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राजनीतिक पंडितों की नजर में पीएम इन वेटिंग

भाजपा ने नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करके सेकुलर और अल्पसंख्यक तबकों में तहलका मचा दिया है। यह तबका तो आशंकित है ही, एक छोटा तबका ऐसा भी है जो मानता है की घृणा और हिंसा को शह देने वाले मोदी को नेतृत्व देकर भाजपा ने अपने ताबूत में आखरी कील ठोक ली है। आरटीआई कार्यकर्ता और वकील नूतन ठाकुर कहती हैं, ‘यह कोई रहस्य नहीं है कि देश की 50 फीसदी जनता को मोदी मंजूर नहीं हैं। इसमें अल्पसंख्यक और सेकुलर हिंदू तबके दोनों शामिल हैं। अभी मोदी को देश के सर्वोच्च पद के लिए स्वीकार्य होने में काफी लंबा वक्त लगेगा, जो उनके जीवनकाल में शायद संभव न हो।’ ठाकुर का मानना है कि भाजपा किसे अपना उम्मीदवार चुनती है, यह उसका अंदरूनी मामला है लेकिन, अधिकांश भारतीय उसकी भावना से सहमत होंगे, इसकी संभावना कम है।

सामाजिक कार्यकर्ता सायरा मुज्तबा कहती हैं, ‘अगर मोदी के प्रधानमंत्री बनने की महज संभावना से सांप्रदायिक तत्वों की आकांक्षाएं आसमान छूने लग सकती हैं और मुजफ्फरनगर में हिंसा का तांडव कर सकती हैं तो खुदा न करे, अगर वे वाकई प्रधानमंत्री बनते हैं तो क्या होगा! ऐसे आदमी को हर हाल में रोकना चाहिए।’ प्रोफेसर रमेश दीक्षित कहते हैं, ‘भाजपा और संघ परिवार ने मोदी को प्रधानमंत्री घोषित करके देश के सेकुलर और लोकतांत्रिक ढांचे के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी है। भारत के लोग जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र की भावनाओं से ऊपर उठकर अपने नजरिए में लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष हैं। वे सांप्रदायिक और विभाजनकारी ताकतों को कभी सफल नही होने देंगे।’

एक सेवानिवृत्त अधिकारी मुमताज अली खान का मानना है कि असल में मोदी की ताजपोशी पर आखिरी दांव तो आडवाणी का ही होगी। वे कहते हैं, ‘मोदी को कम से कम 5 राज्यों के चुनाव हो जाने तक धैर्य रखना चाहिए था। अब उन पर राज्यों के चुनाव में भी भाजपा के सफल प्रदर्शन का दबाव होगा। अगर ऐसा नहीं होता है तो वह शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएंगे।’ वह यह भी कहते हैं कि ‘हमें उम्मीद करनी चाहिए कि कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन करे, वरना जिन्न का साया मंडराने लगेगा।’
रिटायर्ड पुलिस अधिकारी और दलित चिंतक एस. आर. दारापुरी के मुताबिक, मोदी संघ के फासीवादी हिंदुत्व की वापसी के प्रतीक हैं। भाजपा अपने भगवा एजेंडे को वापस लाकर वोटबैंक का ध्रुवीकरण करना चाहती है। लखनऊ में मुमताज डिग्री कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल, प्रोफेसर अबुस सलाम सिद्दिकी तो प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार की घोषणा को ही चुनौती देते हैं। वे कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवारी का ऐलान संसदीय लाकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है और चुनाव आयोग को इस पर ध्यान देते हुए, ऐसे कार्यों पर तत्काल प्रतिबंध लगानी चाहिए।’ मोदी को जनसंहार करने वाले नेता कहते हुए कहते हैं कि यह बहुत दुखद स्थिति है कि इस तरह के व्यक्ति को विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में भावी प्रधानमंत्री के लिए पेश किया जा रहा है। लेकिन आगे देखने वाले तबका यह महसूस करता है कि मोदी एक बेहतर प्रशासक हैं और गुजरात को आगे ले जाने के लिए उन्होंने बहुत कुछ किया, इसलिए देश के शासन की बागडोर उनके हाथों में सौंपी जानी चाहिए। भूतपूर्व बैंक अधिकारी एल. के. लखीना का कहना है, ‘मोदी एक बहुआयामी व्यक्तित्व, प्रखर व्यक्ति और बेहतरीन सुधारक हैं, जिन्होंने आर्थिक विकास के लिए काम किया है। लेकिन यह महसूस करने में असमर्थ रहे कि इस देश का अल्पसंख्यक उतना ही सुरक्षा की उम्मीद करता है, जितना कि बहुसंख्यक। मेरा मानना है कि उन्हें एक मौका निश्चित रूप से दिया जाना चाहिए ताकि वे अपनी वैचारिक प्रवाह को देश के सामने रख सकें।’

लखनऊ से कुलसुम मुस्तफा

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