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सुषमा की महिमा

 
इस साल रक्षाबंधन दो दिन मना। संासद भी चाहते थे कि रक्षाबंधन की छुट्टी हो। बात जब बिजनेस एडवाइजरी कमेटी में पहुंची तो इस बात पर बहस होने लगी कि छुट्टी कौन से दिन हो यानी 20 अगस्त को या 21 अगस्त को। 20 को छुट्टी चाहने वाले ज्यादा थे, लेकिन संसद की छुट्टी 21 को तय हुई। अब सासंदों के साथ संसद की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों और संसद में काम करने वाले कर्मचारियों को भी 21 को ही रक्षाबंधन मनाना पड़ा। जब एक पत्रकार ने संसद में काम करने वाले एक वरिष्ठ अधिकारी से पूछा कि ये क्या हुआ? छुट्टी 21 को कैसे रख दी? तो इस पर अधिकारी ने हंसते हुए कहा कि रक्षाबंधन बहनों का त्योहार है और कमिटी में जब एक महिला हो और वह भी विपक्ष की नेता तो उनकी बात को तवज्जो तो मिलेगी। इसलिए जो उन्होंने चाहा, वही हुआ। दरअसल, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ से कहा कि मुहूर्त के चलते 20 की बजाय 21 को ही राखी का दिन ठीक पड़ रहा है, इसलिए राखी की छुट्टी 21 को ही होनी चाहिए। सदन को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी कमलनाथ के कंधों पर है। सरकार के कई महत्वपूर्ण बिलों और भाजपा का रवैया देखते हुए उन्होंने सुषमा स्वराज की बात मानना ही बेहतर समझा। वह सुषमा के सामने क्या कहते। दरअसल, उन्हें अपने बिलों को पास करवाने के लिए भाजपा का साथ चाहिए। इस तरह सांसदों की राखी 21 को मनानी पड़ी।
कांग्रेस है कि निकालती नहीं
हरियाणा के विद्रोही कांग्रेसी सांसद राव इंद्रजीत सिंह ने मुख्यमंत्री हुड्डा के खिलाफ खुला अभियान छेड़ रखा है। राव इंद्रजीत ने पूरे प्रदेश में सम्मेलन किए, रैलियां निकालीं, विपक्षी नेता चौटाला से लेकर राजनाथ सिंह और भजनलाल के बेटे कुलदीप के साथ बैठकें कीं। दिल्ली और प्रदेश में कई पत्रकार वार्ताएं कर कांग्रेस सरकार को लताड़ा। इतना ही नहीं, शाही दामाद रॉबर्ट वाड्रा के विरुद्ध भी खुलकर बोला, लेकिन पार्टी ने उन्हें अभी तक अपने साथ बनाए रखा है। उनके तमाम सर्मथक पूछते नहीं थकते कि ‘भाई साहब, हम ऐसा के करें जो कांग्रेस उन्हें बाहर कर दे?’ दरअसल, वह अपने निकाले जाने का इसलिए इंतजार कर रहे हैं ताकि पार्टी द्वारा निष्कासन होते ही वह अपनी नई पार्टी का ऐलान कर सकें। लेकिन कांग्रेस है कि उन्हें निकालती ही नहीं। अंत में उन्होंने हार कर अपनी बेटी आरती द्वारा एक नई पार्टी के लिए चुनाव आयोग में अर्जी लगवाई, जिससे अगर चुनाव घोषित हों तो अपनी एक पार्टी भी तो होनी चाहिए, जिसके नाम पर वह चुनाव लड़ सकें।
जब सुप्रिया की भी नहीं चली
