंधे पर चढ़ कर चुनाव मैदान में बिगुल बजाने की रहेगी। इन नेताओं का मानना है कि मोदी यूथ आइकन बन कर दिल्ली के युवा मतदाताओं का दिल जीत लेंगे। इससे दिल्ली विधानसभा के चुनावों में नमो का जादू दिल्लीवासियों के सिर चढ़ कर बोले तो आश्चर्य नहीं होगा। तालकटोरा गार्डन में भाजपा के नेताओं ने अपना चुनावी बिगुल बजा दिया है।

पार्टी के रणनीतिकार दिल्ली की एक-एक सीट के लिए अलग और राज्यस्तर पर पार्टी की अलग नीति बनाने में जुटे हैं। इस रणनीति में परंपरागत अभियान के साथ ही नई तकनीक को पूरी तरह से आजमाने की कोशिश की जा रही है। दिल्ली के युवा मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए वीडियो रथ, एसडी काड्र्स, मोबाइल एप्स आदि का जम कर उपयोग किया जाएगा। भाजपा की चुनावी रणनीति के मुख्य हिस्से में घर-घर जाकर प्रचार करने और किसी भी मतदाता से मिले बगैर न रहने की नीति शामिल की जा रही है। शीला सरकार की कमियों और भाजपा के लोकलुभावन वादों पर आधारित नुक्कड़ नाटक, नारे, बैनर और पोस्टर भी उनके प्रचार की रणनीति के हिस्से रहेंगे। सात वीडियो रथ तैयार किए गए हैं। इन रथों में चलने वाले वीडियो में शामिल किए गए नेताओं में मोदी को विकास पुरुष के रूप में शामिल किया गया है। इस संबंध में विशेषज्ञों और व्यावसायिक कंपनियों से पार्टी के नेताओं के विचार-विमर्श का दौर जारी है। दिल्ली में राजनीति की पकड़ अब तक पंजाबियों और बनियों के हाथों में रही है लेकिन समय की करवट के साथ ही पूर्वांचलियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती जा रही है। विधानसभा चुनावों के लिए रणनीति बनाने में जुटे भाजपा नेताओं का ध्यान मुस्लिम वोटरों पर भी है।

भाजपा के रणनीतिकारों को भी आशंका है कि कहीं मोदी के नाम से मुस्लिम वोटर बिदक न जाए। वैसे उन्हें इस बात की जानकारी भी है कि मुस्लिम वोटर दिखावे के लिए भी भाजपा को वोट नहीं देता है लेकिन मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने के मामले में भाजपा के रणनीतिकारों की कोशिश विजय गोयल की सेक्युलर छवि को भुनाने की रहेगी। संभव है इसमें उन्हें कामयाबी मिल भी जाए। पिछले 15 साल से दिल्ली की सत्ता पर काबिज शीला दीक्षित से अनेक कारणों से नाराज दिल्लीवासी इस बार दीक्षित का विकल्प खोजते दिख रहे हैं। आश्चर्य नहीं कि इस बार वे विकल्प के तौर पर भाजपा के लिए बटन दबा दें।

श्रीकांत शर्मा

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