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सुख का स्रोत

मनुष्य का मद इन्द्रिय-विषय की ओर ऐसे ही भागता है, जैसे कुत्ता सूखी हड्डी के पीछे। सच पूछा जाए, तो वस्तु में सुख है ही नहीं। जिस समय हमें मनोवांछित वस्तु प्राप्त होती है, तो उसके परिणाम स्वरूप हमारे अन्दर उक्त विषय से सम्बन्धित विक्षेप थोड़ी देर के लिए शांत हो जाते हैं। मन शांत होने पर हमारे ही आत्मचैतन्य का निर्मल आनन्द हृदय उदित होता है। आनन्द आत्मा का होता है, वस्तु का नहीं। केवल अज्ञान के कारण हम सुख पाने के लिए वस्तुओं के पीछे भागते रहते है।

मानसिक विक्षेपों के कारण हमको आत्मानन्द हमारा अपना होता हुआ भी सदैव सुलभ नहीं होता। बाह्य जगत् और आत्मगत आनन्द के बीच में वासनाजन्य विक्षेप दीवार बनकर खड़े हो जाते है। किसी अभिलाषित वस्तु की प्राप्ति होने पर अभिलाषा-जनित विक्षेप दूर हो जाते हैं। मन शांत होने से, आत्मचैतन्य की प्रकाश किरणें मन के पीछे से झांकती हैं, प्रकट हो जाती हैं। विवेक की कमी के कारण हम यह समझते हैं कि आनन्द या सुख उस प्राप्त वस्तु में है।

संसार में सुख सब चाहते हैं, परंतु सुख का स्रोत क्या है – यह शायद ही कोई जानता है। इसलिए अज्ञानता के कारण सभी लोग जीवन भर भोग-वस्तुओं के पीछे भागते रहते हैं। हमें चाहिए कि थोड़ा रूककर यह विचार करें कि सुख का वास्तविक स्रोत क्या है?

प्रेरक कथन:
‘भगवद्कृपा, अंधेरी गुफा में उस प्रकाशपुंज की तरह है, जो इतनी रौशनी तो देता ही है कि एकबार में सब कुछ न सही लेकिन आगे बढऩे का रास्ता तो दिखा ही देता है।

 

स्वामी चिन्मयानन्द

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