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मोदी की घोषणा और कांग्रेस की मजबूरी

राहुल गांधी की अदृश्यता और सोनिया की रहस्यमयी चुप्पी ये दोनों ही पार्टी को एक अनजाने खोल के अंदर रहने को मजबूर कर रहे हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए रणभेरी बज चुकी है। एक तरफ का सेनापति कमर कस कर अपनी सेना को हुंकार रहा है मगर दूसरी और मालूम ही नहीं कि सेनापति कौन है और राजा अपने किले के भीतर गहरी खामोशी में है।
भाजपा ने अपना तुरुप का इक्का चल दिया है। गेंद अब कांग्रेस के पाले में है। क्या राहुल गांधी इस खुली चुनौती को स्वीकार करेंगे? क्या तीसरी बार मनमोहन ही कांग्रेस का चेहरा होंगे? या 2014 तक राहुल गांधी को लेकर ‘हैं भी और नहीं भी’ का मौजूदा सिलसिला ही जारी रहेगा? भाजपा ने प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी के नाम की घोषणा करके कांग्रेस की दिक्कतों को खासा बढ़ा दिया है। कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह राहुल का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए घोषित कर नहीं पा रही, क्योंकि ऐसा करना आज उसके लिए बेहद जोखिम भरा है। राहुल के खाते में ऐसी कोई राजनीतिक, प्रशासनिक अथवा राष्ट्रीय उपलब्धि नहीं है जिसे पार्टी जनता के सामने ले जा कर चुनावो में भुना सके।

और किसी का नाम लेने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता क्योंकि कांग्रेस में शीर्ष पद सिर्फ गांधी परिवार का सदस्य ही ले सकता है। परिवार का सदस्य किसी कारण से यदि पद लेने की स्थिति में न हो तो परिवार ऐसे व्यक्ति को चुनता है जिसका जनाधार न हो। ऐसे व्यक्ति को पदनाम तो मिल जाता है पर सत्ता और ताकत नहीं। मौजूदा प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह इसके उदाहरण हैं। प्रधानमंत्री तो वे तकरीबन नौ साल से हैं पर सब जानते हैं कि असली ताकत और सत्ता सोनिया और राहुल के हाथ में है। आज यूपीए की नाकामियों का सारा ठीकरा प्रधानमंत्री के सिर फुटता है लेकिन उपलब्धियों का सेहरा गांधी परिवार के सिर बंधता है यानी मीठा मीठा गप्प और कड़वा कड़वा थू।

परिवार की यह स्थिति आज कांग्रेस की सबसे बड़ी मजबूरी है। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस में नेता नहीं हैं। कई मुख्यमंत्री हैं, जो कांग्रेस को एक से ज्यादा बार जिता चुके हैं। कई केंद्रीय मंत्री भी हैं, जिनमें काबिलियत है, मगर कोई भी कांग्रेस में रहते प्रधानमंत्री पद की ख्वाहिश सपने में भी नहीं पाल सकता। यानी नीचे से उठकर कोई कितनी भी क्षमता दिखा दे, एक समय के बाद उसके लिए फुलस्टॉप ही है।

भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के अनुसार 2014 में मोदी के नेतृत्व में उनकी पार्टी की सरकार बनेगी। उनकी इस बात की असलियत तो चुनावी नतीजों के बाद पता चलेगा लेकिन मगर यह सही है कि इससे पार्टी के कार्यकर्ता एक निश्चयात्मक स्वर में वोट तो मांग सकेंगे। मगर कांग्रेस क्या कहेगी? क्या यह कि अगर पूर्ण बहुमत आया तो राहुल गांधी बनेंगे और सीटें कम आईं तो कोई ‘चरण पादुका’ लेकर प्रधानमंत्री बनेगा? दरअसल जो परिवार और विरासत उसकी बड़ी ताकत रही है वही आज उसकी बड़ी राजनीतिक कमजोरी बन गई है। कभी पार्टी का संबल होने वाला गांधी परिवार अब उसकी सीमा बनता दिखाई दे रहा है।

ये सब जानते हैं कि मोदी को लेकर भाजपा में राजनीतिक उठापटक, सियासी दांवपेंच, मान-मनौवल और शह-मात का खेल गोवा की बैठक के बाद से ही चल रहा है। और यह शायद आगे भी चले। पार्टी के बड़े नेता और पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने तो राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर अपनी नाराजगी भी जाहिर कर दी है। मगर किसी राजनीतिक दल में खुलकर राजनीति होनी भी कोई बुरी बात नहीं, बल्कि लोकतंत्र की निशानी है बशर्ते वह सियासी दंगल में न बदल जाए। पर कांग्रेस में क्या ऐसा हो सकता है? पार्टी कार्यकर्ता तो क्या, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से कोई पत्रकार तक नहीं पूछ सकता कि वे 2014 के चुनाव में पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उमीदवार के बारे में क्या सोचती हैं। वे तो किसी को उपलब्ध ही नहीं हैं।

राहुल गांधी की अदृश्यता और सोनिया की रहस्यमयी चुप्पी ये दोनों ही पार्टी को एक अनजाने खोल के अंदर रहने को मजबूर कर रहे हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए रणभेरी बज चुकी है। एक तरफ सेनापति कमर कस कर अपनी सेना में हुंकार भर रहा है तो दूसरी ओर मालूम ही नहीं कि सेनापति कौन है और राजा अपने किले के भीतर गहरी खामोशी में है। एक समय यह खामोशी ही सोनिया गांधी का ताकतवर हथियार थी मगर शायद आज नहीं रही। ट्विटर और फेसबुक के इस युग में जब टेलीविजन भी प्राचीन दिखाई देता है ऐसी चुप्पी राजनीतिक रूप से आत्मघाती हो सकती है।

 

उमेश उपाध्याय

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