महाराष्ट्र सरकार ने दिल्ली में इंडिया गेट के पास एक भव्य गेस्ट हाउस बनवाया है। जब इसका राष्ट्रपति द्वारा लोकार्पण हुआ तो इसे दिल्ली की एक बेहतरीन इमारत और शान बताया गया। यह बात अलग है कि उसके बनने को लेकर भुजबल परिवार आज भी भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहा है। राष्ट्रवादी कांग्रेस के सुप्रीमो की लाडली और बारामती लोकसभा क्षेत्र से राकापा की सांसद सुप्रिया सुले ने अपने क्षेत्र के पत्रकारों को दिल्ली दर्शन के लिए आमंत्रित किया। वह चाहती थीं कि उनके यहां से आए पत्रकारों को इस नए सदन में रहने का सौभाग्य प्राप्त हो। लेकिन सदन के मैनेजमेंट ने उनकी एक नहीं सुनी। जो पत्रकार सरकार मान्य नहीं हैं, उन्हें वहां कमरा देने से मना किया गया। सुप्रिया ने मैनेजमेंट को रूम का कमर्शियल किराया भी देने की पेशकश की, लेकिन उनकी एक नहीं चली। अंत में सुप्रिया को सभी पत्रकारों को एक साथ रखने के लिए एक फाइवस्टार होटल में व्यवस्था करनी पड़ी। जब सदन के अधिकारियों से पूछा गया कि सुप्रिया को मना क्यों किया तो वह धीरे से बोला, ‘साहब यहां पानी नहीं है और भी कई समस्याएं हैं। अब मीडिया को कमरा कैसे दें।’
गजगद हुए झीन बाबू
कॉल गर्ल्स के साथ पकड़े जाने पर ख्याति का पताका इतना फहराएगा और प्रशंसकों की इतनी लंबी लाईन लग जाएगा, इस बात का अंदाजा विधायक महोदय को भी नहीं था। लेकिन सीतापुर के विधायक महेन्द्र सिंह उर्फ झीन बाबू के साथ यही हुआ। गोवा में अनैतिक व्यवहार अधिनियम में पकड़े गए झीन बाबू का लखनऊ हवाई अड्डे पर समर्थकों ने जमकर स्वागत किया। ढ़ोल-नगाड़े, नाच-गाने और फूल-माला से उनका ऐसा स्वागत हुआ, जैसे वे चांद से लौटकर आए हों। सीतापुर में आयोजित मिलन समारोह में विधायक जी चटखारे ले-लेकर बता रहे थे कि किस तरह वे पकड़ाए। विधायक जी कह रहे थे कि उत्तर प्रदेश में विहिप की यात्रा रोके जाने के कारण, भाजपा शासित राज्य में उन्हें गिरफ्तार किया गया। इस दौरान समर्थक उनके पक्ष में जमकर नारे लगाए। झीना बाबू की ख्याति में अचानक वृद्धि देखकर साथी विधायक अचंभित हैं कि ऐसे कामों से भी ख्याति मिलती है।
महंगाई से नेता भी त्रस्त
बढ़ती महंगाई से अब नेता भी परेशान नजर आने लगे हैं, खास कर जो जमीन से जुड़े हैं यानी जिनका जनसंपर्क बहुत ज्यादा है। अब उत्तर प्रदेश के कांग्रेस नेता जगदंबिका पाल को ही लीजिए। उनके घर कार्यकर्ताओं का तांता लगा रहता है। इतना ही नहीं, उनके घर का कायदा है कि हर आनेवाले को बड़े प्यार से खाना खिलाते हैं। अब इस महंगाई में दिल्ली जैसे शहर में तो सब्जियों के भाव भी आसमान छू रहे हैं। इस महंगाई ने जगदंबिका पाल की पत्नी के किचन का बजट भी गड़बड़ा दिया है। ऐसे में उन्होंने रास्ता निकाला कि अब अपने गांव बस्ती से सब्जियां मंगाई जाएं, जहां सब्जियां दिल्ली से तो सस्ती हैं। यही नहीं, अब उनके घर में खाने में प्याज का भी संभलकर उपयोग किया जा रहा है। ऐसे में जगदंबिका पाल के एक मित्र की टिप्पणी थी कि असली चिंता तो उन लोगों की है, जिनका कोई गांव में अपना नहीं।

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