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मोदी के मायने

मोदी अगर वाकई प्रधानमंत्री बन जाते हैं, तो उन्हें और भी अनेक नीतिगत निर्देश प्राप्त होंगे। इस तरह मोदी मनमोहन सिंह की तुलना में ज्यादा ‘ताकतवर’ नहीं भी साबित हो सकते हैं, क्योंकि मोहन भागवत के रूप में एक संविधानेत्तर सत्ता उनके समने होगी और आरएसएस प्रमुख कांग्रेस अध्यक्ष के अधिक ‘ताकतवर’ संस्करण बनने के संकेत भी दे रहे हैं।

भाजपा ने आखिरकार भारी जद्दोजहद के बीच नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। इस घोषणा के फौरन बाद हरियाणा के रेवाड़ी में मोदी की रैली में ऐसा जन सैलाब उमड़ा, जो पहले कभी नहीं देखी गई थी। बेशक, आरएसएस और बड़े व्यापारिक घरानों के भारी समर्थन के अलावा भी मोदी की शख्सियत में ऐसे तत्व हैं, जो आम जनता को आकर्षित करते हैं। सो, राजनीतिक विश्लेषकों और भाजपा नेताओं ने उन्हें एक महान ओबीसी नेता के रूप में प्रचारित करना शुरू किया, जो देश के सर्वोच्च आसन पर पहुंच सकता है। लेकिन क्या यह वास्तविकता है? मीडिया के विश्लेषकों को तो माफ किया जा सकता है पर भाजपा के नेताओं को क्या कहें।

निश्चित रूप से मोदी को राष्ट्रीय ओबीसी नेता बताना भूल है। शायद मोदी भी भाजपा के इस प्रचार के कैदी बनते जा रहे हैं। दरअसल मोदी घांची जाति के हैं जो सिर्फ गुजरात में ही पाई जाती है। यह ओबीसी श्रेणी की एक उपजाति है। दूसरे राज्यों में तेली जाति के लोग कुछ साझा तलाश सकते हैं क्योंकि घांची भी तेल निकालने के पेशे से जुड़े रहे हैं। लेकिन गुजरात के बाहर इसका कोई संदर्भ नहीं है। इस तरह वे गुजरात में एक जाति के नेता हो सकते हैं पर राष्ट्रीय स्तर पर कोई एक ओबीसी नेता नहीं है। मसलन, यादव, कुर्मी, लोध जातियों को कोई साझा नेता नहीं है।

दुर्भाग्य से इसकी शुरुआत मोदी ने ही अपने जन्मदिन पर ओबीसी नेताओं को न्यौता देकर की। लेकिन मोदी को इससे बड़ी पहचान पर जोर देना चाहिए। दरअसल बड़ी बात राष्ट्रीय परिदृश्य में मोदी की अहमियत जोर देने की है। वह यह है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी के बीच आर्थिक नीतियों के मामले में कोई खास फर्क नहीं लगता है। दोनों ही विदेशी निवेश और बड़े कॉरपोरेट घरानों को अधिकतम छूट देकर तेज आर्थिक वृद्धि पर जोर देते हैं। फिर भी मोदी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के ‘ताकतवर’ संस्करण लगते हैं। वह गुजरात में बड़े उद्योगों और व्यापारिक घरानों को अधिक तेजी से आसान राह मुहैया कराने में कामयाब रहे हैं, जबकि प्रधानमंत्री केंद्र में ऐसी सफलता नहीं दिखा सके हैं। इसकी वजह सीधी-सादी है। गुजरात में मोदी के पैर पीछे खींचने वाली कोई संविधानेत्तर सत्ता नहीं है, जबकि दिल्ली में प्रधानमंत्री के पांव राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की बेडिय़ों से जकड़े हैं। उनकी नियुक्ति सोनिया गांधी ने की है, इसलिए उन्हें उनके (सोनिया के) निर्देशों पर चलना पड़ता है। ऐसा माना जाता है कि मोदी के हाथ मनमोहन के आर्थिक मॉडल को लागू करने में बंधे नहीं होंगे। लेकिन मोदी मनमोहन का ‘ताकतवर’ संस्करण नहीं भी हो सकते हैं।

