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आसान नहीं है राहें!

मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार चुने जाने के पीछे शामिल मुख्य कारणों में एक ओर मोदी की चुम्बकीय लोकप्रिय छवि, गुजरात में दिया गया स्वच्छ प्रशासन, जीतने का क्रम जारी रहना, अद्भुत विकास मॉडल के अतिरिक्त जीतने तक संघर्ष करने और किसी से हार न मानने की क्षमता का होना।
अधिक दिन नहीं हुए इस घटना को। एक उद्योगपति मित्र ने तुरन्त मिलने के लिए फोन किया। इन मित्र से उदय इंडिया के पाठक पिछले अंक में परिचित हो चुके हैं। सीधी सपाट बात कहने वाले और अपने उद्योगक्षेत्र कांच जैसे पूरी तरह पारदर्शी सुभाष त्यागी, जिन्होंने केन्द्र सरकार को देश की अर्थव्यवस्था को गड्ढे में डालने के लिए उदय इंडिया के माध्यम से लताडऩे में कोई कोर-कसर नहीं रखी। फोन पर उनकी आवाज और बातचीत की शैली से लगा वह बेहद उत्तेजित हैं। मैं व्यस्त होने के बावजूद भी उनसे तुरन्त मिलने के लिए तैयार हो गया। उन्हें लगा कि मैं उनके पास पहुंचने के लिए देर लगा सकता हूं, इसलिए मुझे खुद आने के लिए उन्होंने मना कर दिया और मेरे पास पहुंच गए। मुझे पता था कि वह अपने व्यापार के विस्तार की योजना लेकर गुजरात गए हैं। उसी से अनुमान लगाया कि हो न हो उनकी बात गुजरात से ही जुड़ी होगी। इसके आगे मैंने सोचने में दिमाग लगाने की जरूरत नहीं समझी। वह आए और इससे पहले कि नमस्कार का आदान प्रदान होता, एकदम से बोले-”भाईसाहब, मोदी के लिए कुछ करना चाहिए।’’ मैं उनके चेहरे की ओर देख कर सोचने लगा कि सुभाष त्यागी मुझ से मोदी के लिए क्या करने के लिए कह रहे हैं। लेकिन सुभाष त्यागी ने मुझे इस दिशा में सोचने का वक्त ही नहीं दिया और बताने लगे कि मोदी किस तरह अपने प्रदेश में निवेश के लिए उद्योगपतियों से खुद मिलते हैं और किस तरह उद्योगपतियों को गुजरात में निवेश के लिए प्रेरित करते हैं। निवेश की यदि योजना अच्छी है तो किसी उद्योगपति को मोदी से मिलने की भी आवश्यकता नहीं, उसके सारे काम पूरे सिस्टम के साथ खुद होते चले जाऐंगे। सुभाष त्यागी की बात सुन कर मुझे क्या किसी को भी गुजरात में मोदी के ”विकास मॉडल’’ का रहस्य पता चल जाएगा, जिसकी चर्चा आज देश से निकल विदेश में पहुंच चुकी है।

सुभाष त्यागी की कोई इंडस्ट्री गुजरात में नहीं है। उनकी गुजरात जाने की योजना भी बदल गई। लेकिन वह मोदी से आज तक गदगद हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या मोदी को देश के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के पीछे भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों की केवल इसी सोच ने काम किया है। मोदी निश्चितरूप से उद्योगपतियों के चहेते कहे जा सकते हैं। परन्तु क्या देश के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होने के लिए मात्र यह योग्यता काफी है कि वह उद्योगपतियों और व्यापारिक घरानों का चहेता है। डॉ. मनमोहन सिंह से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और नरसिंह राव से लेकर विश्वनाथ प्रताप सिंह तक प्रधानमंत्रियों के नाम गिने जाएं तो इन नेताओं ने प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने से पहले ऐसा कोई काम सामने नहीं आया जो उन्हें उद्योगपतियों का चहेता बना देता हो। इस सूची में इन्दिरा गांधी और राजीव गांधी को भी क्यों छोड़ा जाए।