मोदी को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के जबरदस्त दबाव के कारण ही घोषित किया जा सका है। भाजपा को तो बस इसका ऐलान भर करना था। कथित तौर पर आरएसएस ने यह समर्थन कई तरह की लॉबिंग और न्यूनतम मांगों पर समझौते के बाद ही दिया है। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक आरएसएस ने इस समर्थन के लिए मोदी के सामने चार शर्तें रखीं। अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण, देश भर में विवादास्पद समान नागरिक संहिता लागू किया जाना, जम्मू-कश्मीर को धारा 370 के तहत प्राप्त विशेष अधिकार को समाप्त करना, और देश भर में संपूर्ण गोरक्षा लागू करना। ये चारों परंपरागत हिंदुत्ववादी एजेंडा हैं।

बेशक, आरएसएस अपने एजेंडे पर अमल पर जोर देगा। जैसे सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह का चयन किया, ठीक उसी तरह आरएसएस ने मोदी को अपना उम्मीदवार चुना है। लेकिन सोनिया ने मनमोहन के प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का गठन किया, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने वह समय देना भी उचित नहीं समझा। वे पहले ही न्यूनतम नीतिगत एजेंडा तय कर चुके हैं। यह तो महज शुरुआत है, मोदी अगर वाकई प्रधानमंत्री बन जाते हैं, तो उन्हें और भी अनेक नीतिगत निर्देश प्राप्त होंगे। इस तरह मोदी मनमोहन सिंह की तुलना में ज्यादा ‘ताकतवर’ नहीं भी साबित हो सकते हैं, क्योंकि मोहन भागवत के रूप में एक संविधानेत्तर सत्ता उनके समने होगी और आरएसएस प्रमुख कांग्रेस अध्यक्ष के अधिक ‘ताकतवर’ संस्करण बनने के संकेत दे रहे हैं।

मोदी के सभी समर्थकों को इस पहलू पर गंभीरता से गौर करना चाहिए। यह भी स्पष्ट है कि देश में एक वर्ग के भारी समर्थन के बावजूद मोदी बड़े कारपोरेट घरानों के मजबूत समर्थन पर अधिक आश्रित हैं। मोदी की लोकप्रियता अपनी निर्विवाद कामयाबियों के अलावा बड़े व्यापारिक घरानों की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के समर्थन की बदौलत भी है।

इस वजह से मोदी के सभी समर्थकों, खासकर बड़े व्यापारिक और औद्योगिक घरानों को यह साफ-साफ समझ लेना चाहिए कि आरएसएस का एजेंडा भी उन्हें ध्यान में रखना है। वजह यह कि मोदी प्रधानमंत्री बन जाते हैं तो उन्हें आरएसएस से अलग कर पाना असंभव होगा। अगर सभी नीतियों पर मोदी और आरएसएस के बीच सहमति बनी रहती है तो सब कुछ ठीक-ठाक चलेगा। लेकिन अगर मोदी का नजरिया आरएसएस से अलग होता है तो भारी समस्या पैदा होगी। उस स्थिति में मोदी की सरकार मनमोहन सरकार से ज्यादा लकवाग्रस्त साबित होगी।

इसलिए मोदी को समर्थन दे रहे ताकतवर व्यापारिक घरानों को आरएसएस के कुल एजेंडे पर जरूर गौर कर लेना चाहिए। यह मोदी के सभी दीवानों खासकर, यूरोप और अमेरिका में बसे आप्रवासियों, सभी बड़े घरानों, 21वीं सदी में देश को ले जाने के लिए मोदी से मोहित युवाओं, मुख्यधारा की मीडिया तथा टीवी एंकरों को भी समझ लेनी चाहिए, जो मोदी की हर छोटी-बड़ी बात को सुर्खियां बना देते हैं। यह भी संभव है कि आरएसएस की नीतियां भारत में विकास और प्रगति की राह प्रशस्त करें। लेकिन यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है। अभी तो यह समझने की दरकार है कि मोदी या तो आरएसएस की नीतियों का पूरी तरह समर्थन करेंगे या फिर देश में ऐसी लकवाग्रस्त स्थिति पैदा होगी जो सारी व्यवस्था को तार-तार कर देगी।

 राजेंद्र पुरी

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