फिर लाख टके का सवाल है कि भाजपा को वट वृक्ष बनाने वाले आडवाणी और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज जैसे उनके समर्थकों के भारी विरोध के बाद भी राजनाथ सिंह इतने बड़े कदम कैसे उठा लिए। इस सवाल के उलट यह पूछना ठीक रहेगा कि भाजपा यदि मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करती तो किस को करती। आडवाणी के अलावा किस का नाम इस स्तर पर लिया जा सकता है? लेकिन लंबे राजनीतिक यात्रा के अनुभव के अतिरिक्त आडवाणी के खाते में इस मसले पर क्या है? 2009 का चुनाव तो उन्हें ही आगे करके लड़ा गया था। उस चुनाव की हार की कसक आडवाणी सहित भाजपा के हर नेता को आज तक सालती है। अन्य कोई नेता? वरिष्ठ नेताओं में डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने तो पहले ही हथियार डाले हुए हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली में से सुषमा स्वराज तो आडवाणी के सहारे ही बैठी थीं जबकि जेटली खुद मोदी के पाले में शुरू से खड़े थे। मुझे याद है मोदी को केशुभाई पटेल के स्थान पर मुख्यमंत्री पद दिलाने के बाद केशुभाई पटेल को मनाने के लिए जेटली ने कैसे मोदी का साथ दिया था। लेकिन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह का नाम जरूर इस क्रम में बार-बार आता रहा है। गुजरात में मोदी की हैट्रिक और विकास के मुद्दे पर मोदी को आगे किया जाता था तो रमण सिंह और शिवराज सिंह चौहान के नाम भी तुलना के लिए शामिल कर लिए जाते थे। आडवाणी ने भी मोदी की तुलना में शिवराज सिंह को खड़ा करने के लिए गुजरात मॉडल को कोई विशेष करिश्मा करार देने की बजाय शिवराज सिंह को सराहा था कि उन्होंने एक बीमारू राज्य को विकास की पटरी पर चढ़ा दिया है। वैसे मोदी को इस वक्त प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की जल्दी का एक कारण यह भी बताया जाता है कि यदि शिवराज सिंह आने वाले चुनावों में जीत गए तो उनकी भी मोदी के मुकाबले हैट्रिक खड़ी हो जाएगी।

कुल मिला कर मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार चुने जाने के पीछे शामिल मुख्य कारणों में एक ओर मोदी की चुम्बकीय लोकप्रिय छवि, गुजरात में दिया गया स्वच्छ प्रशासन, जीतने का क्रम जारी रहना, अद्भुत विकास मॉडल के अतिरिक्त जीतने तक संघर्ष करने और किसी से हार न मानने की क्षमता का होना और दूसरी तरफ भाजपा में ऐसे नेताओं का अभाव होना जो उनके कद के बराबर आकर खड़े हो सके। ऐसे नेताओं की भाजपा में कमी नहीं जो मोदी के कद के बराबर के हों, लेकिन वे नेता एक सीमा से बाहर नहीं जा सकते।

चुनौतियां
अब तक बात मोदी की सकारात्मक छवि की हो रही थी। मोदी के लिए न तो अब तक का रास्ता और न ही आगे का रास्ता फूलों की घाटी से गुजरने वाला है। मोदी इस मुकाम तक जैसे पंहुचे हैं, उसमें भाग्य के अतिरिक्त उनकी क्षमताओं और धैर्य के साथ उनके व्यक्तिगत गुणों ने तो साथ दिया, लेकिन आरएसएस का भी जबर्दस्त समर्थन उन्हें रहा है। मोदी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने तक के सारे हालात गवाह हैं कि मोदी अपनी सारी क्षमताओं और गुणों के बाद यहां तक पहुंचे हैं तो वह केवल, और केवल आरएसएस के कंधे पर चढ़ कर पहुंचे हैं। नहीं तो उनके लिए राजनाथ सिंह ने जिस प्रकार से बोल्ड स्टेप उठाए, वे सामान्य हालात में क्या उठाए जा सकते थे। एक वक्त था जब राजनाथ सिंह तो क्या, भाजपा के तमाम नेता आडवाणी के आशीर्वाद के लिए लालायित रहते थे। उन्हीं राजनाथ सिंह ने न केवल प्रधानमंत्री बनने की मोदी की प्रबल इच्छा को हवा दी, बल्कि उसके लिए मोदी का कद बढ़ाने के लिए उन्हें न केवल संसदीय बोर्ड का सदस्य बनाया बल्कि 2014 के लिए पार्टी की प्रचार समिति का अध्यक्ष भी बनाया। राजनाथ सिंह यहीं नहीं रुके, आडवाणी के घोर विरोध के बाद भी उन्होंने चतुराई के साथ मोदी को भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी घोषित कर दिया। यह सब आरएसएस के जबर्दस्त समर्थन के बगैर राजनाथ सिंह कर सकते थे, यह सोचना भी मूर्खों के स्वर्ग में रहने जैसा है।

जिस दिन मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के भाजपा नेतृत्व के फैसले की घोषणा पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने पत्रकार वार्ता में की थी, उससे अगले ही दिन डूसू के चुनावों के परिणामों में शानदार विजय प्राप्त करने वाले एबीवीपी के नेताओं ने अपनी जीत का सेहरा मोदी के सिर बांधने में कोताही नहीं बरती थी। उन्होंने मोदी को युवा आइकन बताते हुए यह रहस्योद्घाटन किया था कि चुनाव प्रचार में मोदी की कर्मठ, सुशासन और ईमानदार नेता की छवि को छात्र मतदाताओं के आकर्षण का केन्द्र बनाया था।

मोदी की आलोचना की जा सकती है। लेकिन मोदी की रणनीति के परिणाम सामने आने पर आलोचकों के मुंह बंद हो जाते हैं। क्योंकि मोदी में दिखाई देतीं उनकी कमियां ही उनकी ताकत बनती दिखती हैं। वह किसी को अपने से बड़ा देखना नहीं चाहते लेकिन बड़ों के प्रति उनका रवैया अपमानजनक भी नहीं होता। आडवाणी के घोर विरोध के बाद भी उन्होंने प्रधानमंत्री पद के लिए अपने नाम की घोषणा होने के बाद आडवाणी का आशीर्वाद लेने की कोशिश की। वैसे उनकी कार्यशैली का मुख्य अंग रहा है कि जिसने भी उनके लक्ष्य की प्राप्ति में टांग अड़ाने की कोशिश की उसी के ‘पर कतरने’ में उन्होंने कोताही नहीं बरती। फिर चाहे वह संजय जोशी रहे हों, या फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे नितिन गडकरी। संजय जोशी किसी परिदृष्य में कहीं दिखाई नहीं देते और गडकरी ठीक से लाइन में खड़े हैं। यहां तक कि उन्होंने खुद को बचाने वाले आडवाणी पर भी रहम नहीं किया। ये आडवाणी ही थे जिन्होंने मोदी को राजधर्म की मर्यादा सीखने के लिए वाजपेयी के कोपभाजन से बचाया था। लेकिन आज उन्हीं आडवाणी के लिए उन्होंने पार्टी में ”सम्मानजनक कोना’’ सुरक्षित करवा दिया है।

वैसे तो पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को 2014 का सेमीफाइनल माना जा रहा है। लेकिन भाजपा शासित राज्यों या फिर राजस्थान के मामले में ऐसा नहीं है। छत्तीसगढ़ हो या मध्यप्रदेश, वहां रमण सिंह और शिवराज सिंह चौहान यदि जीतते हैं तो वे अपनी जीत का सेहरा बिल्कुल भी मोदी के सिर पर नहीं बंधने देंगे। राजस्थान में भी मोदी को वसुंधरा राजे आगे नहीं आने देंगी। इसलिए भाजपा के लिए यह 2014 का सेमीफाइनल तो नहीं माना जा सकता। 2014 में मोदी को अपने बलबूते पर ही सत्ता का दरवाजा खोलने वाले जादुई आंकड़े को पकडऩा होगा। उन्हें पीठ में छुरी-कांटे चलाने वालों की ओर से भी लगातार चौंकन्ना रहना होगा, क्योंकि दुश्मन केवल बाहर ही नहीं, बल्कि घर के भीतर भी होते हैं और बाहर के दुश्मनों की तुलना में घर के भीतर बैठे विरोधी अधिक खतरनाक होते हैं।

गठबंधन के युग में मोदी की सबसे बड़ी चुनौती एनडीए के कुनबे को बढ़ाना है। केन्द्र की सत्ता में एक पार्टी के काबिज रहने का युग अब नहीं है। अब तो जिसका जितना बड़ा कुनबा, सत्ता में पहुंचने की उसकी उतनी अधिक उम्मीदें। लेकिन अल्पसंख्यक वोटों के लिए मोदी के नाम से ही एनडीए का कुनबा बिखर रहा है। एनडीए का संयोजक दल जद(यू) पहले ही इस कुनबे को छोड़ कर जा चुका है। अन्य कोई साफतौर पर मोदी का साथ देने के लिए अपनी आवाज बुलंद करने के लिए तैयार नहीं दिख रहा। ऐसे में यदि मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना है तो उन्हें अपनी कार्यशैली में ऐसे परिवर्तन लाने होंगे कि एनडीए का कुनबा यदि बढ़ भी न सके तब भी मुद्दों पर आधारित समर्थन उन्हें जरूर मिल सके।

 

श्रीकान्त शर्मा

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